लैए्प्रत भक्ति अन्ट्ोत्नल त्त्र उच्ययल

डॉ० मलिक मोहम्मद एम० ए०, एल-एल० बी०, पी-एच० डी०, डी० लिटु*, एफ० आार० ए० एप्० (लंदन)

राजपाल एण्ड सन्त, कश्मीरी ग्रेट, दिल्‍ली

मूल्य : तीस रुपये

के

पहला संस्करण 97]; (9 डॉ० सलिक मोहम्मद

रूपाभ प्रिटर्स, शाहदरा, दिल्‍ली, में मुद्रित

१५&5न5५8 8प407 &90प% ## #एस्रॉ#58७ (॥6४५) ४३ 07. 49६ वठीउायब्व

९. 2000

प्राककथन

भारतीय भवित-आंदोलन का बहुत ही महत्त्वपूर्ण विस्तृत इतिहास है। भारतीय भाषाओं में मध्य युग मे जो विपुल भवित-साहित्य निर्मित हुआ है वह भक्ति-आदोलन की महती देन है! वैदिक काल से लेकर भवित-आंदोलन के काल तक भक्ति-भावना का विकास कई अवस्थाओं में हुआ है। आज वँप्णव भवित का जो स्वरूप है, वह वहुत-कुछ उस वैष्णव भकिति-आंदौलन का परिणाम है, जिसका नेतृत्व तमित-प्रदेश के वैष्णव भक्त आलवारों ने ईसा की छठी शताब्दी से नवी शताब्दी तक किया था। आतवारोत्त काल में अर्थात्‌ मध्य युगमें वैप्णव भरक्ति-आंदोलन उत्तरीत्तर प्रवल हीकर एक व्यापक जनत-आदोलन बन गया। बैंप्णव-भक्ति आंदोलन के प्रेरक आकर्षक तत्त्वों ने ही मध्य युग मे भवित-आंदो- लव की लोकप्रिय और देशव्यापी रूप प्रदात कर भवितमय वातावरण का सूजन किया, जिसके फलस्वरूप हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में मध्य युग में विशाल वैष्णव भक्ति-सारहिट्य का प्रणयन हुआ। हिन्दी बैप्णव भवित-साहित्य के प्रेरणा-स्रोतों पर सम्यक्‌ प्रकाश डालने के लिए हिन्दी-प्रदेश के वैष्णव भवित- आंदोलन के व्यापक रूप का परिचय अत्यन्त आवश्यक है। चूंकि हिन्दी-प्रदेश के वैष्णव भक्ति-आंदीलन का पुर्वापर सम्बन्ध दक्षिण में उदित वैष्णव भवित-आंदो- लग से है, अतः हिन्दी के वेष्णवभग्ति-साहित्य के उचित मूल्यांकन के लिए एक विस्तृत कलेवश में वेप्णव भवित-आंदोलन का अध्ययन नितान्त आवश्यक है। अब तक प्रकाशित हिन्दी-ग्रंथो में वंष्णव भकिति-आंदोलन का सम्पूर्ण (अज- णिडत) चित्र सामने मही आया है। कारण गह रहा है कि यद्यपि विद्वानों ने स्च- सम्मत्ति से वैष्णव भवित-आदोलन का प्रारम्भ दक्षिण के आलवार भवतों से माता है, तो भी आवश्यक मात्रा में तमिल के आलवार सन्तों के भक्ति-साहित्य के उचित मूल्यांकन के अभाव में वैष्णव भक्ति-आदोलन का संतुलित इतिहास सामने नही सका है। अतः हिन्दी के वैष्णव भवित-साहित्य के सम्यक्‌ अध्ययन के लिए वैष्णव भक्ति-आंदोलन का संतुलित इतिहास अपैक्षित रह गया प्रस्तुत लेखक की यह निश्चित मान्यता है कि हिन्दी वैष्णव भवित-साहित्य का अध्ययन तभी सर्वांगीण हो सकता है, जब कि अन्य भारतीय भाषाओं के भकित-साहिहों, के सन्दभे में उसका अनुशीलन और मूल्यांकन किया जाए हिन्दी के मध्ययुगीन

