प्रथम हिन्दी संस्करण १६५५

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साहित्य मन्दिर प्रेस, लखनऊ ने मुद्रण किया

विषय पुष्ठः दाव्दकोष ६६४... ४: भूमिका न्‍न्न दई १. मूलप्रवृति की सामान्य प्रकृति »० ११ २. समाज में मूलप्रवृति ०४४. १४ ३. विवेक भौर इच्छा का कार्य ००. ४. सामाजिक या सामूहिक मस्तिष्क का सिद्धान्त श्६ ५. सामान्येच्छा का प्रत्यय ७९ ६. मूलवंशीय भौर राष्ट्रीय विशेषताएं « १०४ ७. खझूढ़ « ११३ प« जाति, मंडल भौर संस्थाएं » १२६ £. भीड़ का मनोविज्ञान « १३७: १०. जनता झौर जनमत - १४६ ११. संगठन और प्रजातंत्र का मनोविज्ञान "न १६० १२, उपसंहार « ७४

विषय-सूची

शब्दकोष

20978 अमू्त 205४#780007... प्रथकूकरण 2 ९तुप्रा।26 उपाजित &ठादथं यथार्थ 20[प्रशाएशा[ व्यवस्था 2९८४७ रागात्मक 0 गि९०/ शा भन्तर्गामी 83 (९श९८४६० समुदाय 2 /शिंधा08 निष्ठा /9फए88 विश्लेषण 7३४ (१०४ क्रोध

4५77770700029 मानवशास्त्र

आयातए6४8... श्रथविपरोतता 2009 अनुभव शून्यता ४0784 प्रपील, प्रभावित करना 370.080/2एणञांशा. पूर्वानुवर्ती ज्ञान सम्बन्धी

/रणंग्रॉर्टापा8.. शिल्पविद्या ै$5गरा[870070 समीकरण 2550 24607 मंडल 8588प्रा7900॥ अ्रनुमान, कल्पना

2 0््रांधा परिमाणुवाद अला007 श्रवधान

८5पणाॉ707स्‍ए प्रभृत्व, श्रधिकार 0 प्रा00.80ए . निरंकुश शासन 2 फ्रध्ाल655 सचेतता

89[9%708 सन्तुलन

93008फ7 प्राणि विद्या (छा सेल (797०8 देवयोग (४०४४००' चरित्र, प्रकृति (॥४४/80९४४४7४०.. विशेषता (008 ०0470707प्र'.. मर्यादा

' शास्त्र (0068 नियमसंहिता (0270 ए४ ज्ञानात्मक (!0व607५४९ सामूहिक (:ण्रा्रणा साधारण

(!06ाग्रागप्रश॥0०व०) संचार (ग्रफ्राणा।।. जाति, साम्य

(०65 जटिल (०्राशथीशाशंणा समझ (09४९ क्रियात्मक (०70० सम्बोध (07060#/0०0.. सम्बोघना (णा4वएला श्राचरण (०780०ं९४१०९ चेतना (-07रठाशआं2 स्थूल साचार (माइलं०प्र5 चेतन

(!075$.7ए8४ए४ स्थितिपालक (!0787ए0०४27658 रचना-

चृत्ति

(!07068768 विपय सामग्री, ग्रन्तगंत तत्व

((०॥एआप07 प्राचारविधि

द् गशब्दकोष

('090ए0707

( 4धगा077 79 मस्तिष्क विज्ञान

(थार लालसा (ा0०ज़त भीड़ (-प्रा०भं५्र उत्सुकता (प्रशंणाः आचार 428698 प्रदत्त क्‍207920206 . प्रजातायक [)श7॥ए४/५०८ तद्भव (66 श्रभिलापा 06(८0क्‍7॥70 निर्घारित, निश्चत छंथ्रा0णा अनन्य शासक ्तिशिलसाएधंदों विशेषक 4)85805ा. घणा

॥)शाधशा706ए7 प्रतिर्पता 05009907 स्वभाव, प्रकृति

॥00०07708 अ्रथे-शास्त्र 5४0 श्रात्मश्लाघी 9007 गवें >िशाशा त्तत्व ज700तांग्रशा. मू्तिमत्ता शितणाणा संवेग आता संवेगशील जाफाएएशे प्रयोगसिद्ध ता शऑशा80 व्युत्पन्न ॥०)॥748॥ सत्ता कांप. 68 2007[05.. समूह

भावना 705 आचार नीति &7002ए नृवंश विद्या

प्रतीति | +एणैप्रा0ा (.076 वस्तुका हृदय या अन्तभोग..

ऋ्रमकि उच्नति ऋरलाशाशाई उत्तेजन 5 ए0एा०णा ४609 . परिणामवाद -डअाधप्र्ण: श्लान्तं +्रछशायाप्रेआई प्रयोग, परीक्षण: +#ए7णाशा व्याख्याता कऊिए0०गरााणा , विवरण 780प्राए. श्रान्तिरिक वाक्िति. 79॥]9८५9 '. आन्ति #&€शाएए भावना 72॥ 778#70[ 0 पलायन . | मलप्रवत्ति फऋगाः | 7077 75ए7७४800289 लोक मनोविज्ञान (शाधाधां सामान्य. (शाल्ाधारटधा07 . सामान्य प्रनुमान .

(3722 श70787658 सामू हिकता (37007 समूह . (२077 ?8४ए०१०029 समूह

मनोविज्ञान विज श्रादत लिशात भुंड विशल्ताधाए पैतृक पछरछा०तां५ परम्परा

ति0ण70227श५9 सजातीयता फसज्छ0०768ां5 अनुमान -.

70(6९०४०0

08605

१9(0॥००शौररी द्धिवाद

नु॥क्ा३००) अ्रन्‍्तःक्रियां नीति

पुर्ताण प्रकट, (०४५४९ प्रेरक प्रन्त/सं चार

एछआत०ए१प०ा छलन्योस्य- १(0प6ए था झान्दीलर्न गति

पाश्ित ख्पवर्य

पाली णी झत्त/सरम्वन्ध १७४8१ झौर्‌ संगीतकी (5४70५59 80॥07 शत राबलोकने नौ देवियों

१० शब्दकोष

शपराधशाता - परिव्तेन 7४५४॥०007297 पौराणिक कथा स्‍र९४/ए005 ४ए४27 नाड़ी मंडल (906८६ कर्म, उद्देश्य (22200 वन्धन

(20#2श८ाए श्रल्जन शासन (707 मत (2270० चेतनायुक्‍त, श्रांगिक

(2297 जीवधारी एाशा। उद्गम, मूल ()7शाधा0०0।. श्रादि रचना एड्ाशांगि गा४धएए।... पुत्र कामना मूलप्रवृत्ति रिातीक्षाओणां, संसद्‌ 7260796 लोग राष्ट्रवासी एर?कट्ठा प्रत्यक्ष एश०००0०॥ ..प्रत्यक्षीकरण एट८इं४शाई श्राग्रहयुक्त 2#शा0ाढा07 प्रेमय 72॥7॥008फ9 भाषा विज्ञान 2#॥080]779 दर्शन 2॥9श स्थूल, भौतिक ?2]958002ए शरोर विज्ञान 70थशाएंवथिं सम्भाग्य ?0णाश्राधिए. सम्भाव्यता 707720]096 . विधेय ; 6507 470॥ प्रदर्शन ' 0785026 प्रतिष्ठा _ ए6एंश0ा पूर्व॑दृष्टि फपा॥ओंएए6 प्राथमिक, प्राचीन आदिम निवासी

शिवपरक्षाप्र प्रारम्भिक शा7रठा00. नियम, सिद्धान्त 72700658 प्रणाली 770ः)थाश[65 रुफान 7700[7 798 मूलप्रतिमा 2953एटाआंट्शों भ्रात्मिक 789८0 शार92 ए/४.. मनो- विश्लेपण 7?59000-%27002ए मन- द्चिकित्सा

7?58ए०४७002ए मनोविज्ञान रिप्र०॥0 जनता 260 ॥०)|। 0।१३॥ सामाजिकता, लोकप्रसिद्धि

एप्रए॥0 ठ5एंए7रएणा।. जनमत शप्रष्टा2णॉ५ युयुत्सा 0प्रा0086 प्रयोजन एप्ाए08४पिी... प्रयोजनंमय 7२००९ मूलवंश 7२०८४ मूलवंशका मूलवंशीय ४078. विवेक, विवेकमय 7२८४९०३०॥7 प्रतिक्रिया 6 वास्तविक ॥6४॥५ वास्तविकता रष्वीरिथा।णा सिद्धि 3२९४३४०॥ विवेक €टशां हालका २८८06 लेख प्रमाण २७6७5 प्रतिक्षेप ए०ी०ड 2०707 प्रतिक्षेप क्रिया 776०9६ा707 पुनरावृत्ति र९०765४07 निरोघ

द्ुददर्क छ्‌' एफ त्व्दत (6४४0० 5७ ५१०), अति शा क्िरप्त शक, सं ८0905 घास चु४(०ीी 5९०४ सदमे ऋ्थमी (88०४ टेल्थक नुह०००४ ममता भ्मग नु'€१0०ं (00000) संबेण 609 एहवा4 के प्र्व्‌

