श्रीमाधवराम सुखसागरपारम्भः

सुतयुर्‌ प्रपराद

द° गौरीपुत्र गणेश को वन्दन करं वनाय अतिलविश् त्रैलोक्यको जिनक्ानाम सुदाय दविर्ददन बार्नि नयन शटि चन्द समदेह॥ चार युना अहिराज निमि लम्बोद पु गेह २॥ |

सर] गणनायक शतपतीहुतको कनो सदा अमिकम्द हमारे। जिनके पद पंक

देवगुर कमलासन पिके विश्व संघार ध्याने जिनको पुरान सो देवन माह भये अधिकर। यहे हम जान भने पदको मतिदायक सो भोलम्ब हमर मकरत एदल कानलमे पुनि सुन्दर कीट सो शीश विरजे मणि युङ्गन के कंठ दारएर सम नीलघुभम्बर उपर धाने नडाउनड गंदी अगरी कर कंगन बह कैः ` भिरनै। देम हुक जडी किम पद अम्बुजे नेव हुव बाजे दहं हायन मे बह मेदलिये युग चारन मे धरम थाप चले ।प्रिनेनविप त्रिलोकी षते तिनके सुत बहन यह सहम जग काल देवी सुग समे सुसदायी स्मा जे नाम रहे जान सरूप मिफाल अबाध जो ध्यानपर सोई मोघ फो पावे यत प्रधान सम देन मँ सुख सेवन रे इष वि दटावै सवका युलदाय$ गणनायक वुंडीते जगको उपजा गेशपुरान मेँ व्याएमले सवका सुखहेतु गणेश इृगवरे। तरिदेव सुभादि मै नगमर्डल जेहि एनि सो कामनमें सपे ६॥ `

सावर सुससागर।

द° पुफ़द॑त सुषखदन चिद भ्यापक शुष जो अकास अदित वरिश्वके नाथ्‌ तुम करं सो मम उखा वीरसिन्ु युत माहि अदिशय्या सेनक पद्‌ पहु मानो नीत सम मलाही सेषहै। चषि दर गदा ओपरोज चक्री भृगुपाद गरे स्क अंगद पुषा ३॥ भिनका सुपदछार सव लोक मे्षको धरे तिपि सुखसदाशिरमादीं ६। एसे मगवान सद्म पति युखठदायी जिना सुनापलिये इखनाधी है = मगल मूरति राम विष्णु हपाल ईश शेव देर कत निल है। पौ भीर देवन को तिने पद माहिर विषिष ओतारि धारि सुशको पलै है पएरययकापै कोर ि्णु समान नाहीं चरचर जीवनके सदा सो सहाई है यति ताकी पूजन सुम॑गल सफल सदा रेपे मघुसृदन को हसी नमामी है गिरिजा एति भोलानाथ जग मूरभदि निनशन सुकन तीनकाल सो अत्राधृहै जिनके सो बर्येजंग गणपति मात कै देवगण आदि सव ष्यानक्ो लगि है गस भग गंग शीशषेतु बल वाहन खाभी चद जहामि जटमिं विरजे है गले व्याल रंडाच नित सिंहलाल ओद्‌ तीन शूल उमर केलासपति चिदरे १० जिनका यनाम लिये कालदघ त्रास पावे कमसु दयासिन्धु सदा निष्काष है अंग मरे ससम शेम मानों श्याम घटा चदि प्रतश्नास श्वेतमेन हिप है तीन नैन तीन लोक सद्य सो प्रकाशकै. लाथनक़े नाय गह मागे फल दै दै उतपति पालन हा सोभवरिन करे जिनका प्रकाश सूरन प्रकाशी है १९ देशकालरहित्र शिव कालङके कल महानाम रूप माहि निन पापक अकाश योगीजन जिन का.सो निशिदिन ध्यानी पाय ज्ञान निरूप तापको नशर अतपा वपु त्याग सदा शिपरूप है परभूत देह त्याग मग अवह रेते शिवनाथ काहि हमर नमामी सद्‌ जिन्करेषुह्त . अघ विन्न नशते है १२॥ स° || हरीहर स्पध गुरं नानक वेदीुल जगमाहिं उदर रु्वंश विषे तिनकी शुभ्‌ पद्धति बाहुज धमसतोग एषे सुरमानव दयत गन्ध य् किन्नर सिद्ध पुनश महीपति वेदअसथ अपारसो कौन तिने संग सिधसकी बहुमति देता १२ धमं विरोधिनवेतिनको मान्ेग प्रतिष्ठा. दीनउढये दश्‌ चार सुवन

सवमाहिं रिरे वेद धर नहि प्म बलये तरेता वे रुषेशजये शुम

माधवम सुतपागर। `

-दापर दृष्ण मुरारिकहाये। दिगविजय अपार सो सीला.फ नेहि माणे जीव लपे मजाये ४॥ दो" शुर नानक.शुधरूप अज वं युग धे अवतार . जगत जीव रु हेये उपदेश कोभ पार १५ ` मिनकी बक अबल अति वैद के मराहि॥ | दित जीव फति देके पुषिन से ताहि १६ | | आदु नानकसो अघरह चिदाननद्‌ तरह लिनका घुयश परेद बानी सन्त गहै नाम युष देह भवसागर बनाये जिन सेवकनके गन्‌ जिस पराय परर ` प्रपरैहै॥ जिनका प्रकाश पराय मति प्रकाश हेय शुमृत मा मगल पुबदा है एते गुश्नानक पदाषुन सुखमा हाथ नोरि शीश नाई व्दना हमा १७ निनके तुज श्रीमहाराजचन्धभये अवता महमेप् पुतदानीं है व्रिधानाप रुपधारि उपति -पाले नग अन्तमे संहारि आप मे प्लव है पेद पानी मि ती सो तिन को-गावे नित मोहनी खरूपभारि जगत प्रकाशे है निषनिं अवत दुषमाण अवाध शिव दशोदिशमाहि शुमप्राट चलपिरै १८ सोप बाल तनधारि नद सम शीश जयद की तडागी शुभ कव्मिं विराजे दै श्याम मेष की समान अंग मस साये जतीवजका हपीन आड्वन्दरकी चदय है॥ गसषद कर पराद्‌ कमल फी समान नैन पितर मानो छन्द दशन सोहाये रै नगा एदापीनके पिरे इषव शरुङ्नानरूप जिनका तीन कराल बाध १६ करताप करे शिर गौरीनाथ भतार पैसे तफल देनहारे सद्वा निष्कामे ज्ञान षे रग प्ट सम्पती समाज मोष ऋषि सिधि आदि माग शुम जोह इनका सो अपोपती श्रीवन्दमहारज जिका सो दवे शिष सोई शु पपै है। जिनका सो ` एजि सन्त देव सिद्धि काम रेते श्रीचन्द तेनेत को नमर २० जिनका ओं तार भर शुर महाराज शशा जिनका पताम मधोराम वेद गत है 1 भडे बडे यज्ञ ` भास्तखणद मे अपार कीने जिनको युत शुम सन्त लोक गगर है पम अथ॑ काम ओष्ठ सेव्नको देवे नित चाः युग जीवन म्रसागर ताग द। गिरिनापति' वन सम अवध मकार महीं अमरी कत सदी सिमे.गकरार २१ पृषति