६4

पेप्यव भतिषगाहिये सरदारप मे तो बह ध्यायर यु स्टिपोज मट गे ही अनिवार्य है

मेत्यव भतित-भावताो में एश्मव से सेतर विकाग के विमिस्‍्न सोधानों एप अवश्याओों ता परिषय देते हुए मध्यगुमीस मैप्दन भविषभाग्धोेसस के स्यापर भौर शोप प्रिय रूप का एक पूर्च लिए हिस्‍री तथा तमिश भियाहियों के आधार पर देता की प्रणुतत अध्ययग वा उद्देश्य है। हिसदी-पद्ेश कै बैणाप भवितन्औदोसन को आैविसन्यरेग के भागयारों हे मंधासित पैछप भतिषर आँशेसन के गाय पूगररिर साझखा होते के भारय हे तो हवस भौर हिररी भविष्साहियों में आपार पर मेप्यय भविवन्जीशेन मां अध्ययन श्रेम्तर और माष्यपूर्ण गमभा गया है। प्रस्भुत घेराव का मत हैडि द्विररी बंष्यग विद साहिएय के प्रेरभानयोगो पर तटरय और स्थापत दृष्टिफोग से प्रकाश दांतपर मेप्णय भवित-भार शेसन मे इतिटाग गो) मिस्‍्तृत पदस पर गस्तुधित रूप मे प्र३- लत करने भी आवर्यरता रा गई है। गयीने सामग्री मो निर्याट सरके पूर्ष स्थापित मतों वा पुनरगुशीसग वर सवुलिठ रूप मे मंल्यय भे रि-ऑशेसन था समग्र हूप उपस्थित बरने यारा अध्ययन अयेदित रद गया है, जो हिस्दी बंष्णय भति-साहिए्प के सदी मूल्यांवत ने लिए परमायश्यत्र है। भरयुत अध्यपय इस दिशा में एक गयी गे प्रयाग मात्र है।

सेयक में इस प्रस्प मेः प्रणयत बेः सगभग साता-आठ पर्ष पूर्ष '१६यीं शी के हिस्दी शृष्णभवित-गाटिस्य पर आसवारों गा प्रभाव शीर्षक पर एक शोध प्रयस्ष प्रस्तुत कर हिन्दी में पी-एय० डी० गी उपाधि प्रात्त वी थी। तेगर का शोध प्रवस्ध 'आलवारों का तमिस्त-प्रवन्धम्‌ और हिन्दी गृष्ण-काय्य' के गाम से प्रवाित हुआ था, जिसका हिन्दी जगत्‌ ने बडा स्वागत गिया है। उत्त ग्रंथ में पहली बार हिन्दी जगत्‌ को तमिल-प्रदेश फे आसवार भगतों के 'प्रयश्धम्‌' का विस्तृत परिचय देकर दक्षिण के बैष्णय भवित-आदोलग मेः व्यापक रूप गी ओर संगत मात्र किया गया है। तभी से प्रस्तुत लेगा को तगित तथा हिन्दी भवित- साहित्य के आधार पर उपलब्ध नवीन सामग्री का ग़मावेश कर रातुलित और व्यापक दृष्टिवोण से वैष्णव भवित-आदोलत या विस्तृत अध्ययन हिन्दी जगत्‌ को देने भी प्रेरणा हुई। इस प्रेरणा वेः फलस्वरूप पिछले पाच वर्षों के निरन्तर परिश्रम और अगवरत अध्ययन के उपरास्त प्रस्तुत ग्रन्थ तैयार हो राका है।