9 288०0 द्राद्त श्रद्धा दवा ग60 नु७007% (80700) दद् हद ल्णावाकर

भमिका दर

सामाजिक श्र राजनीतिक समस्या पर विचार करनेका आधार मंनोवैज्ञानिक होगा, चेतन या श्रचेतन। सबसे प्रधिक महत्वकी वात यह है कि हमारा तात्पय क्रियाके विभिन्न क्षेत्रोंम यथार्थ मनृष्य व्यवहारके वर्णन या विश्लेषण से है, श्रथवा झाद्शों या सिद्धान्तोंकी उस समस्यासे जिसका मनुृष्यको अनुसरण करना चाहिए, मानुपिक सम्भाव्यताश्रोंके ज्ञानसे, उसके सहज श्रौर उपा्जित साथनोंकी प्रकृतिकी, तथा जीवन और श्राचरणकी प्रेरक शक्तियोंकी समस्यापत्तें है। जैसा कि हम यथार्थमें देखते हैं कि राजनीति, प्र्थशास्त्र, श्राचारनीति श्रादिके लेखक जिन्हें मनृप्य प्रकृतिकी विधियां कहते हैँ उनके सम्बन्धमें कुछ श्रनुमानोंसे प्रारम्भ करते हें) जैसे हॉव्स (£009028) का राजनीतिक सिद्धान्त इस अनुमान पर श्राश्रित है कि मनुष्य श्रात्मइलाधी श्रावेगोंके द्वारा कार्य करनेको बढ़ाया जाता है और श्राज्ञाका थ्राधार भय है, सर हेनरी मेन (7277५ /४]॥8) जैसे लेखक आदतको श्राधार मानते हैँ श्रौर श्रन्य लेखक विवेकमय स्वीकृति को। राजनीति और प्राचारनी तिका लाभ-सिद्धान्त (पाा75॥ ) सम्प्रदाय कुछ मनोवैज्ञानिक अनुमानों पर श्राश्चित था, यद्यपि उस सम्प्रदायके सब सदस्योंने समान मात्रा्में उनको चेतन रूपसे नहीं समझा था, जैसे यह कि : उद्देश्योंका एक चेतन भ्नुसरण मनुष्यके कार्यका नितान्त मार्ग दर्शक होता है, और कार्य का अ्रकेला प्रेरक आननन्‍्दकी प्राप्ति और दुःखका त्याग होता है, और शआानन्दोंका योग श्र सुख एक ही वात है। यह समान मनोवैज्ञानिक श्रनुमान श्रर्थशास्त्रके व्यक्षितवादी सम्प्रदायके श्राधार पर भी है। फिर सामाजिक वबातोंके मनुष्य प्रकृतिकी विधि माने जाने वालके सन्दर्भसे श्रधिक प्रचलित विचार कोई नहीं है। मनृष्य प्रकृति जो भी है, यह बहुबा माना जाता है कि युद्ध श्रनिवार्य हैं। भ्न्‍्य तर्क करते हूँ कि जब तक मनुष्य प्रकृति नहीं बदलती समाजवाद बिल्कुल असाध्य हैं श्रौर उद्योगर्मे श्रारम्भिक (702098 ) तथा शक्ति प्राप्त करनेकी विधि केवल प्रतियोगिता है। इस

१-स० *+/०0

भूमिका डे

अनुसार विधि चेतन वृद्धि श्रौर इच्छाकी उत्पत्ति नहीं है, वरन्‌ लोगोंकी भ्त्माका प्राकृतिक उत्तत्ति या प्रदर्शन है। राष्ट्रीय श्रात्माका यह विवार, बहुत अस्पष्ट और मन्द रहा, श्रौर ऐतिहा सिक धर्मशास्त्रके क्षेत्रमें सफल परिणामों वाला रहा, यह नहीं कहा जा सकता। जिन पुस्तकोंका सम्बन्ध हीगेल से नहीं था वह लजारस ([ 287 प8)

श्रौरस्टाइंथाल (5[0॥79/) की थी, जिनको वहुधा सामाजिक मनोविज्ञान के संस्थापक कहा जाता है, और जिन्होंने लोक मनोविज्ञान तथा भाषा विज्ञान के श्रध्ययनके लिए एक पत्र स्थापित किया जिममें उन्होंने एक बड़ा भारी कार्यक्रम बनाया। उनका सामाजिक मनोविज्ञानका विचार रोचक है श्रौर सारभूत बातों डा० मैक्डयूगलसे भिन्न नहीं मालूम होता। लज़ारस कहते हैं कि “लोक-मनोविज्ञानका कर्त्तव्य उन विधियोंको ढूंढना है जो जहां कहीं भी वहुतसे लोग एक साथ रहते झौर कार्य करते हे वहीं क्रियाशील हो जाती हैं।” इसका कार्य लोगोंके सम्पूर्ण जीवनका वह वैज्ञानिक वर्णन देना है जैसा कि उनकी भाषा, कला, धर्म, श्राचरणमें दिखाई पड़ता है श्लौर सबसे झ्रधिक जो परिवर्तेन लोगोंके मस्तिष्कोंमं होते हैं उनकी क्रमिक उन्नति और क्वाससे व्यवहार करना है। कार्यविधि विल्कुल श्रनुभव श्रीर निरीक्षण पर प्राश्चित होनी थी भ्र्थात्‌ प्रत्यक्ष निरीक्षणों तथा उन तथ्योंकी परीक्षा पर पधाश्चित होनी थी जो नृवंशविद्या (8/770089) तथा मनुष्य जीवनके प्रन्य विज्ञानोंके द्वारा दिए गए हैं। लोक मनोविज्ञानके दो भाग हो ने थे, एक उस सामान्य नियमोंसे व्यवहार करने वाला जो सव समूहों या लोगोंमें साधारण प्रभेयोंके आघारमें हैँ, श्र दूसरा, जिसे वह मनोवैज्ञानिक नृवंश- विद्या कहते हैं, जिसका प्म्वन्ध लोगों श्रीर समूहोंकी मनोवैज्ञानिक विचित्रताभ्रोंसे है। (इसके साथ मैकूड्यूगलके निम्नलिखित कथनक्री तुलना की जा सकती है: “समूह-मनोविज्ञानके ठीकसे दो भाग हैं, एक वह जिसका सम्बन्ध सामूहिक जीवनके सबसे सामान्य नियमोंको ढूंढना है भर दूसरा वह जी इन नियमोंको विशेष प्रकारके और सामूहिक जीवनके उदाहरणोंके भ्रध्ययनमें कार्यान्वित करता है ।/---|6 (307४9 ४0, 9. 6). लज़ारस और स्टाइंथाल के कामका महत्व श्रॉकना कठिन हैं। सामाजिक मस्तिष्ककी प्रकृतिके सम्बन्धर्में विवादका निषेव करनेके भ्रतिरिक्त ( जिसमें

सामाजिक मनो विज्ञान

वह दो भौतिक रुपसे वमेल सिद्धान्तोंको एक पद्धतिके श्नन्दर लानेकी कठिनाईमें परिश्रम करते हुए मालूम होते हैं, अर्थात्‌ हर्वार्ट (निा0थ() . का मनोविज्ञान दर हीगेत्र की श्रव्यात्म विद्या), उनका ययार्थ काम शुद्ध सामाजिक मनोविज्ञानकी अपेक्षा विस्तृत भाषा विज्ञानके क्षेत्रमें हैं। किसी भो स्थितिमें उन पर किसी प्रभावका आरोपण करना जिसका प्रत्यक्ष पता लगाया जा सकता है, कठिन है।

विल्हेम बुंट (५४/।४७४७ ४४॥0/) के वहुत महत्वशाली कार्यको भी संकेत कर सकते हैँ। जिन्हें जमंनीमें सामाजिक मनोविज्ञानक्रों उन का सबसे प्रधान प्रतिनिश्नि मानते हैं। वह सामाजिक मनोविज्ञानकों जातियों जैसे भाषा, पौराणिक विचार और ग्राचारोंकी मानसिक उत्पत्तियों के अध्ययनसे सम्बद्ध मानते हें। उनके श्रनुसार सामाजिक मनोविज्ञान सामान्य मनोविज्ञानक्रा एक अ्रभिन्न अंग है, या एक अ्रध्ययन विधि हैं जिसकी योजना हमारी अधिक जटिल मान सिक प्रणालियोंके समझनेके लिए की गई हुै। उनके लोक मनोविज्ञान (70|/:27 0579०॥0]086) पर लिखे गए बड़े ग्रन्य भाषा, पोराणिक कया, आ्राचार, विधि श्लीर सामाजिक संगठनके इस दृष्टिकोणसे श्रव्ययन के ही भेंट किए गए हैं। एक पिछले श्रौर श्रधिक संक्षिप्त ग्रन्थमें उन्होंने मनुष्य विकास तथा उन गतियोंका जिनमें से यह निकला होगा, संयुक्त प्रदशंन करनेकी चेष्टा की है।*

«२. श्रव तक जिस काम पर विवाद हुआत्रा है वह लज्ञारस श्र स्टाइंबाल के कार्यक्रके पहले भागमें अधिकतर श्राता हैं। परन्तु एक बहुत बड़ा साहित्य उस पर भी है जिसे विशेषकर सामाजिक मनोविज्ञान कहते हैं, जो विभिन्न जातियों और लोगोंकी विशेष मानसिक विशेषताशोंसे व्यवहार करता है। यह साहित्य न्िकतर उन्नीसवीं शताव्दीकी राष्ट्रीय श्रात्म चेतना के विशेष विकासके द्वारा उत्तेजित किया गया था] जैसे १८७० का युद्ध और जर्मन विजयका कारण निर्धारित करनेंकी अभिलापा ने पैटर डाइडन (एथ० 9007) की पुस्तक ला एलेमॉज (“65 ठैी]शा।ध्ात॑$” ए98॥5 884) को लिखवाया। जर्मनकी शअ्रपेक्षा लैटिन लोगोंके हास

(प्रांए0था उ30ए्रा72) १६१६-१७ पृष्ठ ३३७ में लेखकका लेख देखिए।

भूमिका भर

की नैत्यिक भविष्यवाणी ने अधिकतर फ़ॉली की पुस्तक ([70प66'5 “78ए०॥009_06 60 79०एफॉ6 ग्रिद्याटद्वं 57 ?758 898) को लिखवाया। इसी प्रकार अन्त पुस्तकें भी हैं। गोविनोँ ((509790) श्रौर चेम्वरलेन ((877027 2) जैसे जेखकोंके द्वारा जागृत किए गए जातीय मनोविज्ञानके प्रयत्तकों भी सुचित किया जा सकता है।