माधवरमर युषसगर।

दन जेहि देष शरमिनद पै दिव्य सधाम तेहि मध्य बनाये है ।. निनके तिकेशित मल अपार कत मेष हेतु पाय तप्को कमव है नवतन यत्न नित तहां सो अपार कतै हेय सुर नः मुनि आदि तह सुख पते है महा उपकार कतिक ममम जिनका सुनाम इत ताप्रको नशर है २२ अमी गुरुषागर सं ती वनये जिन तीन लोक पापनको महीडषदारै दै सुर नर इनि आदि तिस स्नान मो पि सुस पाय जगमे अवि है जिनके सो आरः संसार सो अपार वतै जिनको सुदा लोक पै अपारे आदि चिदानन्द घन्‌ ग्यापक अकाश सम वन्ध मोष रहित मायापति सात स्पहै॥२३॥ ` दो° साषी शुद्ध द्रस्तु अज अविनाशी भवभेन ॥'

चिद्र सदा हई प्रकाशी सो माधोरम सुखेन २४

देश काल परच्छेद वित जगत पिम्धु के नाय॥

मम आयन कीजिये शौ शुखधेव सहाय २५

सुमति देहु मल नाशक पद पैकन पर शीश

अ्ठिल लोक सहाय तुम ते फल देषहु शेश २९

° | ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ उदार मये ना शुनिगन माहि सो महाड्लीने त्रान

एति स्वे अवजासन उत्तम जानिके का कीने त्रिलोकी पिपे सव जीवन के हित ध्म पयौदसो थापन कीन | जिनश्र शुमरीति सोकान्तसं केई यसै नहि फ़त नवीने २७ सूरज वैश विपे कुलपूर्य भये सष रजनको पम ज्ञान हृदये जिन कै उपदेशके पाये भले र्षुवशी सवै बिद मोको पाये शुद्ध सनातन व्ह चि दानन्द जिनकी अचारज शश वनाये ! यहि माति वरिष्ठ कते माधोराम नरायन शम अपतार सहाये २८ युष तनधार शुम लगमे प्रकाशभये बालपनमारहि नगदीन शुमलायके। ुलकाम्रभव देवी समूपरदाको पारसीने योगे अरूटमये मन साय मन बुधि दन््रभादि सवक दमनफीने तपोधन निना एक सुसदायके | निनफो सुपरापदको महाघुअपर सुख योगीरज जिनके सो माया के पदफे२६९अ्‌- जाप सरूप मधोराम नगश रह तिनकः पदा देत जानै सुलदीयके भवम एडत मभार महिं चराचर जीवनको दमी समान यृह सदा रहै सहायक यह

-माधवरम सुत्सागर्‌। ` (व

भति चिदाकाश उं विवार आपन नाम तिन प्रनोगे शुम रे ना पुनरयनरम मो देवै पापहन्‌ जग से अवारज सुयापै दुषदायफे १० कृलगुरूकी मर्याद माहि निशि दिन बास फे एन सरदार अव जग पुता गभीर धन शीतल सुमा निषद वेदविहित जीवन को परम हृदये निनका हुपद पाय कृत जीउ होय मेष मपे कऋमार्िमिले फिर निभि रै निघ्न खर्प मो गपरका अद्वड जनो सोहृशुध बोध नित यचेतन व्या है २१ अतप अभा के सहित जोई चेतन है जीवका सरूप बुध ताहि फो बहाने है षान पान तेन देन जग मे व्यवहार सव वाम फे सहित समबुद्धि मे श्वे है अपना वेका दुष जीत विहार जग चेतन खूप सुष सिये अरेपे है चेतन अग नित बहो खरूप जानो लेशमात्र देह इन्धते पिकार दै ३२ नेसे महाकाश षटं मठ संयो गनतै नाम सूप तिके सो ओर भाति मपे रै। घट मरदकाहित नो विचार सहकाश एक म्या मितमे सरह दै तैपे सुषमधूल संयोगपाय चेतना अङ्ञानी नित पुश्पतफो जीवत प्रमान है ञान ते अङ्गान काह रते दृधे जव माधोरम विदानन्द सोह मान हिय ३३ गुप माया संयोग पाय मधो श्न खरप चिद जगत के हेतु नित ईश्वर कपर है मेद इष्ट ति पुष बापनापहित नित तिनकी उपापनाकेो विधिपे कमावे है धमै अथं काम मोक्ष तिनकनाश देधी दश विप्र अवता धर चील दिखे दै महाषुदायी नित तिनके मेद ओं एरए कहै इने रमाहि माव जोरा है २४पाय शुध ्नान उर अंतमारह परोप होय कामके अधीन देश काल पते है। जते माधोकरा सरूप निति शण सुर जोह जीवन के उपाएनाको लायक दोनों रूपै यरी मिन जानक युनि सुनरायनपएम जीषनफरो कल सनाप सो पावे है काल कतना रहित अप मेष कद न्ये सदा माधोका खर्प दुषदायक पकरर हे २५ माधोकी घु लीला नित सुक्र सहाय जिनका पुमेद कल कोई नहीं जानै है। हित अनित नित सवो सहाय के इति रहित श्वानरूप दयापिम्ध है पिध्न अकरा मल समोर पाहि हनो पुमती प्रकाशो मे ठम सुषदायी है एसे मोप ुनरयन- शम मुनिद्ज तीन पद पकनमे ब्दा हमारी है॥ ३६॥ .

माधवरम सुपर ।. ` मोः यौ सूहषार नेहि एन उमर तिबाए एव, ` पदाय मधौमा।.तिन मिल कथक यृषथामा २७ गुरं ८५ हयं हाना हान विना नहनहि कल्याना मोर्‌ दाकर चवरी विक शान पैन तकी ९८ पया मात तिनको एष पंथा हिसके पन हित यह गथा यते शधामानफी तार। यट शुम गर तल पुषदाई ३६ आदि तले इफ मर्द रान वैरेग ओर कडु ना नमरप तेलक .मभारा यिद माधोरम पपार ९० यते तिन अस्तुति ओ। $ तसम इये हें शुरं इश्वर मे मेद पुना पेद पुरान कदे ममी ४९ निए सगण विभेदा तिं परी शुरु निष्ठेदा. शरीरस षय ससन जनि क्क रीति से पने ४२ भवसागर लंघनके मारीं सग गुर विन एते नाहीं गुरषिन भब निधितैनके। जो परि शङ्कर पम हई ४३ यदि पिपिके दन्त घन गर की महिमा अधिक सो ठे॥ गुर शिष्यहोय गुर कमे आसिक वै गुरुफी रतिगवि कहन योग लक्षण नरिप तभी गवे दोष अपरे गुर अक्ति इथ अधिकं बताने सुति अचाज निक संमाने४५ शुर सपान दाता नह फे६। ३४. अद देह एल सोहं सगण गुर यते अधिकाई निज निए एद देत लाई ४६इपते गुरो अधि पदनि तिस मतो कर सो जने॥ षिन गुर मगत जेर प्रतीता आतान ने पायक दीना ४७ आगान पिना हु नाह जन्पमरण सवलोकन मादी यतिविदधन मापोएमा तिनतेपवर सुसु परिश्रामाश् कू तित सो अस्सु यहं गिलत गव जानो नून प्रसंग यरे अमी सु दाह दै शचीन ऋषि पुरि पद यहि त्तम जो सोदल गुह पंत भाहि सो प्रण . दै॥ मधम कामन शिष्यम जो उदार होय तप्ता गरष यह मह सुराई. है नाएयएरप मुनिन संत ऋषि बुधान तिनका समाद याम अमी समा- ` नदे ४६ सेतशचषिउणे उङनान इष तापर युनिरन तिसको नशाय शुष दीनैरै। नं कपो पायकछषि पित निहतापमये अपना सप मिदानन्द ततपायो है॥ अतं . माहि तनं तनि मधरेम मािभिते नके रतादकःा नगे अगि ेैरुते ` पदे याहि वचार हानसदिं गोपाय मगमे ने अवि, इतिरपरन्तपर॥

६.