प्रस्तुत ग्रन्थ को दस अध्यायों में विभवत किया गया है 'विपय वा सीमा- निर्धारण श्ीर्पक प्रथम अध्याय से दंस्णव भक्ति-मावना के श्रमिक विशारा की अनेक अवस्थाओं की ओर राकेत करके वंप्णव भकति-आदोलग के समय तक की वैष्णव भवित के स्वरूप पर प्रवाश डाला गया है थौर “आंदोलन” शब्द को सार्थक सिद्ध किया गया है। वैष्णव भवित-आदोलन के विभिन्‍न सोपानों वा परिचय देवर मध्ययुगीन वैष्णव भक्ति-आदोलन के लोकप्रिय रूप की चर्चा वी गई है और नवीन उपलब्ध सामग्री के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत अध्ययन की सीमा और उपलब्धि की ओर सकेत किया गया है

द्वितीय अध्याय में वैदिक युग से लेकर भक्ति-आन्दोलन तक के काल में

श्र

वैष्णव भवित-भावना के क्रमिक विकास के विभिन्‍न सोपानों का विस्तृत परिचय दिय। गया है! इसी अध्याय में प्रचीय दमिल मक्ति-साहित्य के आधार पर तमिल-प्रदेश की वैष्णव भक्ति-घारा का अनुशीलन कर वैष्णव भविति-भावना के विकास में तया गोपालकृष्ण और राधा के व्यक्तित्व-विकास में तमिल-अदेश के महृत्त्वपूर्ण योगदान का शोधपरक दृष्टिकोण से विवेचन किया गया है। तुतीय अध्याय में तमिल-प्रदेश के वैष्णव भवित-आन्दोलन को जन्म देने बाली सामाजिक, राजवीतिक और धार्मिक परिस्थितियों का परिचय देकर वैप्णव भक्ति-आन्दीलन को व्यापक जत-आन्दोलन कद रूप प्रदाल करने बसे प्रेरक तत्तवों फी समीक्षा की गई है। इस वैप्णव भक्ति-आदोलन का नेतृत्व करने वाले आतवाएरों के विश्विप्ट योगदान पर भी प्रकाश डाला गया है। वँप्णव भक्त बाल- बारीं तथा शैव सन्त नायतमारों की कृतियों का भी परिचय दिया गया है, जिनकी भवित-आन्दोलन को महत्त्वपूर्ण देन रही है मध्ययुगोन वैष्णव मविति-आंदोलन के प्रमुख प्रेरणा-स्रोत के रूप में आलवार छत 'प्रवन्धम्‌” का अध्ययन चतुर्थ अध्याथ में किया गया है सामान्य रूप से मध्य- युगीन भविति-साहित्य को प्रभावित करने बाले 'प्रवन्धम्‌/ के तत्त्वों की चर्चा करके मध्ययुगीन कृष्ण-भक्ति काव्य को प्रभावित करने वाले 'प्रवन्धम्‌' विशिष्ट तत्त्वों का अनुशीलन किया गया है। वंष्णव भक्ति-आंदोलन के सदर्भ में प्रवस्धम्‌ के व्यापक प्रभाव को प्रकाश में लाने की दृष्टि से विविध वँप्णव भवित-सम्प्रदायों तथा विविध क्षेत्रों पर पड़े प्रवन्धम्‌ के प्रभाव की ओर संकेत किया गया हैँ पचम अध्याय में आलवारोत्तर काल में तमिल-ग्रदेश के बैप्णव भक्ति-आंदो- लन का सम्यक्‌ परिचय दिया गया है आलवारों के बाद के आचार्य युग में आल- वारो की विचारधारा का अनुसरण कर श्री सम्प्रदाय तथा विशिष्टाद ती विधार- धारा की पुप्ट करने वाले तमिल-अदेश के श्री बँप्णव आचायों की परम्परा का विस्तृत परिचय देकर, आलवारोत्तर काल के तमिल-प्रदेश के वैष्णव भकिति- भआनन्‍्दीलन के व्यापक रूप को दर्शाया गया है पष्ठ अध्याय में मध्ययुगीन बँष्णव भवित-आन्दोलन के दूसरे प्रमुख स्रोत श्रीमद्भागवत्त का अध्ययन वैष्णव मक्ति-आन्दोलन की दृष्टि से किया गया है “मागवत' के रचना-काल तथा रचना-स्थल की चर्चा करते हुए विचार-साम्य की दृष्टि से 'प्रवन्धम्‌! से 'भागवत' कीतुलना की गई है और 'मांगवत' के वर्तमात रूप को (प्रबन्धम्‌' से प्रभावित मानने की ओर संकेत किया गया है। सामान्य ₹प से भध्ययुगीन भक्ति-आदोलन को प्रभावित करने वाले तत्त्वों की चर्चा करके, विशेष रूप से मध्ययुगीन क्ृष्णभवित-साहित्य को प्रभावित करने वाले भागवत के विशिष्ट तत्त्वों का विवेचन किया गया हैं। मध्ययुगीन वँप्णव भक्ति-आन्दौलन के सन्दर्भ में भागवत के महत्त्व को स्पष्ट करने के लिए विविध बैप्णव सम्प्रदायों ओर विदिघ भारतीय भाषाओं के वेष्णव भवित-साहित्य पर पड़े 'मागवत' के व्यापर्क प्रभाव का सम्यक्‌ विवरण दिया गया है! संप्तम अध्याय में हिन्दी-प्रदेश के वैप्णब भक्ति-आंदोलन की पृष्ठभूमि