इस समूहकी बहुतसी पुस्तकें लोगोंके मनोविज्ञानकी श्रन्तदृष्टिकी * विशेषतासे पूर्ण हें, परन्तु यह सन्देहजनक है कि वह बुद्ध विज्ञानके क्षेत्रकी हैं। वह सुगम सामान्य अनुमानोंसे पूर्ण हैं, जिनका आवार सामान्य प्रभाव झौर भ्रस्पप्ट भ्रनुमान है। वह सब इस वातसे हानि उठाती हैं कि चरित्रका कोई शुद्ध विज्ञान नहीं हैं और लेख प्रमाण तथा निरीक्षणकी सामान्यतया मानी हुई विधियोंका श्रभाव हैं। ऐसी सामान्यताओ्रोंका जैसे एक राष्ट्र वासियोंमें भ्रमू्त विचार होते हैं भ्ौर श्रन्य ग्रागमन रूपसे ([00707 9) प्रवृत्त हैं या कि एक राष्ट्रवासी संश्यात्मक और झालोचक हैं तथा अन्य किसी भो सिद्धान्तकों माननेको तैयार हैं, कठुत कम मूल्य है। विशेषकर सामूहिक पदोंके प्रयोगसे और यह मान लेने में कि एक जातीय या राष्ट्रीय- मस्तिप्कका अस्तित्व है और लोगों पर जो कुछ होता है उसके लिए उत्त र- दायी है, बहुत गड़बड़ी हुई हैं; और परिणान हँ--वेगपुर्ण सामान्य भ्रनुमाव' जिसकी ओर सामूहिक मस्तिष्कका बिचार बड़ी सरलतासे भुक जाता हैं।' विभिन्न निरीक्ष कोंके कयन जो राष्ट्रीय विशेषताश्ंके सम्वन्धमें है एक दूसरे का विरोध करते हैं। इस प्रकार जैसे, चेम्वरलेन के श्रनुसार, यहुदी विशेष दृढ़ इच्छा वाले होते हैं। श्लीर जमेन बुद्धिमान्‌, श्रौर लपूज (,8[00028) कहते हें कि सामान्य योरोपियनमें साधारण बुद्धि, और दृढ़ इच्छा होती है !' राष्ट्रीय विशेषताओंके लिए जो व्याख्या दी जाती है वह प्रायः वहुत सन्देहात्मक प्रकृतिकी होती हूँँ। इसका सम्बन्ध विशेषकर जलवायु सम्बन्धी दशाओंके प्रत्यक्ष प्रभावसे हैं। इस प्रकार लेजर ([.८22४) के श्रनुसार रूस में स्टेप्स (880]788) का प्रभाव निरंकुश शासनकी झोर है। दुर्भाग्यसे लेबन ([,8 08 ) के श्रतुसार स्टेप्स हंंगेरियनर्म केवल साहस और स्पष्टता' ही नहीं उत्पन्न करते वरन्‌ स्वतंत्रताका एक विचित्र प्रेम भी उत्पन्न करते हैं। फिर लेराय-वला ([,270५9-869 प्रांट) रूसवालोंके स्वप्नवत्त्‌ चरित्रां

दर सामाजिक मनो विज्ञान

को रूसी मैदानोसे संवद्ध करठे हें। जबकि लेबन को हंगेरियन मंदानोंमें उत्के वास्तविक स्वभावकी व्याख्या मिल जाती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोणसे निर्णय करनेमें विशेषकर लोक मनोविज्ञानकी बहुतग्नी पुस्तकोंके सन्दिग्ध चरित्रको सिद्ध करनेके लिए सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते है। सारेविपय एक सावधान विड्लेपण श्र उचित समस्याओं पर स्पष्ठ कथन, तथा एक सामान्यतया मानी गई लेखप्रमाण ग्रौर निरीक्षण विधिकी श्रावश्यकता है।

३. पारिणामवादके विकास और उत्पत्ति सम्बच्ची दृष्टिकोण जो महत्व बढ़ रहा है, उसने तुलनात्मक मनोविज्ञानके वहुमूल्य कार्यको प्रारम्भ किया हैं, जिसका सामाजिक मनोविज्ञानकी समस्याओंसे महत्वशाली सम्बन्ध है। जैसे वालडविनकी उत्पत्ति सम्बन्ध ((2600) विधि (800०2 शात श0- '04 ॥72970860॥5” ) “प्रारम्मिक अवस्था श्रों में मनुष्य के मनो वैज्ञा- 'निक विकासमें छान-वीन करती है, जिससे उसकी सामाजिक प्रकृति श्रीर उस सामाजिक संगठन पर जिसमें उसका एक भाग है प्रकाद् पड़ सके। इसी भाग में रॉयस (7२09५८8) की पुस्तक भौर कुछ वातों में डा मेंक्डयुगल को काम भी है श्र इसमें सन्देह नहीं कि उन्होंने व्यक्ति श्रौर समाजके वीचके सच्चे सम्बन्ध श्रौर व्यक्तिके द्वारा अपनी चेतनाकी प्राप्तिमें सम्मिलित प्रणालीके 'सम्बन्धमें स्पष्ट विचार प्राप्त करनेमें सहायता दी है।

४. तुलनात्मक मनोविज्ञानका विकास, और अन्तरावलो कनके विरोध में व्यवहारके श्रव्ययनके प्रति बढ़ता हुआ्ला श्रवधान कुछ श्रंशमें सामाजिक मनोवैज्ञानिकोंके एक नए सम्प्रदायकी उत्पत्तिके लिए उत्तरदायी है। वह मनो- वैज्ञानिक सामाजिक जीवनमें सम्मिलित मूलप्रवृत्तिशील, संवेगशील और श्रचेतन वातोंको प्रकाणमो लानेमें रुचि रखते हैं। इस सम्प्रदायका झ्रारम्म बेजहॉट से हुआ कहा जा सकता है, जिसने सामाजिक प्रणालीके श्रनुकरण के महत्त्व पर जोर दिया। उसके बाद टार्डे का नम्बर है जिसने इस श्राधार 'पर एक वहत्‌ समाज विज्ञान सम्बन्धी पद्धति कार्यान्वित की श्रीर जिसका अनकरण प्रधिकतर श्रमेरिकन समाज विज्ञानवेत्ता रॉस ने किया। ले वा के प्रचलित ग्रन्योंमें वही प्रवृत्ति प्रदर्शित होती है। प्रो० ग्राहम वालेस की पहलेकी पुस्तक ("निप्रा)धा। िद्ञापार 2008,” 908 ) भी चरित्रमें वुद्धिवाद विरोधी थी और ऐसी प्रणालियों जंसे संकेत, श्रनुकरण,

भूमिका

श्रादत, मूलप्रवृत्ति श्रौर सामान्यतया श्रवेतन वातोंका सामाजिक जीवनमें महत्व सम्मुख लानेके लिए लिखी गई थी। डा० मैकड्यूगल की पुस्तक ([7स्‍07006%040 8००2 7?25ए८70]029) लगभग उसी समय मिकली जव प्रो० वालेस की। इस पुस्तकर्मे, जिसमें समाज विज्ञान सम्बन्धी खोजके बहुतसे क्षेत्रोंकोी बहुत प्रभावित किया है, उन्होंने मनुष्य जीवनके “प्रधान संचालकों की भांतिके मूलप्रवृत्तिके सिद्धान्तको कार्बान्वित किया श्र प्रधान नियमोंका ढांचा बनाया जो उनकी रायमें सव श्राचरण निर्धारित करते हैं। श्रपनी हालकी पुस्तक (“7४6 (0700० 'शीा70,” 920) में डा० मैकड्यूगल श्राचरणके मूल नियमोंके श्रपने पहले वर्णवका प्रयोग ऐसे समूहोंके व्यवहारकी समभानेके लिए करते हैं जैसे ढीले संगठन वाली भीड़, उच्च संगठन वाली सेना, और सामूहिक मस्तिष्कका सबसे ऊंचा रूप, मस्तिष्क, जैसे एक राष्ट्रीय राज्यका। वरावर मूलप्रवृत्तियों और स्थायीभावों पर जोर दिया गया है, जवकि “बौद्धिक समभकी भांति भ्रकेला विचार कोई प्रभाव नहीं डाल सकता” (पृष्ठ १७०)। वह उन्नतिके लिए “बौद्धिक” क्रिया्रोंके महत्व पर भी ज़ोर देते हूँ, यद्यपि कुछ सन्देह से (पृष्ठ २९७ झ्रादि)।

५, मनश्चिकित्सा (05ए0०70-92/780029) का विलक्षण विकास जो फ्रॉयड (7670), जूंग (>079) और श्रन्योंके नामसे सम्बद्ध है, उसने भी सामाजिक सिद्धान्तके विशेष कार्यको बढ़ाया हूँ, श्रौर जो हमारे शीर्षक के नीचे निरदिष्ट कामके समान दशाकी ओर प्रवृत्त है। मनो विश्लेषण के परिणाम इतिहासके महान्‌ व्यक्तियों जैसे लिझ्ानार्ड विसी पर फ्रॉयड की पुस्तक भौर अमेरिकन लेखकोंकी लूथर और लिकन पर बअ्रध्ययनकी व्याख्या करनेमें परिणत कर दिए गए हैं, भौर प्रायः विशेष सफलताके साथ। यह सम्भव मालूम होता हैँ कि मनोविश्लेषण सामाजिक श्रशान्तिके बहुतसे भागों भ्रौर विशेषकर भ्रराजकताके महान्‌ व्याख्याताओं पर तथा अतिव्यक्ति- वाद पर प्रकाश डालेगा ( इस सम्बन्ध ।25900097498९ पा6 53020- 0श८ बिक /प्रार/ ६0]797 की हालकी पुस्तकसे तुलना करो )। फ्रॉयड का विरोध सम्बन्धी सम्बोध (000069) ऐसी राजनीतिक ऋरान्तियों से सम्बद्ध समस्याझों तथा झआथिक जीवन और क्रियाकी समस्यासे व्यवहार