पपिरम पु्सागर्‌।

द° सत चित आनद ब्रहभज अगरिनाशी हान सुषेत

्िभोनामं सवहूप मँ सफल प्रत्र निकेत ५।

प्यापक्र सकल अकाश जो अंशम चन्द

ति माया है कमं जगकराए्ली अनन्द ५२

हेम पिषय जिमि क्छ दै वार एनी अह फेन॥

रिषि जगमाया तह निगम वानत वैन ५३ चो० अभाप्त सहित माया विभू सतन मिले परस्पर जित दील सर्य प्रकाशं क्नान सुखयशी विदानन्द यकर अषिनाशी तिपरको मायावरिषट नामा कान ममरदल के धामा जग उति पालन संहरे मपेवाशेषट सो कत अपरि ५५ माया उपादान जगकेर तिमे चिदफ़्रिसनियारा॥ इशनाम सो ताहि करै जिसे नि पव ध्यान लगपरे ५६ सश्टुन बह निगम तेहिगवे। माहि नाम एति अपय प्रे जग पालन हितत बहुरूपा चत्र देषठपे सु , सो अनूपा ५७ तिश माया अन्त पप देख चलति पुनिमय अकुले सो मरायापति रह्म खरूपा। दैः परो कोशलपुरपूपा ५८ मब पलत देवन पुष काः एन पमघातरकपु किटिननिषास॥ देय अपा पुन्य पो नोर। तेहि एत रम धूर तन सोई ५६ याते सुर सन्तन पृष दीन्दे। अघल हने इषित बहु कीन्दे जि. नक तैसे कै ने। तेहि अनुपार दिये फल सोई ९० हानि लाभे सदा नियार। फलदाता भपकेर अगार ईश्वर फस अकम तै न्यरि। यते मिथ्या वपु नि पूरे ६१ हित अनहित तिप्का फोऽनारह। चिदधनरम तरिर समाहीं अध्यारेष बशिषट फार जग ऽयति पालन संहारा ६९ ग्रिुनी माया मिससत मदी जगत होय जीव सुसनादीं यते शुद्ध सतोगुएमाये तिमे समके तन दुष दयि ६३ चिदर्निद शुद्ध भधाना दाशी बुष सो नाना सन्तन हित अवध मरं छन्द तनभर एई ६४ नोमी शुक्त मधुमासा। ब््मनन्द भये पगा ेहिदिन रम जगत तनधारा। मंगल भयो जगा ६५ ममल ढ़ इष नशे निमि आदित तम मारमगाये ऋषि मुनि देव दशी ताई। अवप परिप्य चलिअये षा ५६ प्रसरद का दृरन कौहे। कौटि जनम्‌ शुभहत

परापराम सुस्सागर। | फ़त लीर स॒पनध्टि बिदधनपर वणे नैन शब्द फी धुरहयं ६७ नीमी

तिधि मियो व्हरूपा। तेहिदिन पव सो लभ्यो अनुपा सुरं नर युनि सव सू तहाये अघहन मोक्षजचल यु पाये ६८ चारान वह्‌ घ्री मो नहाये। तफल तन तनि ब्रहम समाये एराण सपति सष जोई। तनधरि तेहि दिन अप से ९६ पखअपार महाषुषदाई थपि रप्नोभी नम गाई तके राम सो नोभ परभा जौ भ॑ने नहिं भवे गरमा ७० ज्यानन्द पौर सुतगयो राम मनोह वु तहं लयो मोक्ष हतु शुमपख है जोई। प्रति संपत सष अवि शीरं ७१ सुर नर यनि अपि एखको नये अगध शपे चिजये धाये माधोवन नारायन रमा तिनके आश्रम को विशशमा ७२ अवध फार महुषदार ससा सोक मानो चपि बा भोजन छाजन इत प्रकारा ¦ आदर देषै एुनि सष्दारा ७२ हषसहित यक भाप नहवे कोटि जनप अघ ताप नशते दानं मान पूजा व्ह पाठन मगवी सहित कर पुनिराजन ७४ यदितरिधि शुनिते बिदाको पाईं निजनिज आश्रम सबं सलिजाईं दादश मापो षिपिन ममार युष दे अगाए ७५ विषरिष प्रकार तहां य॒ष्रसी ऋरषिमरडल नित्‌ वपे उदा्ी पेद अथे के जाननपराले ` उदासीन तापसच अलि ७६ नटज्जट सम बकल धरे। जग विभूति रिषि सरे जगत पदारथ तुच्छं बिचार ।इन्दीदमने विषय सहारे ७७ जलधारा आदिक वहु कटं योग यद्ग कर तन तप कप्त पचअभम्नि सेके गन मरि उप्र तपस्या केरे अपरि ७८ इपर शका नहिं दुष मनू यह लक्षण सन्तन के जान्‌ वेदप गुरं मन्थे जोई प्रातःकाल प्रकरे सोई ७६ विषिष प्रकरे अथं सुनवि। ऋषि. मरडल तह कैः सोहा ज्ञान वेराग मगति शुमा आश्र पवसन निरूपै धः स्रा ८० वणौभम की कीरति जोई प्रथम कमरे सुप्रक सोई मन्त्र शुद्ध त्रान को पाई बरहमहप हवै सुषदा ८९ यति उदासीन इुपिपषागर कद लकृ से सदा उजागर जिनका वैष जगतमें अनूपा) रमचन्ध लीन सुषहूपा ८२ ताप वेष विशेषं उदासी। चौदह पपै राम बनवारी सो यह वेष उत्तप सुषदा माधो भन मँ दे अधिका ८३ पाणिजोर शुपदमलगधि। मृगचाला सव ततेवियि॥ कोउ कउ द्रम अघरीन सवे वैरा देह धर तुष पतै ८४ चिद जड्प्

“मषवरप पुसप्णर।

भेद तदाई को नराल ञानहि हि विपि अग्ूत तम नाती ऋविर तहां सकल दाप ८५॥ | शीश महिं नय शोभे मानों सव गिरिनापति एकदश मात सव कए मं षरे है अंग मे भसम चदि शुम श्याम विदो पणि पमा सेह शत पृषधारे दै शुद्ध पेन बाल ओटे कोऽ करल धरे ऋषि की रीति नो सनातन को ेवह। घु जील उपघाते फो दिगपद परपरेद एव गरे पार मते तीन कोऽ वेदान पेते एषम कोहन्यायकापो गमत के ऋषि मेहे सास्ययोगमे पवीन पतंजलि बहनि एुविपेसकाफनादि पुमिफो वने ३॥ कोऽ सुपएराए बोते बहुत श्यामा श्रुती माहि आपता माप वि वृदधिमानरै| शान्त सुषदा बानी उदासीन सेत पत्र भिंडा आदि. चोडिके अदध्यातत श्वा पदै ८७ ८०॥ यहिमाति प्रमाएनके अरुत सो तच विवा मोप क्मवि, शुभकमन दिन अन्तक सोव निज आश्रमम चलिअवि॥ मनवा इनि पव रेकं भते भूष भोग समाधि विषय छिन प्रतसमय पपे शिहल रि शुम कएने सगजवे ८८॥

चौ० यहि परिधि ऋषिर समुदा मपोमषन के छेशाई अतिष एर जग तप देसी पुति चित हे पिशेी ८६ पर सो एदाप्ीन ऋपि सरे ऋह्नानमं निष्ठे ब्रहमोकते प्रता जोह मायामात्र सममे पोर मेष पिष निमि तिता चष तिन नाम रूप सब लोकन निवत इन्लोफ स्व लोकै हच्छा तण समान फो {व्वा ६१ निश्चत एता तिप तमि ओः सकलै नाशी एकर जीवन श्वास अधीना दिन दिनक होते सीना ६२ जिमि घट एट जल ससत जपे तिमि प्रान एक दिन मिनस यै पनि एत मानों तन शुम मोना जग बिष ना ६३ ते तिषा सोक फे मारी भंयोग लायक $ नही भोजपत्र पम "स स्‌। नवि। नदी परवाह होत निमि अवे ६४ बाल शद योषन धृत दए नमह ततार अः साए मायाएमित जगत माही हान मान मिष्य के ना ६५ भव तदिव तिं कस कमपे उदासीन जगमा सदये इन्धन ष॒ सिय जा कर