प्रस्तुत की गई है। राजनीतिक, सामाजिक और धामिक परिस्थितियों को चर्चा करने के उपरान्त हिन्दी-प्रदेश के वैष्णव भवित-आन्‍्दोलन को जन्म देने में दक्षिण के वैष्णव भकिि-आदोलन के योगदान पर प्रकाश डाला गया है। इसी अध्याय में हिन्दी-प्रदेश के वैष्णव भक्ति-आंदोलन वा नेतृत्व कर उसे व्यापक जन-आदो- लन का रूप देने मे तथा दक्षिण और उत्तर के वैष्णव भक्ति-आदोलनों के बीच सेतु का कार्य करने मे श्री रामानन्द के महत्त्वपूर्ण योगदान का परिचय दिया गया है। हिन्दी-प्रदेश के वैष्णव भक्ति-आदोलनों के तीन सोपानों की चर्चा करके मधुर भक्ति की लोकप्रियता की आधार-भूमि प्रस्तुत की गई है। अष्टम अध्याय में हिन्दी-प्रदेश के वैष्णव भक्ति-आदोलन के विविध क्षेत्रों पर पड़े व्यापक प्रभाव का अध्ययन किया गया है। प्रभुखतः विधिघ कलाओ के विकास में और हिन्दी में विपुल मात्रा मे वैष्णय भव्ति-काव्य के निर्माण को प्रोत्सा- हन देने मे वैप्गथ भवित-आन्दोलन की उपलब्धियों का उल्लेख किया गया है। वैष्णव भवित-आदोलन के फलस्वरूप निर्मित हिन्दी वेष्णव भवित-वाब्य की राम-भविंत और कृष्ण-भक्ति-धाराओ के प्रमुख कवियो और उनकी कृतियों का सक्षिप्त परिचय दिया गया है। वैष्णव भक्ति-आंदोलन को व्यापक रूप देने मे हिन्दी-प्रदेश के वैष्णव संप्रदायो के महान्‌ योगदान की ओर सकेत किया गया है। नबम अध्याय मे हिन्दी-प्रदेश के वैष्णव भक्ति-आदोलन पर पडे श्री सप्रदाय के प्रभाव कोस्पष्ट करने का प्रयत्न हुआ है। आलवारो की विचारधारा की आधा र- भूमि पर स्थापित श्री सम्प्रदाय और विशिष्टाद तवादी विचारधारा ने सामान्य रूप से हिन्दी-प्रदेश के चेष्णब भक्ति-आंदोलन पर जो प्रभाव डाला है, उसको हिन्दी चेष्णव भक्ति-साहित्य के माध्यम से प्रदर्शित कराने का प्रयास इस अध्याय मे हुआ है। 'उपसंहार' शीर्षक दशम अध्याय मे भ्रस्तुत अध्ययन के फलस्वरूप उप- लब्ध नवीन मान्यताओं की ओर सकेत करने के साथ ही साथ भावात्मक एकता के क्षेत्र मं तया भारतीय सस्कृति को वैष्णव भक्ति-आदोलन की महती देन पर प्रकाश डाला गया है। प्रश्तुत अध्ययन के लिए लेखक को प्रेरणा और प्रोत्साहन देने का श्रेय लेखक के पूर्व ग्रंथ को और हिन्दी के विद्वान्‌ स्नेही आचार्यों को है उत्तर प्रदेश सरकार तथा बिहार राष्ट्रभापा परिषद्‌ ने लेखक के पूर्व ग्रथ को पुरस्कृत करके और अखित भारतीय तमिल लेखक-सघ ने भावात्मक एकता की दिशा मे लेखक की उपलब्धि पर लेखक को सम्मानित कर उसे प्रोत्साहन दिया है। तमिल तथा हिन्दी साहित्य के सभी अधिकारी विद्वान्‌ तथा विशेषज्ञों से लेखक को प्रस्तुत शोव-प्रथ के प्रणयन में परामर्श और निर्देशन प्राप्त हुआ है। उन सबके प्रति लेखक हृदय से आभारी है। शीघध-कार्य-काल में लेखक ने अनेक प्रमुख केन्द्रों की यात्रा कर विस्तत सामग्री का संकलन किया है। विश्लेष रूप से मद्रास के दो प्रमुख पुस्तकालयो (कम्निमारा तथा मद्रास विश्वविद्यालय ) से तथा केरल, अलीगढ, इलाहाबाद