मय सामाजिक भनोविज्ञान

करनेमें भ्रत्यधिक सहायक है। श्राथिक जीवन और क्रियाके सम्पनन्धमें श्री श्रोडंवे हीड के ६गृतह्ञाए5 वी क्रिता७797"9 तथा एक बहुत रोचक लेघकी संकेत करना अच्छा है जिसमें प्रो० विलियम एफ़० आँखर्त ने यह दिखानेका प्रयत्त किया हैं कि “स्थान परिवर्तन लाक्षणिक श्रर्थो निकास, अतिफल (०077078407), तथा विवेकपुर्ण व्याख्यों (7807429/707 ) जैध्षी श्रवेतन यंत्र रचनाओं (॥९८07- _0) की क्रियाशीलताके द्वारा ग्रारथिक प्रेरक साधारणतया छम्मवेण्में रहते हैं “(806९087७ 2८070ग्रं० रिव्यंथ्फ्र, 80979थाशा

47०), 499)। फ्रॉयड ने स्वयं मनोविश्लेषणके परिणामीकों ६280005 और [070779॥ की व्याख्यामें कार्यान्वरित किया हूँ और उनके सम्प्रदायके अन्य लोगोंने नए मनोविज्ञानके दृष्टिकोणसे वर्मके मनोविज्ञांनका श्रध्ययत्न किया है। जुंग और उत्तके अनुसरणकर्तता फ्रॉयड से विरोधी कार्य विधिका श्रनूसरण करते मालूम होते हैं। जब कि फ्रांयड व्यवितगत मनो विज्ञानसे प्राप्त परिणामोंकों लोक मनोविज्ञानकों सममनेमें लगाते हैं। जुंग और उनका समुदाय लोक मनो विज्ञानकी पामग्रको व्यक्ति गत मनोविज्ञानके तथ्योंकी श्रपनी व्याख्यामें लगाते हैं। अमी इन सब कार्य के सामाजिक सिद्धान्तका मूल्य श्रांकना वहुत जल्दी है, परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि इसने अनुसन्धानकी वहुत सी श्राकर्पक श्रेणियां खोल दी हैं श्रीर वह कि यह ग्रभी से महत्वशाली सहायता देने लगा हैं।*

६. हाल की पुस्तकोंकी प्रवृत्ति सामाजिक जीवनको श्रचेतन और मूल प्रवृत्तियील वातों पर जोर देने की है, भ्रौर वहुतसे लेल्षकोंने हालके मनोविज्ञान के परिणामोंका प्रयोग जिसे सामाजिक समस्वाबोंकी दुद्धि व:दी “या विवेक- वादी व्याज्या कहते हें उसके घिरुद्ध आक्रमण करनेके लिए श्राधारकी भांति

प्रयोग किया हैं। ऐसे आक्रमण बहुधा इच्छा झौर विवेककी प्रकृतिके या उनके बहत अमर्स विचारके प्रति मिथ्यावोबों पर श्राश्रित होते हें। ऐसे

# एच० ई० वास (जि. 5, छिात8 00 “फ8५८॥0099 /70 [7750079, 49]9) क्वा एक रोचक लेख इस सम्पूर्ण विपयपर देखिए।

' भूमिका. &

लखकोंकी भी कमी नहीं है जिन्होंने सामाजिक संस्थाश्रों भ्रौर गतियोंकों विवेक झौरविवेकमय प्रयोजनका स्थान दिखानेका प्रयत्न किया है। जैसे प्रो ग्राहम वालेस श्रपनी पुस्तक ( (68 80069) में तक करते हैं कि विचार स्वयं एक सच्चा प्राकृतिक स्वभाव है झौर "केवल एक श्रवीन यंत्र नहीं जो एक सरल मूलप्रवृत्तिकी पूर्व उत्तेजनाकी आज्नामें केवल कार्य कर रहा हो।” (७0, 5)

प्रो० एल० टी० हॉबव्हाउस (7..7. ॥40707005$8) की वहुतसी पुस्तकों पर भी ध्यान देना चाहिए। उन्होंने मूलप्रवृत्ति और बुद्धि विवेक शौर इच्छाकी प्रकृति श्रीर सामाजिक क्रमिक उन्नतिर्मे प्रयोजनके अ्र्थका वर्णव दिया हैं, जिस पर वृद्धिवाद विरोधी सम्प्रदाय श्राक्षेप नहीं कर सकता।

यह कहना श्रनावश्यक है कि इस छोटी सी पुस्तकर्में बह सब कुछ सम्मिलित नहीं क्रिया जा सकता जिसका श्रभी जल्दीसे निरूपण किया हे। हम केवल कुछ मृख्य समस्याओ्रोंके विवादमें ही श्रपतकों सीमित रवखेंगे। सबसे पहले मूलप्रवृत्तिकी प्रकृति श्र समाजमें मूलप्रवृत्तिके भागका वर्णन दिया जाएगा। इसव हम कुछ उन भ्रावश्यक सिद्धान्तों पर विचार कर सकेंगे जो हालमें ही कार्यान्वित हुए हैं, श्रौर जो मूलप्रवृत्तिके शब्दोंमें सामाजिक रचनाको व्याख्या करनेकी चेष्टा करते हैँ। फिर हम इच्छा और विवेककी प्रकृति श्रीर उनकी मूलप्रवृत्तियों तथा श्रावेगोंके सम्बन्ध पर विचार करेंगे। यह दिखानेकी भ्राशा है कि वुद्धिवादी शरीर बुद्धिवाद विरोधी दोनों एक उपद्रवी और मिथ्याबवोव करनेवाले विवेकमयसे प्रयोगसिद्धका पृथक्त्व करानेके दोपी हैं शरीर यह कि वह भूठा पृथक्त्व है जा सामाजिक जीवनमें एक श्रावदयक तत्वकी भांति विचार या विवेकके विरुद्ध बहुतसे तकीके लिए उत्तरदायी हैं। दूसरे सामाजिक मस्तिष्कको प्रकृति सम्बन्धी सिद्धान्तोंका भ्रालोचक वर्णन दिया जाएगा। इस विवादको वहुत्तसे लोग निष्फल भौर शुष्क समभेंगे, परन्तु दुर्भाग्यवश जो लोग सामूहिक मस्तिष्क की प्रकृतिके इस प्रकारकें विवादकों घुणाकी दृष्टिसे देखते हूँ वह प्रायः वही लोग होते हैं जो श्रवेतन रूपमें इसके लिए बाहर हैं, श्लौर जो अपने सामाजिक मनोविज्ञानकी यथार्थ कार्यशीलतामं एक सामाजिक मस्तिष्कके

१० सामाजिक मनोविज्ञान

विचारका प्रयोग यह वात विन जाने करते हैं कि वह ऐसा कर रहे हैं भौर जिसका परिणाम विनाशकारी है, विशेषकर राजनीतिक दर्शन में! ब्नतः इस विचार पर आलोचनात्मक दृष्टिमें विवाद करना श्रौर यह निश्चित करना कि इसका मनोव॑ज्ञानिक शव्दोंमें एक समझने योग्य वर्णन दिया जा सकता हूं, सार्थक मालूम होता हैं। इस विद्लेषणका परिणाम यह दिखाता हैं कि सामाजिक या सामूहिक मस्तिप्कका विचार सामाजिक सिद्धान्तके लिए वहुमूल्य नहीं हैं ग्रौर यह बहुत आपत्तियोंसे पूर्ण है विशेषकर सामाजिक दर्शनके क्षेत्रमें। श्रतः वह सामाजिक मस्तिष्ककी वात करते समय लोगोंके मस्तिष्कमें रहनेवाले वास्तविक तथ्योंका उन शब्दोंमें वर्णन करने का प्रयास किया जाएगा जो सामाजिक मस्तिप्कको उयलक्षित नहीं करते। श्रत: इसके बाद रूढ़ि और श्राचार सामान्येच्छा और जनमत मूलवंशीय और राष्ट्रीय विशेपताओंकी प्रकृति तथा विभिन्न प्रकारके सामाजिक समुदायों जैसे कि जनता आदि की एकता पर विवाद किया जाएगा। अ्रन्तिम श्रष्यायमें प्रडातंत्रीय संगठवकी समस्याओ्रों पर सामाजिक मनोविज्ञानके परिणामकि प्रमावे पर संक्षेपर्मं विचार होगा।

अव्याय १-

मूलप्रवृत्ति की सामान्य प्रकृति

लौकिक ही नहीं मनोवैज्ञानिक साहित्य भी (मूलप्रवृत्ति) शब्दका अयोग अ्रभी तक बहुत अ्रस्पष्टतासे किया जा रहा हैं, परन्तु हालकी खोजों के कारण कुछ सन्देह श्रौर मिथ्यावोध दूर हो गए हैं। श्रव सामान्यतया यह्‌ माना जाता है कि मूलप्रवृत्तियां सर्वया श्रपरिवर्तनशील, श्रशुद्धिरहित और प्राणिविद्या (00]089) की दृष्टिसे सदा ही लाभप्रद नहीं होतीं। भौर भव यह भी सामानन्‍्यतया माना जाता हूँ कि उनकी व्याख्या प्राणिविद्याके शब्दों में विशेष उत्तेजनाओोंकी प्रतिक्रियाके पैतृक क्रमोंकी भांति की जानी चहिए। जीवन संघर्षम मूल्यवान्‌ होनेके कारण यह क्रम जातीय-परम्परासे चले था रहे हैं। यह माना जाता है कि प्रोटोप्लाज़्म ([700]9»7) की विशेषता बताने वाले श्राकस्मिक श्रौर विभिन्न कार्यो्में से कुछ जो लाभप्रद्ध सिद्ध हुए वह जातिमें स्थापित हो गए श्रौर उनको परम्परा-निर्माणमें एक थ्राधार दे दिया गया। इसी प्रकार मूलप्रवृत्तिशील क्रियासे हमारा तात्पय॑ गतिकी उन न्यूनाधिक पेचीली श्रेणियोंको सूचित करना हैं जो मूलवंशके लाभ की दृष्टिसे ग्रहण की गई हँ। वह जन्मसे निर्धारित श्रौर व्यक्तिके पूर्वातुभव से स्वतंत्र हें। यहां तक तो एक मत हैं, परन्तु गतिकी इन श्रेणियों श्रथवा आ्रात्मिक ([7590708/) प्रणालियोंके सम्बन्धर्मे मतभेद अब भी चालू है। इस वातको स्पष्ट करनेके लिए यह श्रावइयक है कि मूलप्रवृत्ति प्रतिक्षेप क्रिया ([आीछ७र 380007), भ्रौर वीद्धिक कार्यका क्रमानुसार सम्बन्ध समझा जाए।