१० ` माषवराम पुहपागर।

जनम्‌ परत फंपी गल पृ ६६ जिनके हिरदय विमलविचा माधो लघ सुस सारा अहित सेवै सोडऽदासी युश्पति माया जिनके दी ६७यहं विचार सद ञषिगए माधो शरिपिनमें कसँ अपरे चिदषनरूप नारायण रमा धस धना तिर पुखपामा €= महद्धिमान सुनिसरदरि। जिनके दिदे सन्त पियारे॥ पात उदा ज्ञान तपरूपा। गुरीति युक अनूपा ६६ ऋषििण्डत पूजे ममलये। ` तते परेदप्रिधी शुभग आददान मान बहुदेवे। जिसमे ऋषिण प्रसत्ह्षे १०० िप्िध मेति मोजन पाना 1 तपवलते सष कर सपराना॥ पाणिनोरि सष ज्र षिन बुलाई मोजनदेे दहुसुसदाई१०१ जिन क्रा अशन सो अभी समाना। अघहन पातके कटयाना चितचैवलता सकल किनारे खच्छुद्धि निर्मल पकाशे१०२ ्ह्यातम परिचार भरम खेप चतुष्टय जिमि अलस लवे फिर विपये चित तिं मसे मपरमको पे मसे१०२॥ =, | ध्यानकाल माई शल धतुषपर चोपलाये अप्तना अधिक सवं जंगम मुने दै सेकडो हजार ऋषिपरडल अपार नित पाकशाला माहि मुनि पंगति लगे है॥ ऋषिनिकी पतिकः पाकशाला शोभे जिमि तासनकी मालकः्‌ रमियोम षपति देवभोग ग्यंजनसो मेोजपत्र माहि संत सवश्रषि अग्रमाग परमे टिकै है १०४ सुतकाएनफे हाथ इयोधन समान सुले मिन चक्दधप्राले पास समान है ऋरिनिके आगे सत्‌ प्रमे तवे पाय मानों सो दे कल्पक तनधरे है नारा- यणराम युनिराज अषितट माहि शोभे एूखदिशमें जिमि सुर चिप्र है मेम मङ्ग के आधीनहोके सन्तनको दशके अमीसिम व्यंजन सो षिन देववर है ०५ चित ज्ञानह्प प्रेमभ के ग्ररेहुये निज पाठिक युनि आपी कतव हे लष्मरी फे पति निमि देवन वाये अग तिस समानः सुनिशन मागलवे दै जिन तारके मध्यम शशाक शुभ गवनके अमी ग्य॑जन हाथलिये महा चरि दै। इच्छानुप्ार सव ऋषिनको भागदेवे जिनका सुपदार जगफन्दकाट ३१०६ जिनका पुनामि अजामिल मेक्षपयि मोदे मगरो नही दहपत है शषिनको ` भागल अतपा दिषटनवरि मत अगति जिने है पिषनपते है मषे- रम$ सस्परका सो बोहनः पतर षिर॒जकी समान सोई धमनक्रो पते है

मावर दृषपागः। ११

मेदनकी धुनिश्पिमरडल अपारक काल भाने कवि छविपो अपाररै १०७मानो देवद्रपि सनश्नदिक सो नाष आदि अजे सो ओको निप जिषि गरे ३। जिनकी सो पुनिषुन पप महा मथपत मपो यङ तँ मो नपत्र माहि संव अपी दुषदाईं मोज पुनिएज अगि बुपासो चिव है श्र भिनप्मनि सो नएयएरम मनहारी मधोरमशन पाद मान अशनो एर द१०८ यहिमोति सन्तन की निलप्रति सेवकौ अन्तां गद श्रुति बेरे पधी दै। फ़ निज निज शुमकरपतम लागजपरे योग तप तनके माषो काक है मा धोरम सवनपाहिं सतयुण बरे कलिका सो नरप लेप ऋं नाह है दश च्‌ सुमनं मात्रः उत्तमं तिपमादिं माधोन महषषदाः है १०६ नह दह दे अति वन्दने हतु पव माधोमयन बन्दनाको नाश मोक्षः है धनपो एर एरय मनो तनपाय जग जगत्‌ संन्यपक! सन्त्य पररि दै मधोएम भ- वनवष माधेकेपरो गुएणप्रे तिनका सो पुर सु शाष्ट जानै है तदैका प्रभाव सुषापिन्धु सो अपार महघुसरायी कतिर इह से बहनि ११०देे बन ढ़ पत सो नारयण माधोरम काहि तिन पदपकजमें कविकी नमामी दै। . नित शपिनके सेवनसो युनिरज इशक ज्ञानां कैग मोमो सुद द॥ दी परमदा सहित माया दृपरन एएयफत युनि समान जग ओर दरे एषणे प्रम्नते धन धष रानपवि देवी विना मेहि पुनद पवि दै १११ ` पमा सो मोग वसप समान जानो अन्त अषोगती देवी प्िदबिन जवे दै। अथा सो पन षाम सन्तन हेतुलपर लो? परलोकनक कियती उष्वादी दै॥ सन्वनक्षी दयक कामनाका एलपगे मोष एुहधाम कदाचित नष पधि दै नादान आदि कर मनमे शुषानरतै निष्फल जे जिगर गजका सनानहै ११२ च, याते ्रिषार्‌ षिन धनतयागन मोक्षे हतु नदीं इषवे विधारषिना पश धृनलागत सो तिखेद नी कोऽ मप जो कहु कमं विषाते पिदर नाही विवेक बिना भयपे शुभाशुभ कणन माहि भम ओग आपगते इष फीतगगे ११३ यति मेक्षचरै शुम सन्तन सेवै लोक परलोककी आश हवे शुभ श्वमिन मृगे शतमव इत सगत यते नशे मी अपार महाुतदायक सन्तन