कुछ लेखक इस विपयमें ह॒वंर्ट स्पेंसर का अ्रनुसरण करते हुए मूलप्रवृत्ति की परिभाषा मिश्रित प्रतिक्षेप क्रिया कहकर करते हेँ। परन्तु जैसा कि ओ्रोफ़ेसर लॉयड मॉर्गन (॥.090 ॥/0722॥) ने दिखाया है, यह दोनों

५१२ सामाजिक मनोविज्ञान

प्रकृतिमें भिन्न हें, जवकि प्रतिक्षेप क्रिया (005 ४०६४०॥) एक निश्चित और स्थानगत क्रिया है, मूलप्रवृत्तिशील व्यवह्यार सम्पूर्ण प्राणीकी प्रतिक्रिया हैं। इनकी विभिन्नता वतानेके लिए कदाचित्‌ अधिक महत्त्वपूर्ण वात यह है कि इसका निर्वारण श्रीर शासन सन्‍्तोप चाहने वाली एक विशेष उमंग (77000) या खिचाव, अ्रभिलापा या लालसाके द्वारा होता है, जो कार्यकी सारी खूंखला सम्पूर्ण होने तक वनी रहती हूँ। एक मूलप्रवृत्ति जब क्रिया- शील होती है, या यों कही जाए कि आ्रावेगशील (॥00[596) प्रवृत्तिकी होती है तव इनमें ज्ञानात्मक (00 शाधए७) और रागात्मक (8०(५०९) दोनों चेतन पक्ष होते हँ। अतः चाहे गति-पक्षमें मूलप्रावृत्तिक व्यवहार कई एक प्रतिक्षेप कार्योसे भरा हो फिर भी हम इसमें सम्मिल्रित आत्तमिक' (05५८0708४४ ) प्रणा लियोंके द्वारा इसे केवल प्रतिक्षेप (78765 ) व्यवहार से अलग कर सकते हैं।

मूलप्रवृत्ति श्रीर वुद्धिके सम्बन्धकी कठिन समस्या हमारे सामने हूँ। उपरोक्त तकंसति पता चलता है कि मूलप्रवृत्तियोंमें एक चेतन पक्ष भी होता: हैं, परन्तु क्या वह वुद्धिकी सजातीय हे? मूलप्रवृत्तिके “विशुद्ध उदाहरण,, विश्येपकर उच्चतर जीवोंमें, मिलना कठिन हैँ, इस कारण यह प्रश्त और भी कठिव हो जाता है, तथा उनमें से वंश परम्परा और अनुभवका भाग श्रलण करना सरल नहीं है। पद्मु व्यवहार विभिन्न और झाग्रह युक्त ((7४85/677) प्रयत्न प्रदर्शित करता है श्रौर इसमें सन्देह नहीं कि किसी किसी रूपमें प्राणी अनु मवसे अवश्य सोखता हैं। विभिन्न प्रयत्नके साथ यह आग्रह अनेकों मूलअवृ त्तिशील क्रियाश्रोर्मे भी दिखाई पड़ता है श्रीर यह स्पष्ट हैं कि उन कार्बोर्मे अनुभवसे सीखना श्रवद्य होता होगा। कुछ भी हो चरित्र श्रौर विधिमें मूलप्रवृत्ति और बुद्धि भिन्न हैं। इस प्रकार मूलप्रवृत्ति श्रनुभवसे स्वतंत्र है और प्रायः जन्मके समय पूर्ण होती है। वौद्धिक कार्यमें एक उद्देश्य या प्रयोजनका पूर्व ज्ञान होता है, परन्तु यह मानना कठिन है कि' ऐसा हो सकता हैं, जैसे कीड़ोंकी पेचीली मूलप्रवृत्तियोंमें। जिम्न जटिलता: तथा झआाइचर्यजनक व्यवस्थाको मूलप्रवृत्तिशील कार्य प्रकट करते हैं, वह सिद्ध करती हैँ कि उनका प्रयोजनमूलक होना स्पप्ट है, क्योंकि मनुप्य- प्नुभवके उदाहरणके श्रावार पर निर्णय करनेसे यह समझा जा सकता हूँ क्िः

मूलप्रवृत्ति की सामान्य प्रकृति १३

'यह किसो तरह कार्योकी एक श्रकेली श्वृंखलामें सीमित नहीं रह सकते थे झौर उनको करने योग्य प्राणी वह वात नहीं प्रदर्शित करते जिसे फ़ेवर (778070) ने “नितान्त मृ्खेता” कहा है, जबकि उन्हें ऐसी परिस्थितिका सामना करना पड़ता जिसमें मूलप्रवृत्ति कुछ सहारा नहीं लगाती | यद्यपि मूलप्रवृत्ति बिल्कुल पूर्वरचित निर्माण पर शब्ाश्नित है, फिर भी यह मशीनकी तरह नहीं है, भौर यद्यपि यह प्रयोजनसे निर्धारित नहीं होती तथापि इससे पूर्णतया स्वतंत्र नहीं है। वास्तवर्में जैसा प्रोफ़ेसर हॉबहाउस ([4097/0786)* ने स्पष्टतया दिखाया है, कि बुद्धिका विकास होना मूलम्रवृत्तिके क्षेत्रके अ्रन्तर्गत हैं और जैसे-जैसे इसका विकास होता जाता है, यह मूलप्रवृत्तिशील क्रियाओंकी स्थिरता और दृढ़ताको कम करती जाती है। शुद्ध मूलप्रवृत्तियोंमें एक श्राग्रहयुक्त प्रकृतिके द्वारा उसे छुछ रिणामोंकी प्राप्तिकी ओर निर्दिष्ट कर दिया जाता है, श्रीर कार्य सब प्रतिक्षिप्त (7065)या ज्ञान-गति सम्बन्धी (5288708770407) होते हैं। सब ग्रवस्थाश्रोंको एक व्यवस्थित प्रकारसे पार करना होता है, और बहुत संकुचित क्षेत्रके श्रतिरिक्त उसमें किसी भी श्रवस्था पर परिवर्तनके लिए स्थान नहीं होता। बढ़ती हुई चुद्धिके साथ मध्यम-पद पर ध्यान कम होता जाता है भ्रौर केवल श्रन्तिम उद्देश्य विशेपता रखता है। सबसे पहले वृद्धि केवल उन्हीं उद्देश्योंकी ग्रहण करती है जो बिल्कुल सामने हों, और यदि इसकी प्राप्तिके साधारण साधन श्रसफल हो जाएं तव श्रन्य साधन ग्रहण करने होंगे, परन्तु यदि कार्य पूर्णतया मूलग्रवत्तिशील होता वो साधारण फार्यक्रममें विष्त पड़नेसे पहलेकी सारी कार्य प्रणाली खंडित हो जाती। धीरे-धीरे वृद्धिका क्षेत्र श्रौर पूर्व दृष्टिकी शक्षित वढ़ती जाती है, यह दूर मौर भ्रधिक दूरके उद्देष्योंको ग्रहण करने लगती हैं, थ्रौर श्रन्तमें यह आाचरणके सम्पूर्ण प्रयोजनको ग्रहण करनेके योग्य हो जाती है। इस श्रवस्थामें श्राचरणके उद्देश्य चाहे परम्परा क्रमके द्वारा निर्वारित हों, परन्तु उनकी सिद्धिके सावन बहुत भिन्न होंगे, और प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभवके

# "माइंड इन इव्योल्युशन अध्याय (“शापएत /2ए0प- 807” (70. ५४१)

्ड सामाजिक सनोविज्ञान

अनुसार उनको निश्चित करेगा। जहां तक एक कार्य मूलश्रावृत्तिक है जैसे ही ऋ्रमचद्ध पद श्राते जाएंगे वह मूलभावता या “उमंग” (“हांग्रा- गत?) के आधार पर किए जाएंगे। यह भावना या “उमंग” किसी श्रस्पष्ट मावना या सन्‍्तोपकी कामनाको जागृत करती हैँ और ग्रहण करिए गए पद, प्रतिक्रियाक्ती परम्परागत तरीक़े होंगे, जिनमें बहुत कम विभिन्नता होगी। वृद्धिके विकाश्नसे कार्य प्रणाली श्रधिक व्यवहार योग्य हो जाती हैं झौर दिए हुए उद्ृब्योंक्री प्राप्तिकि लिए साधनोंमें परिवर्तन सम्भव हो जाता है। मूलप्रवृत्तिशील क्रियाग्नोंकी विशेषता हैँ पुरानी और यांत्िक विधियां काममें लाना। परन्तु वुद्धिके विकासके कारण इससे भिन्न विधियां कार्यशील हो सकती हूँ।

उपरोक्त विवादसे पता चलता है कि प्र॒त्येक्र मूलप्रवृत्तिमें क्रियात्मक (००॥8ए९) , ज्ञानात्मक (०0१7४ ४6), श्रीर रागात्मक (8र80- +9५86) पक्ष होते हैं। उत्तेजताका एक प्रत्वक्षीकरण ([728089#0॥) एक भावना तत्त्व होती है, जो एक श्राकांक्षा या लालसा, या प्रधिक स्पष्ट रूपमें, हचिकी एक भावना या श्रीचित्य कहा जा सकता है, जिसके साथ बहुत-सी गतियां या गति-संवेदन (5808800॥) होते हँ--कार्यको पूर्तिमें सन्‍्तोप और अपूर्तिमें श्रसन्‍्तोपकी भावना प्रोफ़ेतर हॉवहॉउस ने दिखाया कि मूलप्रवृत्तियोंमें जो कुछ भी अनुकूलता हो सकती हूँ वह रुचि तत्त्वके कारण है। शुद्ध मूलप्रवृत्तियोंमें वह कार्य-श्रेणो जो स्थायी प्रकृति या लालसा के दवावके कारण अपने मार्गका भ्रनुतरण करती है वह बहुत कुछ शूद्ध प्रकार के प्रतिक्षेपके समान हैं। सुधार श्रीर श्रनुकूलता धीरे-धीरे होती रहती है। प्रारम्भमें केवल ज्ञान-गति-्सम्बन्धी कार्य होते हूँ, जिनमें श्रस्पष्ट इन्द्रिय-संयोग (58056-59॥6995), निर्णयका एक प्राथमिक कार्य सम्मिलित होता हैं, जो विभिन्न अवस्थाप्रोंकी श्रावश्यकताश्रोंके श्रनुकूल होता है और श्रत्तमें हम ऐसी श्रवस्थाकों पहुंचते हैँ जहां वाघाएं दूर हो जाती हे और कठिन परिस्वितियोंका सामना इस प्रकार किया जाता हूँ जिप्तकी व्याख्या गन भव-प्राप्त वौद्धिक ज्ञानके सन्दर्मसे ही की जा सकती है

डा० मैकडयगल ([४००0पघ९०।) की पुस्तकर्म मूलप्रवृतिके ज्ञानात्मक (00200४6) भ्ौर रागात्मक (200९८) पक्षों पर

मूलप्रवृत्ति की सामान्य प्रकृति श्र

जोर दिया गया है। भौर उनके सिद्धान्त पर विचार करनेसे हमें मूलप्रवृत्तिकी प्रकृतिकेविचा रको स्पष्ट करनेमें सहायता मिलेगी। डा ०मेकड्यूगल मूलप्रवृत्ति का वर्णन मस्तिष्कके तीन परिचित विभागों ज्ञानात्मक, क्रियात्मक श्रीर रागात्मक प्रवृत्तियों पर करते हें श्रीर वह यह मान लेते हैं कि यह तत्त्व नाड़ी मंडल (707ए00ए5$ 89867) के विभिन्न भागोंके श्रर्थात्‌ ज्ञानवाही, (8रशिशआओं), क्रियावाही (70407) तथा केद्धीय भागोंके श्रनुरूप हेँ। उनके अनुसार मूलप्रवृत्ति एक रागात्मक (86098) या भावना प्रकृति, एक या भ्रधिक ज्ञानात्मक प्रकृति तथा एक क्रियात्मक प्रकृतिके वीचका एक स्वाभाविक संयोग हैँ। मूलप्रवृत्तिशील क्रियामें किसी उत्तेजनाका प्रत्यक्षी- करण ([00706070॥) और उसके प्रति ध्यान, ऐसे प्रत्यक्षीकरण पर संवेगशोल उत्तेजना (8770#074/ ७५४०६४०७॥7९॥0), और इस सम्बन्ध में एक किसी निश्चित व्यवस्थासे कार्य करनेका आवेग (]7]0ए86) सम्मिलित है। यह डा० मैकड्यूगल के मतका श्रंग है कि (१) प्रत्येक मूलप्रवृत्तिके साथ एक विशेष प्रकारका संवेगात्मक उत्तेजन होता है यद्यपि कुछ स्थितियोंमं इसमें व्यक्तिगत पृथकत्व नहीं होता श्रौर (२) जबकि उत्तेजित मूलप्रवृत्ति प्रधान होती है, संवेगात्मक उत्तेजनामें, जो कि इसका रागात्मक रूप है, एक गुण होता है जो इसकी विशेषता और आ्रासाधारणता हैँ और जिसे एक “प्रारम्मिक संवेग” कह सकते हैं। (३) भर डा० मैकूड्यूगल के अ्रनुसार ज्ञानवाही (8र्विकैअ०१7() और गति तत्व और इसलिए हमारी प्रकृतिके ज्ञानात्मक भौर क्रियात्मक मागमें वहुत परिवर्तन हो सकता है, जब कि केन्द्रीय भाग श्रत: संवेगशील पक्ष स्थायी भ्रौर पैतृक है और मनुष्यमें ध्रपरिवर्तित रहता है। फलस्वरूप मनुष्यमें ज्ञानात्मक विधियां और मूल- प्रावृत्तिककार्योकी शारीरिक गतियां अनु भवके वढ़नेके साथ अ्रधिक परिवर्तित झौर गहन हो जाती हैं, जवकि संवेगात्मक उत्तेजन श्रौर साथकी नर्वेंस् क्रिया सब व्यक्तियों में साधारण और सव परिस्थितियोंमें समान रहती हैं।

डा० मैक्‌ड्यूगल ने उन मूलप्रवृत्तियोंकी सूची दी है जिनको वह मौलिक भर प्रधान मानते हूं प्रत्येकका एक सम्पूर्ण और विशिष्ट अ्रंग एक स्पष्ट “प्रारम्भिक” संवेग हैं: पलायन (#287) की मूलप्रवृत्ति श्रौर भय (887) का संवेग निवृत्ति (॥60प्रांआं०00) की मूलप्रवृत्ति श्नौर घृणा

१६ ' सामाजिक मनोविज्ञान

(05808) का संवेग। उत्सुकता (८ए7ा।05/09) की मूलप्रवत्ति श्रौर श्रारंचर्य (प़0067/) का संवेग। यूयूत्सा (98800) की मूल- प्रवृत्ति और कोष (7827) का संवेग दैन्‍्यवृत्ति (5९।[-3098507 शा) की मूलप्रवृत्ति श्रीर श्रधीनता (5प0]6०४४०॥) का संवेग, (निर्षेघार्थक श्रात्म भावना) श्रात्मगौरव (50]--8550700॥) (शआात्म प्रदर्शन 5०. 0589) की मूलप्रवृत्ति और गर्व (88/0]) का संवेग (ययार्य आ्ात्म- भावना) पृत्र-कामता (07/074४) की मूलप्रवृत्ति और वात्सल्य ((2706) का संवेग। |

यह सात मूलप्रवृत्तियों श्रीर उनके प्रारम्भिक संवेगोंसे लगभग सब साधारणतया माने जानेंवाले संवेग निकल श्राते हैं। इनके श्रतिरिक्त शरीर भी मूलप्रवृतियां हूँ जिनका “संवेगोंकी उत्पत्तिमें थोड़ा भाग है,” परन्तु इनके कुछ आवेग (777[0 096 ) श्रवश्य हैं जिनका सामाजिक जीवन में श्रधिक

त्व है। इनमें पुनरुत्यादन (72[70प्र८007) की मलम्रब्ृत्ति, सामूहिक (27672थ47008) मूलप्रवृत्ति, संग्रह (00!00807) की मूलप्रवृत्ति, रचना (0075070०(07) मूलप्रवृत्ति, और कुछ छोटी मूलप्रवृत्तियां ज॑से घृटनियों श्रीर पैदल चलनेको बढ़ावा देनेंवाली, सम्मिलित हैं। इसके अ्रतिरिक्त कुछ सामान्य शरीर अविश्येप स्वाभाविक प्रवृत्तियां ((2708706858) भी हैं, जैसे सहानुभूति, भावना (08[78) या संवेगके श्रनुभव करनेकी प्रवृत्ति, जब हम दूसरोंमें उसी भावना वा संवेगका प्रदर्शन देख रहे हों, संकेत-योग्यता (ड॥22०87 0779), अनुकरणकी भरवृत्ति खेलने और आदत डालनेकी प्रवृत्ति।

डा०्मेकड्यूगल के अनुसार मूलप्रवृत्ति मनुप्यकी प्रत्येक क्रियाका ब्रावार है। चुविकसित मस्तिष्कके कार्य मूलप्रवृत्तिके द्वारा दिए गए अ्रावेगोंकों कार्य रूपमें परिणत करनेके साधनमात्र हैं, दुःख सुख केवल पय प्रदर्शकका काम करते है प्रौर आदतें केवल मूलश्रवृत्तियोंकी सेवामें ही लगी रहती हैं। “तव हम कह सकते हैं कि मूलप्रवृत्तियां, परोक्ष या प्रत्यक्ष इससे मनुष्यके सब कार्योक्री प्रारम्भिक संचालक हें। किसी मूलग्रवृत्ति (या मूलग्रवृत्ति-जन्य किसी आ्रादत) की आावेगशील (77.0 09४2)वा क्रियात्मक शक्ति कितनी भी उदासीन या कामनारहित मालूम होनेवाली विचार रु॒ईंखलाको प्र ने

सूलप्रवृत्ति को सामान्य प्रकृति १७

उद्देश्यकी ओर ले जाती है, और प्रत्येक शारीरिक क्रिया प्रारम्भ होती और चालू रहती हैं'“इन मूलप्रवृत्तिशील श्रवस्थाओं को इनकी शक्तिशाली प्रवृत्तियों सहित हटा दो, तो जीवधारी किसी भी प्रकारकी क्रिया करनेमें श्रसमर्थ हो जाएगा; यह उतना ही निग्चल शौर गतिहीन पड़ा रहेगा जैसे बड़ी बढ़िया घड़ी जिसकी वड़ी कमानी हटा दी गई हो, या वह स्टीम इंजन जिसको श्राग बुझा दी गई हो (पृष्ठ ५१-५५)॥”

डा० मेकड्यूगल ने श्रपने सिद्धान्तकी व्याख्या बहुत ही श्राकर्पक प्रकार से की है, श्रीर उनकी योजनामें एक प्रकारकी शिल्प विद्या जैसी सरलता हैं, जिसके कारण इसके वहुतसे भ्नुगामी हो गए हैं श्रोर खोजके वहुतसे क्षेत्रों में इसका प्रयोग करणीय श्रनुमान (9077078 9]0077658$) की भांति किया गया हँ और इससे बहुतसे वहुमूल्य परिणाम निकले हैं परन्तु यह सिद्धान्त श्रालोचनासे वच सका और इसकी वहुत-सी सारभूत बातों पर प्रश्न किए गए हैं। निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जा सकता है।