१२ भापवरप्र सुषसागर।

पदकी सो कमव एण्य अपार एलीषरित हेय नरायणएराम युनीपम्‌ लवि ११४ ` चौ०॥ निनके इषव दै सन्तन तिनकरौ भुता क्या के कवितन सन्तन ` हित एन मन धन बानी ।किदननिद्या्र मुनिवर ज्ञानी ११५ भिनी रीति जगत. चलिआःई। सन्त भगत जानै सुषदा नाना प्च भषण दृन्दा उपाय लै बहुत योगिन्दा ११६सब अषरिजनके करे नेदन जिनके घुपन्त विसेप्तन दै गै वाहन कखसिअन्दन। जे षदे इषकरे निकन्दन ११७ हीरा मोती. केषननारी,। हमथालधरि पूर्तेवारी सावन ऋषिमरड उदरि। तिनको असे मुनि सदर श्श्त पाणि नोर फिर कर निवेदन भगवत इन्या लेव पिसेपन॥ यहि इरन माधो कर परा) सन्तनहित युष रवे अगार ११६ अप चिदानद्‌ शुद्ध प्रधाना जीषन इष हनि कस्याना यति यह इसरन शुभ जे। अपने सममे अषिगन सेई १२० यख भी अपनी सेबकई। जानो उस है सुखदाई माधोराम जो श्ण हमरे। चिदधन ग्पापक्र जगत मैरे १२९ तिन अङ्गा लघ सुखदाः मै उभार कयं सेवका यति सव माधो माया सेह शपो हषपर कष्दाया १२२॥ सवैया यहि माति गुनिराजन लेके उपायन सन्तन पदमाहिं निवेद मान अपभानको त्यागे सदा जिनके उर नाहीं अन्नान सूदे दीन सुभव युषन्तनफ टिग भ्घके रूप दिल निरसेदे मवपरडल को उपदेश रर बिद आपपो त्नान रूप अभेदे १२३ | चौ०॥ यहिविधि मुनक रीति सो देख ऋषिगन प्रथमहिं है पिरोषी एुनिराजनको मनम सराह \ निन वृनवम सप सुखलादे १२४ माधोवनमे षित ^९। उदान तप्करे अगे संशनार पदारथ देतु सो जानी तिपमे दणि नरित्ानी १२५ मापोरम एषशुमपार। तिनको पाय तेने समार ने माधो युष नहिं नाने ते$मवडतमे लपटने १.६॥ हे गजमोती नाहि सो तेवै रजश प्रन हेये ।। मगवन वुग्हस दस्शन जोह छम सवनो इभ. सोई १२७ तौ पद्‌ पंकजफी शशनाई हम. अपार पे एुलदाई हम प्र दया यदी मुनि कीमै। टेर हदय निवाप फीे १२८ मुधसिनधु नारयण रामा यहशरसाद्‌. दीने युष भाम्‌ संसार रोग इव मोह निपाह। अत बह रुषसिनयु मिला १२६.

माप सुषपः। १३

घन माधो मोप तपाः भनिपि हम नही अरमा॥ मपोरम पिष्णुभावाना। तिनके दुमो स्पनिधाना १२० पन करौ सुनिप्रसनमान।। वेद एुराए सकल तुम जोना॥ कुमरी रीति सदा चलिभपि म्याद्‌ कत पभये १३१ नामे प्म, स्थापन ने। हे प्र॒ सत कषे तुम सोई तुम पिन फौन सो नगे सहाई। सो तन धन सव सतम साईं १२२ दुहे पाम महापूषपे। हम निभैय पष हशि गरे क्या हकत इभ जग रह निनपएर तुप दयाल मुनिर १३३ यह बन पुनिधि नो चतिअधि। चाएदाए्य कसलय तुम हमको इष कहा ्रतिदूला। जो हरे हित तुमनुशला १२४ यति तुको ह्मी जोहरे। हमे हिय बोऽदरि॥ यिध इषिगन समाना मुनिशद्ूल बहुत इधिमान। १३५ हष सोगते षे . अदीता। दरह्यानन्द मगन मनीता मान पान जगम इषदाई। मौ एक लस एुषदाई १२६ ओर देशान्तर षि मुनि जेई। माधवन चत्तिजवि कोई तिन पूजने अपरे कवि बएत नर्हिपरे परे १२७ बडे षडे यज्ननको फीने तिनकरी कृथा वहू कवि ने महापार पपेषरे। जे कवि नग एदाखुपिभरे १३८ परेम मगन होय फिर कवग थाह प्ररे मन पवितम कमि कएत भे ल- ` न्जित मापी निजहुधि लघि रहिनाय बिचार १२६९ माधोरमकी कौरति व्यवहारा र१ गणेश कहूत नहि पाश याते तिनकी लीला जे महापार पिन्धुभमी हो १४० तते काभ एयो पररा जो पिपील नहि सार परा अपार यत्न मधो नो ने। तिनक्ी कथा नरि हाथ बनि ४४१ तिनकी पुता किमि किना इत भृति वैद जो गाई तिनके घ्म री लोमाये। जो जीष चरचर सुषदाये १४२ माधो मन नरायण रमा कमधेतु कल्पक समाना नो कोर आश्रपमे चति अवे मुमा पुस फल सो पवि १४९ इषम शङ्के कोहं तप प्रभाते क्या नहि होः॥ तप बह रेषधरे महिमा तपबतत शम काहि संहाय १४४ पतप ` हान वैरग समाना सुखदाई कोऽ नहि कलवान यति नारायण रम ुनीशा। तुप बन कारज ह्मेगा १४५॥ || ्रापोवन भाहि निन कदी के भमारि शोभे बिष्णुखरप शान्त सुषतन धारया शीशे जय कलापे मानों श्याम बारिपि पुतपेक्रान भारी पसि पापक

६४ ` -भधवरमं सुस्सग॑र। ` सजया माधोशम कौ समान इर दया सो अपार परे धमक पालने दष अपारिया। जिनका एद पय अप्रूल नाश हय नेसे मासतरड जगकेरे तमहा निया ४६ माधोरम्‌ शुर मिष्य निशिदिन ध्यान केरे जिनका खरप बिदानन्द युस. दाया जल तीनलोक कीनहुपसा जिमि अनादिसो एष अवगरति अग्रिनाः शिया लोकषहुर्दश मेँ जिनका प्रकाश अति हस्त ववी मधोशम सो समा निया रवे सवनो एकसर जानि सदाअचल अदेयतअलघ अवगामिया ९४७ मव्‌ चट अन्त्रमेयामी सासीरूप नित अक्षिहप रहित आश्रम जातते नियाधि रग रग रेष नाहीं देशकाल न्यरि चिद जीवनके मोक्ष अप अवकास्यि शश्च मित्र जिनका सो तात मात को नदीं नीर दूरहित ्ञानमान विग्र जानिया जिन आमास्रूप जनि ब्रातीकी नजीक सदा अगजग इसम्रूल तिनम सुहानिया १४२ यहि भाति जिनक्षे सो ज्ञान मयो दिये माहि सा शुधब्रह् माधोरम कासो जानि के संसार इख पिषुपहा तिनके नजीके नहीं माधोके सरूप माहि मिले मषत्याग कै तिनको विचोडकः मातुष नाहीं अरे सी नी यले निमि सिन्धु समाय कै नामरूप भाहि तिन चेतन खरप हैके सथको प्रकाशक ति सुषदायके१४६ यति माधोके खरप काहिं योगी नित ध्यानं वेद एर तिनके सो वान फ़ | नाम रुप्रहितं षन सदा सो अदिष्टमने अदयतसो अघर तह्य आत्मा सुत दायके प्ष्मस्थूल नाहीं मूलसो अहञान नाटी सममृषटि वृष्टीपनोरहित रात प्रकाश के] ईश एुनि शुतमाट प्राग तैजस विश्वमोग योगवन्ध मोक्षरहित सवलायकषे १५० जाग्रत अवस्था माहि नाना पंष मदै इद्धिका विलास नामरूप सव जगहे पू्मस्थूलका सुडुद्धी उपादानहेय शिर चेतनका तिमे प्रकाशै नो खे ` मे मोगनाही मोगनों हार नाही तभी एर चित्र एकत्र ुद्धीजने है सुषि ` अविद्या मे मनीषा हेय लीन नाम रूप मेद तहँ शहावै है १५१ यति इद्धिसो अव्िदयाह्प जग उपादान होय सू इत निरचयरूप बुद्ध प्रि कर अपने इतका बद्धा जो बोध हय कार सदिव बुद्धि आप नाश है॥ निमि आस मभार माही दवा प्रचण्ड होय आसन दमध कर अप शति हवे अगरिामूलसदित ओद ज्ञान नहि बधे ततकृ जगत अ्ानी फो