सामाजिक मनोविज्ञानमें, ज्ञानात्मक, क्रियात्मक और रागात्मक प्रवृत्तियोंमें मस्तिष्कका विभाजन कुछ हद तक वहुत सूक्ष्म रूपसे किया गया मालूम होता है। वास्तवमें वह एक भ्रकेली प्रणालीके स्वरूप हैं! विशेषकर भावना श्रौर क्रियाका बहुत निकठ सम्बन्ध हैं। जैसे भ्रप्नसन्नताकी भावना उसे दूर करतेके लिए भ्रारम्भ होनेवाली प्रवृत्ति है, और भ्रानन्दकी भावना उसकी रक्षा करनेकी ब्रारम्भ होने वाली प्रवृत्ति है।

२. दूसरे इस वात पर भी प्रइन किया जा सकता हूँ कि डा० मैक्‌ड्यूगल का एक मूलप्रवृत्तिको अलग-अलग स्वभावोंका संयोग मानना, जिन्हें बह रचनात्मक इकाइयां कहते है ज॑से एक ज्ञान|त्मक स्वभाव, झीर एक क्रिया- रागात्मक स्वभाव, कहां तक ठीक है। जैसा कि प्रोफ़ेसर स्टाउट ने कह है, “बह तभी ठीक हो सकता है जब यह साफ़-साफ़ दिखा दिया जाए कि प्र॒त्पेक मूलप्रवृत्तिशील क्रियाके श्रन्दर किसी उसी प्रकृतिकी चीज़का आन स्वाभा- विकतया निश्चित है जो कि अन्यथा भ्रनुभवसे सीखा जाता है यदि उदाहरण के लिए हम यह मान सकते कि श्रगर एक छोटी गिलहरीको अखरोट मिलता है तो वह अ्रपनी स्वाभाविक रचनासे यह जान लेती हूँ कि इसके श्रन्दर मिरी है, और यदि हम यह मान सकते कि प्रत्येक मूलप्रवृत्तिशील

स्न्तसण०

प्र हर सेवश्य है) ऐसा बिक ज्ञात होता 3 पो एक हि) जानात्मक अवशस्थाके अस्तित्वऊ्ो “पअवृत्तिकी रिभापाक, श्रंग जगा शआबद छह हीवा।! प्र्न्तु पश्योको केवल अवश्यकत) « मिन्प्तवा जानने का पेमभनेक) शक्ति, भर विद्येप भान चिक्ष हैं, जिमड्ढे हरा अ्न्यको छोड़कर अंडे पदार्धोक+ श्रोर ध्यान नि हैं।” श७ रड्यूगल विश्येप अ।नात्मक अवस्थाओंक्े ब्रा के रचनात्मक ईैकाइयोक) भांति सिर 3. हीं मालूम होते /7+ रे फराचित यह ध्यान देना आवश्चकहे कि बगल के वर्णन बच पि निस्फादेल उनका यह 4 आय नहीं हैं, पज़्ता $ वृत्तियां < वतंत्र रचनात्मक रकाइयोंक वगभग यांत्रिक (५08४ (2६ 7708]) समूह है, श्र ्प्णं जीवकतसे इन पहित मलप्स पतियों एक वपडल-पा है +रन्तु बह स्मरण पाहिए रलप्रावत्तिक क्रय तब म्पू्णं जीवधातेक) अतिक्रिया हंती है, औ्रौर वि॥ तत्तियां एक अकारसे विधेय हैं जिनके उडढे जो हैं, यह वह तसेके उनके हर जीवधारी अपनेको व्यवतत करता श्र) रखता हू साः कह क्षजाए पी र-विज्ञान-सम्कन्वी (80085 / अवृत्तिके कम तत्व नाड़ी # (7०४०0६ ) के विशेष अगरसि सम्बद्ध हैं, केवल अनुमान मात्र है। ३. हा० मेकड्यूगल्न क्षे विरुद्ध आलोचनाकी) तारा वह ५) उनके उलमवृत्ति और से के श्रा' पस्वन्धके विज्वारोक्े विरुद्ध कक्षित

सवेग पम्कन्चक्े

/ यह अब उामानयतया मान लिया गया हैं कि संबेग श्रीर इकप्रवृत्तिका

निकट पेम्जन्च है, तु ला मकड्यगन्न के व् हूँ

कि इसके ग्रनुच्तार जद्ेग मू के विज्येष

है जो

लक, चिद्धान्तकी बेच *.. गे उत्तेजक अंग हैं, और बह मत्येक गे संबेग ले

मूलप्रवृत्ति फी सामान्य प्रकृति १६

डा० शेड दोनों विभिन्न पदावलीका प्रयोग करते हैँ, और एक श्रथे में वह मूलप्रवृत्ति और संवेगके सम्वन्धको उल्टी प्रकारसे मानते हैं। मैक्‌ड्यूगल के अनुसार संवेग मूलप्रवृत्तिकी क्रियाशील पद्धतिका अंग है ओर शैंड सोचते हैं कि कमसे कम कुछ मूलप्रवृत्तियां संवेगकी सम्पूर्ण पद्धतिका भ्रंग हैं। यह केवल शब्दोंका ही हेरफेर नहीं है, वरन्‌ इसमें दृष्टिकोणके मौलिक भेद हें। जो कुछ भी हो श्री शैंड ने भी निम्न बातोंके सम्बन्धमें मेक्‌ड्यूगल के विरुद्ध श्रच्छी सफ़ाई दी है।

१. जन्मसे निर्वारित एक विशिष्ट संवेगको सम्मिलित किए बिना भी एक मूलप्रवृत्ति उत्तेजित की जा सकती हैं। यह नहीं दिखाया गया है कि. एक धिल्कुल भ्रकेला जन्मजात संवेग काम कर सकता है जैसे घोंसला वनाने,. पीछा करने और शिकार पकड़ने में।

२. उसी प्रारम्भिक संवेगका सम्बन्ध बहुत-सी मूलप्रवृत्तियों या वल्किः क्रियात्मक अश्रवस्थाश्रों (०078/ए९८ 09.70900778) से हो सकता हैं; जैसे भयका संवेग विभिन्न प्रकारके व्यवहार उत्पन्न कर सकता हैं, जैसे भागना, छिपना, मृत समान वन जाना, चुव रहना, गतिहीन हो वा, चिल्लाना. श्रीर बचनेक्ी श्रत्यधिक चेष्ठा करना।

३. वही मूलप्रवृत्ति विभिन्न संवेगोंके उद्देश्योंके प्रति सहायक हो सकती है जैसे पक्षियोंमें उड़नेकी (पलायन) मूलप्रवृत्तिका सम्बन्ध केवल भयके' संवेगसे नहीं है वरन्‌ श्रन्यसे भी है, जैसे क्रोध, व्यायामका अ/नन्‍द। गतिकी मूलप्रवृत्ति भय, क्रोच और घृणाके संवेगोंकी सहायक होती हैं।

सर्वोपरि, डा० मैक्‌ड्यूगल के विरुद्ध यह मानना चाहिए कि मूलअवृत्ति का रागात्मक या “रुचि रूप संवेग नहीं, वरन्‌ कुछ श्रवस्थाश्रोंमें संवेगमें विकसिक हो जाता है, जँसे जब किसी प्रवृत्तिमें देर या रकावट हो जाती हूँ या जब उत्तेजन (७>८टॉ2॥7877) इतना श्रधिक हो जाता हैं कि कार्यसे सन्तोप नहीं होता। यह ध्यान रखना होगा कि जव किसी मूलप्रवृत्तिकी क्रियात्मक प्रवृत्तिका सन्‍्तोष तुरन्त हो जाता है तवसंवेगशील भाग न्यूनत्तम होता है। संवेगका कार्य रुचि भर श्राविगकों पुनः शक्ति प्रदात करना, श्रावेगके उद्देश्यको ध्यानके केन्द्रमे रखना ग्रौर सन्तोपप्रद क्रिया पर जोर देना मालूम होता है। जैसा कि श्री शेंड ने कहा हैँ यह मूलप्रवृत्तिसे प्रधिक:

२० सासाजिक मनोविज्ञान

परिवतेनशील है और जब मूलप्रव॒त्ति सरलतासे कार्य नहीं करती होती या जव उसके कार्य सन्तोप नहीं मिलता तब यह जागृत होता है। (देखिए ब्रिटिश जनल ऑफ़ साइकोलॉजी, नवम्बर १६१६: "दि जेनेरेशन एंड कंट्रोल श्ॉफ़ इमोशन” )।

४. डा० मेकड्यूगल अपनी गिनाई हुई मृलप्रवृत्तियोंकों मनुष्यके सव कार्योकी प्रधान संचालक ज्नौर सम्पूर्ण व्यवह्ारको प्रेरक शक्ति देने वाली मानते हैं। इसमें बहुत सावधानीसे निरुषण करनेकी योग्यताकी झ्ावश्यकत्ता 'है। मैकूड्यूगल की मूलग्रवृतियां वास्तवमें प्रारम्भिक तत्व या ऐकिक नियम नहीं हैं वल्कि जैसा कि लॉयड मॉगन मानते हैं उनमें से प्रत्येक जातीय नाम है जिसमें श्रनेक प्रकारके व्यवहार सम्मिलित हैं, जो कि सामान्य प्रकारसे उन्हीं

'उद्देश्योंके सहायक होते है जैसे, जव हम झ्रात्मगीरव (58|7-85507807) या श्रघीनता (5770]४०४०१॥) की मूलप्रवृत्तिकी वात करते हैं तव हम विभिन्न प्रकारके व्यवहारोंम साधारणत: कुछ विशेषताओं की निदिष्ट करते हैं। यह सन्देहयुवत हूँ कि प्रवृत्तियोंको शक्तियां कहना ठीक हूं। प्रवृतियां केवल किन्‍्हीं मूलप्रवृत्तिशील प्रणालियों ([770085589) की चेतन भाग हँ---ऐसी प्रणालियोंकी तीब्नताका अ्नुभूत भाग, परन्तु उनको उत्पन्न करनेवाली शक्तियां नहीं। श्रतःजव हम मूलश्रवृत्तियोंको “प्रधान संचालक” कहते हें तो उसका श्रर्थ हम इतना ही लगा सकते हैं कि जीवनकी सव रुचियोंको कुछ शीर्षकोंके अन्दर संग्रह किया जा सकता है। अर्थात्‌ वह सब धात्मगौरव, उत्सुकता, स्रर्वा आदिके ही रूप हैं। परन्तु इस स्थिति पर भी डा० बुडवर्य (५४००0ए०7) ने प्रश्व किया है। वह मानते हैं कि प्रत्येक मानुपिक