मापफरप सुष्प्तगर। १५

अपा १५९ अनादि सो अग्र्या नित चेतनमे वासक तिप प्रकाशे बिद आप सो असंग ससार फे सहित सो अवरियाका खषप मिथ्या जानी परिषा माहि तीनि काल नाही है मनोराजकी समान बुद्धिरयित सोपन नग हानि नित रती होय माधो एकह पिनका खर्प हान विन नापह्नन सके जोई सत लेपे कहन योग सहै १५२ निमि मिष्ट साय पेते पपरन मोका सरूप त्ञानी ले ज्ञानी जानेहै मन दुधि बनी आदि तिनको नजान सके कालन अविद्या फे अव्या मिध्यारूपहै चेतना हानरूप ये ते न्ये प्रम्‌ जेते म- हाफाश षटमटमाहि न्ये तैते मापो का खरप सृष्म श्यत ते न्यो वीच ति. नहीं ज्ञानक मोप सु प्रहे १५४॥ २० जके हिय यह ज्ञान प्रकाशित अ- नान तिमिर सष देत नशपे। ब्रह्मरूप खयं फकराश असंगन ते शतन एवि तिपि जा्रूतमगरिप्य नही मतमान देते सब मिष्या जनप अतम नन्दको पा भले ज्ञानी जगत्‌ विषे नहिं आशफोलवे १५५ मनोप्यमात्र जगत परिलापसो ताकी प्रपी निवरिती नचहृन्दे। देते सुने छने सव देखत सष रस तेते लेतनखदि नशपर युगन्धस बेल नदीं एति पधे सशंफृएत विविदे त्यागे संग्रहतने मलत्यागे धवे हरिअप्यौवत पादे १५६॥ यदिति हरत इनदर ते यङ्कहोयके भोगनको मोग नितमोे निर्गहै मेतो इनविय पे ती इन्दि सो मे नहीं साठी सो इट मेने तिनका प्रकाशी है मिभि रुका प्रकाशपाय लोक सव हतक पूरन अंग तीनकाल नित तैत मन ब्र दश इन्व प॑चपराएमिल आतम व्रहभूष अगि शको दिषव ५७ आला अरग नित सष निविकार रहै सतो अंशष्रतनते अन्तकरण नन सतो एजोभंशनते क्न इन प्राण देहनाश रूप पंचभूतनका पृते सगे तिय . भे हनी आतम पुष इषी नहीं जैसे गवार मास्थतनर्मी गगर दै या निशरय ज्ञानी केतो सिममं बापके कता सो दी शृत कला सोनारी ६१५८ जनकसो आदि सव भूतनमे जकीने जगत पदाय संग्र कीन विषपरकार सव राजनक रुषलीने अन्तं शात सुप कत जिमि वाख अन्तरः एम देह भालन्य फल संशयरहित जनक विदेह मोप प्राथ शुक

१६ परपरम सुष्तागर। आदि सव मेते निराशभये जगते दोषी नेकमति कीनेथे १५६ दत्तात्रेयं

शुकदेव नडभसत आदिं वित विदेही समान सो निवा सव हृयेये प्रलब्धं के अपीन सव ज्ञानिनके येष्टन्यरि जीवनयुकरत माहीं भेद सदा र्देथे ब्रानकाभु" ` फ़ल जनकादि शुकदेव सव एकम पाये निश मोषहूये यहि मेति जगम अनेक बुद्धि त्ानवान त्याग संग्रह अन्त माधो समाने थे १६०॥ स०॥ निप माघोगरमके माहि विषे सव ज्ञानी विदेह सो अन्तमं हेव सोर नारयएरम युनी- र॒नन माधो खरूपहे माधो सेवै अन्त शुद्ध सो शान्तमहा जगजीपनङ हित कसम कमव सृष्टी अचारएलकरो मत यदी सो जीवनो मोक्ष हेतुम लवे १६१ अप असंगर जगम फल इच्छा नरी मर भोगम लवे नेषी अस्ये आपे सष तैसे जीवन काहि कतव कम उपासन ज्ञान त्रिषरएड कट्याएकष हेतु युगाय मुन यते सुषदायके नारायणएराम उपायकहै जाते मपोकरो पर ॥१६२॥ चौ० बरेदय्रिहित युति कस जो कट जीबन हितकर कदय सोई एक समय नारपणरमां 1 सृष्टि विचार फिहिन सुधामा १६२ मवमरडल मे जी अपारा। सदने उत. मवसिधुपर सो विवार पुनि फषिन पमनम कोउ शरी यृनि्म जगम ५६४ दवादश राशि वेद जो गहं तिश मेँ कुम्भराशि सुब दाहं कुम॑भसे मंकर्ते गंगमफार पवेपह सप्लगे अपार १६५ एफमाप नो जन्त तहे किन भया यु अचले पएरे मापो बन ऋषिर दुष्त तित हित एुनवर लहन हकार १६६ अशेफकषी तद आय सुदयि। मनो देव उतर नम अगि निक नमस्कार सव कौने महारसाह आनन्द समाभीने १६७ आदरह सव अषि वैठये। शुमृत सके कान एुनाये॥ कुम्भराशि तीय पना स्रेई चतो जगत सुषदा १६८ गंगनहवे प्रयाग जो शजा। होय ब्रह्ममका शिसाजा॥ जनम कम अप मृत्युर नई फिर नटि व्यापि तेहि सोई१६६. तुमि देख सव जीवन जगमे सुरमरि परज्जकेरे शुभकसे जगत्रत दान निमी लक्करिदै पोय पाप भवपागर परिह १७० यदि त्रदे पर उप्करर। निष्काम बिदरमिद तुम अपिपारे पर उपकार जगते जोई सन्त षिना निं सो के १७१ जगत जीव खार मे लागी जातिकुजाति विषै अतुरगी नर सग सुप इतके

मपिषिरम हुतसागर्‌। १७

गह सन्तपाय के कोऽ नाहीं १७२ तन्तम पतति गिरि पणौ प्रहित ` हत इनदिक करणी ओर सुपरधनको कं ना पङ उपाय सनत एफ जान १७९ प्रति सन्तप्त सृतर्‌ई। जो नह रे महाजढता१।॥ सन्त गंगस॒भ्‌ नि %उ दता चहयुग मृष विष्याता १७४ व्रहफ़मरडतु मुरि वई नप गण दव दरश सृतक६॥ मज्जन पूजनकर देवा अकषय सगं मोग सुषदा १७५ अभिक सतोरत सगे रहा गेगप्ताप बान मुषे तरै मधष लै अपार कार ईक सुर अगि संसार १७६ याते ुरसरिरेर प्रतापा अदित भष हारग दाता जवनहित मगीख जोई सुपर लपि इह सो$ ९७७॥ वह्कमणहलु मध्य विषे सोई मागीयी तपको फतलयाये भवमरडल सव जप्रनके हितं मोप निनी सो दीन गये त्रि्ोकीेनाथ्‌ लोभये सदा शिवधारे नद जनी सुक्षाये विष्य हलाहल शन्तकै सष शान सूप गिरजापति पराये १७८ त्रियनयन जेटमहं गंगशुभे मानों नीत अकाशे मूरपुहाये तिप शुभ किए केलापगिरे जिमि बिनदतर्डुगए टके अये॥ गिरिजपे अये रपे चते तिपो एति पिते आर्मैद पाये दप साक सतं सा? हनार हुशप अधीन महादृस प्रये १७६ प्णमािषिषे तिनमे्ष भिय यह गग शुषा जग सुषदाये अनेक जन्मान्तर एन होय शुम सोह सो मंग पवि ` जल नाये पुनि फ़ल मातुष पाय भले तन जो नहिं ग॑ग सुधाक नहे मरत आष्ट नरा पह गद सूठे मातुष जन्म फहाये८° तन वास्नके घे समरे नर शुद्ध महीं बिन गंग नहाये अनेक जन्मत पाप अपार सो ने प्रम्र सो मुने नशिजाये जिसका महातम गरन्थनसे षि देव एनी सही तुम गयि प्राप

` तमप घुगंग अमी जग जीतन को मोप सिन्धु हये १८१॥

दो गग त्या अष हूको. कलो किमि प्रफार॥

सुषशतिलक जग पावनो फन बहुउपकार ८२ चो०॥ गंग शब्द धुनि वेद दह्र जेहि हुन उं ताप नशग गंग चुन ` ` वनी परमा बलत. शाष्द अतिपङुबाज १८९६ नके तट योगी ध्याना ताप विष त्या अत्नाना बीत निमय नित श्टई किक पहित मन्जन शुम

१८ मपुररामं युष्ागर

कं १८४जग दान अनिक विष्‌ कमा तेहि तस्मे शुम कै पुथरमा तहां एत सष ेह अपा जिमि एकश ते जग विस्तारा १८५ षिन प्रयाश् तहां क्ञाना। जो मवन्ध हने नाना शान्त निजातम अचल अनाम तः ल्प घुष भेद जामे \८६ एसे आतमनन्दको पाई गंग्रसाद शान्त सुषलह॥ दैवी कए निगन रदे अदे। असु तहा नहीं इतं सगरे १८७ अन्तम तन मात्र यागी बहूप हवे बडभागी परंचमूत वपु नहिं फिर पे माधो रम विषय विलपते ९८८ | द° एसे तीरथरान की कष्कि सदा प्रणाम॥ ` जाहि तिपि ठन -प्यागिफे पाये सुच विशाम १८६ -. ख० वेद्‌ विधी जग में जोई कतत हे ऋरपिमरडल तृ प्रगटये तुश्हे उपदशे मजो चलत सुष सो मबसिनधुते जात पलामे दादशवपं वि इम्भरशि बहु संत समागम यम सृलदयि प्रगट शु सो आवे तहां सव जो मवमणडलमाहि र्हाये १६०पुरी चहुं घाम सुआदिक सयका पती यह तीरथराये। सरक महातम याक अस्नान मेँ सुर नर पये सो वेदन गाये `अक्षयदटका जोई दरश फे नरसो तमु सयाग अक्षयपद पाये दश यङ्ग सो आयक ब्रह्य तहां दर्शन ताको महापु तदपि माज सो आदिक लेके महामुनि तं निवाप फर तप. ताये १६१॥ त॑एथ एरागराज लोक मे प्रधान सव मोक्ष युखधाम. देषै'पापनको आरी है। मुर सुनि सुष तहां नित बुस फे भंग मल धोय कम योग को कमपे है # जीवन्न हवे बिदेको युपाय लेभ जिस सो यश सन्त षेद नित गाप है। गम रनधानीकी सो सीला सो अपार हालष्मी सो पवी लोक देसके लजवि दै १६२ यहि माति मुनिरान सुरस फीरति गाग जिसका प्रमा सव गन्यनमे निया | मुनके सो ऋषिगए॒ जितने फो मापोवन चिते प्रपतन सवं मये सो अपारा भनि शरटूल सो कीरती सव लागे गने तीएय महातम शुन जग पुसदाहया,। धन शनिराज कलि जीवन मवताए फो माधो धिदानन्दका अवतार तुष पारिया १६३ ` हमरे उपकार सिये अमी फे सुमान वाक दयारप भुभको सनायु तुव उचैः ` थि दुही सुषाक नग गैग की समान प्र पपन को काट कौ देवे सुलदानि-

मापवरम्‌ सुष्सपर १६

या माधोरम बरहानम्द तिनको पिलाने हित उपदेशः कीनो तुमका नेमाः मिया माधो वन ऋण सव बुद्धिमा तषी ङम्भयशि मन्नन को सो तयासि १६४॥

च०॥ यह्‌ विपि शुनिनायकसदारा। ऋषिमरडलं संगःलिष्ि अपाप मपे नाम सुमिर उर लीन सुदिनसहित मुनि गमन सो कने १६५ तप परमाप षि चे समेहि मानों दिवा मुंह मन मोहे बलकल जटाजूट तन धारे। जंग विभरतिवदी भुपि सरे १६६ एए चाल मव बगल दवाये कमण्तु हाथ मे लाये मानों गिरिजापति रषु बहत स्प परि तद १६७ देष संपति तनि सव देशा। सव शरुषि रसं कै रेशा माने अषु कर पिर मवभरल ते वहत निश्वास १६८ माधवन ऋषिगए जोई तिनको परि चलाये सो मवमरडल एर पाप अपारा वीरयराज बि संहाय १६९ ओः नहीं दोषे कट हाना प्र इकर पाप निदाना तरै ऋषि सब दैवी तनधार भव सुष हित सथ चते पुरे ०० ेम्‌ निमित यम नियम नेहे प्रथम कत नाय एव कोई एफ योजन चति मग ण्डत निशि, विताय शुभ.हृतं कर जा २०१॥

पू ती एरान सूनरायएराम ऋषि मध्ये चले जा जग युदा निया जितते ऋषीश संग मेद मे पीनः सव तिन निरज कीनि या॥ तीख पराण पबे गंगात माहि शुम एकान्त देश. मा शृ निया सष शिमरहलः सो जहां तहा इए लीने जपत तन के गग नत नहाहया २०९ यनि शूल मापोरमका स्प ईश पेद ति. अरा नगत निया। मल्क सो समगर सो तहां सो अपार रके सगोपांग सलीविधि तपत पवारिया॥ रेक्रड हने मन समिषा समूहे एत जन मि्टन देव पुषदया। मोदन नावन दिता बहुत भे मिनका पुष्पका मती माति जानिया१०२ ९०॥ दव सो मोग अष्ट अमीत मङघनः नान रकार वनय नसं एवाय सो बायी सव तीरथमाहि घो देव लमाये खगलाक $ त। गय मातएष्ड के ोगन मादिं मय मानो एतो लाय निर देत लगाये २०४ एव उयश्जन नाना तयार निनय जगम वसाव |

९8 ` भापयरम सुखसागर। जगम सो कारण दर्वर साधो सव जीवनष्ती फल दषे नये चतुरानन अदि पतो सवै जिनकी नित कीरति ना माये 1 यहि माति पिश्र्‌ विदनन्द प्रमातम तिस विषे मख असे युनिरये २०५॥ तीरथदा्षिन सवन को दहु मोजन दक्षिणा दीन शुरं नह युति सब जगसा सक्को आनंद केन २०६ | थह भांति मुनिराज भख सो अपार कीने गजदोन अश्वदान.देषै सौ अपारिया एुनि ऋषि दविज महि प्रीति सो षिशेषरासे षमि फल दपर कं निया ! रजा वलि समान शर्निशज सुदं भये ्रालम्ध्‌ जीवन की मन तन धारिय जिनका सदान पय होत अघ्रल सव ओर अश ठष्णा जग मे पाहयार+ऽमानों धनपति युनिरोजका अपतारधरि अपना युपषेषन देत लुखादया। जिनका डर सो अतुट सो अपार भरं जिनका सहोयक मापोराम सुषदाइया कर्‌ सरोज महा सुभग पश्ित्रं अतिकल्य सुदृष मानँ देह निज धारया जिनकौ पनाय चिन्तामणिकी समान फले उरिज पदातरिन्दं करि दष्यनिया २० फमल रविकी समान सक्क्रहीको प्रक्षाश कर कमनफे फल सुघ इष मति नियारिया। संस्राो वरिकार पुनि तिनमें सुलेश नादी अङ्गान यत्न इषम तिन॑मे सुहानिया॥ जगजीवन के हित वितमाया को व्यवहारं माहि लोम क्षोमरहित निजानन्द सष जानिया। जिमि साणसमे मच्छ कच्छ सव नावे एदे तिनका सो देत सिन्धु हष शोक नदिया २०६॥ ज्ञानरूप पुनिराज तपके प्रभाव कर मोदक अपार दुमभरशिमें लगसि इद मेषश समान यथा सक्को प्रप्कीने जेसी विधिचाही तैसे किह युनिरहया षेद विहितकृतनमें विध जो नाहीं वही कम नगे सो- हवे सुखदाय नातो विचर कर माधो के निमित्त नदीं सखपे जिमादच्छे िवन जानिया २१०॥ स°॥ चह छ्ुम्भन माहि यदी विधिसो यकमा निवाप करे सुवनवि ओर देशान्त कै सगले मुनि इम्मनमाहि सै चिज विधिष- पक स्तान्‌ कर सवी एने सुनिशदूल के दशैन अपरे! नारेयणएयम सुनी मति मान संयोग यथा सवो वैणवे २९१ चरणएपसार सनिमरदल निज मस्तकं ' माहि विपि लबे पहु पन सक्छ पिय भले शुस अक्षत एल सुगन्ध