गेग्यवाका एक रुचि-पक्ष होता है, “संगीतकी योग्वताके साथ सांग्रीतिक रूचि, संख्यावाचक सम्बन्धोंकों व्यवहारमें लानेके लिए संख्या रुचि, यांत्रिक प्रयोगोंके साथ यंत्रकलामें रुचि, इत्यादि सब मनृष्यो्म सामान्यतया और केवल अपवादभत व्यवितयों में शक्तिशाली होनेवाली योग्यत/प्रो्मे ऐसे ही होता है” (० ज़ाक्षामरं० ?25ए000297 74)

डा० मैकडयगल का स्पष्ट झपसे कहना है कि मनुप्यके सब कार्य प्रारम्मिक मलप्रवृत्तियों और उनके तखड्बोंके अन्तर्गत संग्रहीत होने चाहिएं परन्तु जैसा कि हमने देखा है, प्रारम्भिक मूलप्रवृत्तियां अपनी सर्वोत्तिम अ्रवस्था

मूलप्रवृत्ति की सामान्य प्रकृति र्शः

में भी, केवल जातीय नाम हैं, जिनमें प्रतिक्रियाके भ्रनेक विभिन्न प्रकार सम्मिलित हैं, और यह सन्देहजनक है कि उनसे कुछ और प्राप्त करनेके

प्रयत्नमें कुछलाभ भी हो सकता है। वास्तवमें, जैसा कि में सोचता हूं प्रोफ़ेसर लॉयड मॉर्गन ने कहीं पर कहा है, सम्पूर्ण व्यवहारकी प्रवृत्ति समागम करने

की हैँ। मूलप्रवृत्तियां वातावरणकी न्यूनाधिक उत्तेजनाके श्रति प्र तिक्रियाके' निश्चित प्रकार हैं श्नौर एक श्रर्थमें वह सव प्रारम्भिक हैं, अर्थात्‌ उनकी

उत्पत्ति वातावरणको श्रनुकूल बनाने में होती है। क्‍या ऐसा नहीं हो सकता कि मनुणष्यके लिए ऐसे नए उद्देश्य निकल श्ाएं जो प्रारम्भिक मूलप्रवृत्तियों

का अनुप्रण करते हों ? जो कुछ भी हो हमें प्रोफ़ेसर वुच्चर्थ के साथ

मानना चाहिए कि “मैंकडयूगल जितना स्वीकार करेंगे उसकी श्रपेक्षा मनुष्य जातिके स्वाभाविक प्रेर कों (70॥8928) की पद्धति विशिष्ट मनुष्य

व्यवहारके प्रति श्रधिक विस्तृत श्रीर श्रधिक उचित है ।*** *** संसार रुचिकर' है केवल इसलिए नहीं कि यह हमें भोजन श्रीर झ्राश्नव तया हमारी सब प्रारम्भिक मूलप्रवृत्तियोंको उत्तेजना देता है, वरन्‌ इसलिए कि इसकी बहुत-- सी वाह्म विशेपताशंके अनुकूल बातें हमारे अन्दर हैं श्रीर इन विशेषताओंसेः व्यवहार करनेमें हम रुचिकर और सन्ताीपप्रद क्रियाञ्नोके लिए बड़ी सरलता

से उत्तेजित हो जाते हैं। मनुष्य जातिके प्रेरकों (70[928) का क्षेत्र उस- संसारकी भांति विस्तृत है जिसक्रे साथ वह व्यवहार कर सकता और समझ. सकता है।” (“॥2एशभा० 75५८00008५7 99 75-6) .

५. मनुष्यमें मूलप्रवृत्तियोंके स्थान-सम्बन्धी मतके विरुद्ध डा०मक्द्यूगल का कदाचित्‌ सबसे प्रधान ग्राक्षेप यह है कि उनका भुकाव मूलप्रवृत्तियोंकोः श्रात्म जीवित श्रौर सम्पूर्ण जीवधारीकों उनका एक प्रकारका समुदाय मानने की ओर है। परन्तु सच तो यह है कि यद्यपि निस्सन्देह मनृष्य प्रकृतिका' धाधार पैतृक हैं भर मूलप्रवृत्तियों तथा संवेयों में पाया जाता है, परन्तु फिर भी पैतृक प्रवृत्तियां भ्रलग जीवित नड्ठीं रहती, वरन्‌ वह एक दूसरेमें मिलतीं भौर वुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण होती हें। मूलप्रवृतियां श्रखंड और श्रपरिवर्तित रही हैँ यह दिखानेके लिए वहुत कम प्रमाण मिलेगा। हमारी उमंगें पृथक विभागोंसे निभित हैं श्लौर उनके अन्दर मूलप्रवृत्तियां ऐसे हैं जैसे सोल्यूसन- (50]7007)) में हों। प्रायः वह प्रेरक (0096) जिनका उद्गम मूल-

र२ सामाजिक भनोविज्ञान

प्रवृत्तिशील हैं, अपनेकों उन मूलप्रवत्तिशील गतियोंके द्वारा प्रदर्शित नहीं करते जो मौलिक झूपसे मूलप्रवृत्तिके श्रनुरूप हें। दूसरे झब्दोंमें, हमारी वत्तमान प्रक्ृषति प्राथमिक श्रावेगोंके बीच सन्तुलन नहीं हैं वरन्‌ इसमें एक नया संयोग है जिसमें श्रावेगोंका मौलिक रूप बदला जा सकता है। इस तर्क के तात्पयंका अच्छा उदाहरण यूद्वमें मिल सकता है। निश्चय ही युद्धकी उमंग मूलश्रवृत्तियोंका केवल समूह नहीं। इसमें सन्देह नहीं कि शत्रमण आवेग (ग्रा्टा॥079 ॥7[07]58), लूटनेका आवेग, प्रदर्शन आवेग, काम-प्रवृत्ति, भर भयके संवेगको इसमें सम्बद्ध किया जा सकता है। परन्तु यह तथा अन्य सव वहुत सामान्य रूपमें आते और एक नया संयोग बनाते हैं जिसका सार शवित प्रयोगके लिए एक प्रकारकी लालसा और मद मालूम होता है। युद्ध केवल हिसाकी मूलप्रवत्तिका जागत करनेवाला नहीं हैं। इसमें सन्देहू हैं कि यह मन॒प्यकी मौलिक मलप्रवत्ति है क्योंकि शिकार करने की आ्रादत उपाजित (8८९ ुर्पा720) मालूम होती हुँ. श्र मनुष्यके सबसे “निकट सम्बन्धी सांघातिककी अपेक्षा सामाजिक मालूम होते हें। होता या है कि युद्धकी उमंग उन प्राथमिक मूलप्रवृत्तियोंको काममें लाती हैँ, जो हममें भ्रव्शेप हूँ, यद्यपि कुछ परिमाजित रूपमें है। मनृप्यके प्रेरक आाश्चयेंजनक रूपमें जटिल होते हूँ और बहुत ही कभी इसके उद्गमका 'पता एक ऐसी मूलप्रवृत्तिमें लगता है जो अपने मौलिक रूपमें अ्रवशेप हो। चरित्र निर्माणमें व्यक्तिकी केवल पैतृक घारणाएं ही महत्व नहीं रखतीं। सामाजिक रुढ़ि द्वारा दिए गए माध्यमर्में हम कार्य करते हैं, श्रौर वह उस विधिको निश्चित करती है जिसके द्वारा हमारी विभिन्न पैतृक प्रवत्तियां सन्तुप्ट हो सकें। एक अ्र्थर्म यह व्यवितगत क्रियाकी स्थायी निहचयकर्त्री है और उसी प्रकार क्रियाशील होती है जैसे सरलतर (झग्राएथ) जीवचबारियोंमें वंश परम्परा क्रियाश्यील होती हूं। पंतृक- प्राप्ति और सामाजिक रुढ़ियोंके ऊपर व्यक्तिका अनुभव थ्रा जाता है भौर इसका परिणाम पृथक विभागोंसे निर्मित एक सम्पूर्ण होता है जिनसे मौलिक उगदमोंकों श्रलग करना और उनके साथ इकाइयोंकी भांति व्यवहार करना श्रत्यन्त कठिन है। अतः हमें प्रोफ़ेसर हॉबह्ाउसके साथ मानना चाहिए कि :मनृष्यमें विशुद्ध मूलप्रवृत्ति जेसी चीज़ वहुत कम हूं, केवल इसलिए नहीं कि

मूलप्रवृत्ति की सामान्‍य प्रक्षति २३

मनुष्य विचार और श्रालोचना करने तथा अपने छोप व्यक्तित्व श्नौर दूस रोंकी श्रावश्यकताप्रोंकोीं पूरा करनेमें समर्थ है, वरन्‌ इसलिए कि उसका व्यवहार शायद ही कभी उन स्थिर और विशिष्ट मूलभ्रवृत्तियोंतते निश्चित होता हैं, जैसे वह अनुभवके पुर्वे शोर सामाजिक यढ़ियोंसे स्वतंत्र स्थितिमें रहे होंगे। “निस्सन्देह भूख-प्यास मूलप्रवृत्तिकी प्रकृतिकी हे, परन्तु भूख-प्यासको सस्तुष्ट करनेकी विधियां प्रतुभव या शिक्षासे प्राप्त की जाती हें। स्नेह श्रौर सम्पूर्ण कौटुम्बिक जीवनका एक