माधुरम्‌ एतपगर। २१

हवि नाना श्रीमते गज हाषनते सको पिम अनेक तित अभी व्यञ्जन दम थाल गे भगवा २१९ आदर भि पिकी पति मंहत अगे सो धके मिव प्रीति महा साह मुनिराजन उद्‌ सो चम फेपै॥ गुनि मरह वेदक त्न नेहिको सुनिकरे अष शत्य नशद पुनिराजनक सुपकारसमे युषे समान सुधाये ववे २५२ पुनिराज सहे एूनिमरहलमे मानो देवन. पुरन पुव मोन सन्तन माहि पिरे मानो अमृती षस। वसप सुबरणपात्रमं व्रि भले पुनिमणडल के अन्त हा धवे शुम आसन माहि काय मलीवरिधि वेद विधी शुम पान दिवे २९४ जहुरादिक नाना सुगरी अपार सौ हेमे थाल संच उप पान प्रिलाय पूनि स्व भनिमरडल को सुखदेत विद्र गुमद्रव्य अपार सो तेह सव मिन जगमे नि जो चलिअवि। मनवा- न्वित सो फल पे भले फिर {च्या नहीं धनमाहिं रहे २१५ एुतिरजनते शभ भोजन दान रुपानो पाय महा हवै निके सुसदायक दशन पाय सुगावत सो माप रए लष्छीपति माधोरम जिनफे उर पिना मव दुतम स्या पष्प दे प्यति देदरिधी सव जिनके गति सुधारि हवे २१६ तहां ` चािदास आदिक पुप्व तोट नद तितपूर रहे इने सुष ओकनकी महिमा सव हार कवि पार पवै॥ भमणडल मे मघ दुत होयपर इनकी समान नदीं कोर परम नितेक मुनिमणडत आगूदश यत्तशालामे दन समान तेल २१७ माघो अशक माहि परिप एुनिभगडत आर हन तहां अष सपति लेश नहीं हत अपन प्रकाश पुनिरज हरे इक माधोरमका धयान के एव भो दनो देतनिप्रर। तिना भमव महसुतदाक सेल जगमा अपरि ११८ तिन्ही सरूप जोह शुनिरनन मेद नदीं यक सूप दरि सीतापती भि द्‌- शरुत मायापती खरप अपरे ते नाप्य युनि बिदानन्दपो माधो वपरे माधवी रीति बनकर सव जति तिलो वदी रूप भिदि २१६॥ सौ० यहिषिधि निजपूत एनी उदार नियतम गा ऋषनापार मोजन ` दान मान सेषकाई दमे दार एनिशई ९२० निज निज आश्रम एनि नि शध एगावत ममे सव जाव जनक अस्तुति सन्त बान ता

२२ मपवरम पुवपागः।

$श्वरहप पान २२१ यहिप्रिधि एक माप मुनिर धमं मप्यद्‌ पुष दा जीवनके कल्याण निमित्ता आप बिदानन्द ुनित्ता २९२ मायागुएते सदा निर व्यापक सव जीवन हितकरे जिनका नाम रूप शुषदाई जो नहिं जनि करत दिग २२२ तिनकी माया उन मपे तिनका शुए खमाव पै जिस परभाप दया सुधर जगवन्धनते हष निय २२४ पाय ज्ञान हेव ब्रहल्पा। फिर नहिं भिर दूष मवकूपा सष जीवन उपदेश जनवि जग तप आदिक कम कमवि २२्५यामगमे पट जनफे। मबपागर उत जीवसोई॥ हानको साधत कसको जानी यति कस युनिह्वानी २२६ विना कषर नहि त्रान सोह ज्ञानविना मुष मक्त नलेवे॥ मेक्षविना कं आनद नाहीं दष जन्म मरण सव लोकनमाहीं २२७ बहते सुष जीवनी ताईं नाना कम निगम हु गई यति नरायणएरम एनीशे निशिफाम कए सकफो उपदेशे २२८॥ ५०॥ शुममरष्याद्‌ जोई जगके मैफामाहीं खषिषुनि सकहूने बध्यो दै विचा- ै। संसार सो अपार सिन्धु तको एरवार जीवित तपु दीम्यो हे नायके याते सव कपो दशचार युवनमाहि पेदबरिधि श्य आ्रप्रले मन लाये अभास कसक सत्र लोकते उदासहोय सकाम कत चित सदापो दायके २९६ सकाम कम वनीपम जानतततग सव बारम्बार जन्मक हेतु इषदा- यक अनतसी शुद्ध माहि कामफो वान कौ शुद्ध अन्तसहोय चार साषनाको लायक 4 अऋणदिक निदिष्यासतन मिलायकः ञान सहायकरै जोई मेक्षदा- यक | मोक सहायक शतको रवार अन्तरं बरहि ज्ञान सहाथके २३० भ्वणजआदरिक सोङ्नानकेसो पी साधन चार श्रवएके पीव सुतदायके। यत्तभादि कमचारि साधनाके पहने अन्तसकी शुद्धीकेरे मते सो बनाये जैसा अधि. कार दत तैसे पदेश मोकषपर जो जन सव कने राके चार साधना हित भरण बहुतर मुन निदिष्यासनको कै सो वनाय २२१ बाहजकी श्प फ्‌ अन्त बरहमकनरहोय कए इत शूध्नवि हेव इतदायके कम ओं उपात्ता से ज्ञानको साधन वा्नाको यग जव्‌ -क सनताप बसना ` स्त मोप ज्ञान पे नदीं कमर जात जगमाहि गसै-भरमाये योते वेद

मधिवराम बृतपागः। २३

विधि कए नग पे विचार कर मिका अभी नदीं हवै इतदायकरे २३२ ईशत कनको त्यागना कृरवे नि जवतक हृदय मान ञान ना प्काशिया। बानं हेय तव ततान फा षरिरोधी जान कमनो तागिके अम्याप् अनिया॥ सत असत मिंतस पर्यव सव भू ज़ इत जानक नम मानिया के .एफति निज आता जो पएरमानन्द्‌ तिपको तिचे विभ पिद सुसदाईइया॥ २३२॥

चौ०॥ योक हतु ञान को मानी तनमे हेतु कए्मको जानी यति शुनी तरायएरामा मघ व्रत आदि के पुलधामा २३९ मषी नाम दान की महि मा] ऋषिपरलमें वे धमा मणवतसण्न्धी शुम ग्रन्था अगम नगण पुनव अथौ २६५ अन्तान तिमिर दन्द नशे एुनिमणलमे अर्द उप- लपे यक दिन शुनि वार डना नेम निमित मख व्रत अप्तनाना २३६ निरग्रिन सथाप् मयो हमा माधोरम कहिन सव पार तीरया महाम नो दद पुराण करै सकोह २२७ सो एक मातत हम मज्जन न्दे