हि

और आगरा विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों से लेखक के प्रस्तुत अध्ययन की सामग्री संकलित हुई है! उन पुस्तकालयों के अध्यक्षों का लेखक आभारी है, जिन्होंने लेखक को सामग्री-संकलन में काफ़ी मदद पहुंचाई है। तमिल, हिन्दी, संस्कृत तथा अंग्रेज़ी के जिव-जिन ग्रंथों से लेखक ने सहायता ली है, उनमे से बहुतों के वाम पाद-टिप्पणी में दिए गए हैँ और अन्य प्रमुख विद्वानों औौर उनके ग्रंथीं के नाम परिश्निष्ट में दिए गए हैं। इस अवसर पर लेखक उन सभी विद्वानों का सादर कृतमतापूर्ण स्मरण करता है जिनके ग्रंथों से लेखक ने अपने अध्ययन में प्रेरणा एवं सहायता प्राप्त की है। लेखक की अपनी कुछ सीमाएं भी रही हैं। मूलत्त: लेखक तमिल-भाषी है। उसे हिन्दी-प्रदेश में लगभर्ग दस वर्ष रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। फिर भी अहिन्दी भाषी होने के कारण अपने विचारों की सू_्म और सझवत अभिव्यवित्त के लिए गही-कही उसे कठिनाई वग अनुभव हुआ है प्रस्तुत अध्ययन में लेखक ने तटस्थ शोधपरक दृष्टिकोण की ही प्राथमिकता दी है। विधेपकर 'भागवत' के ब्तंमात रूप को अवन्धम्‌' से प्रभावित मानने में लेखक का तटस्थ शोधपरक दृष्टिकोण हो परिलक्षित्त हे भवतों की मान्यता को चोट पहुंचाना, किसी साहित्य को छोटा या बड़ा दिखाना लेसक का उद्देश्य कदापरि नहीं रहा है। यह आव- श्यकभी नही कि लेखक के निष्कर्ष सर्वमान्य हों। लेखक के इस अध्ययन के द्वारा भारतीय वैष्णव भक्ति-आंदोलवद का संतुलित और पूर्ण चित्र प्रकाश में आएगः लेखक के द्वारा तमिल तथा हिन्दी-साहित्य के आधार पर दष्णव भव्ति-आंदोलन का अध्ययन प्रस्तुत होने के कारण तमिल तथा हिन्दी मक्ति-साहित्म पर तुल- सात्मक दृष्टि डालने से दोनों में उपलब्ध भावात्मक एकता के दर्शंन किए जा सर्कंगे। इस प्रकार दक्षिण की प्रमुख भाषा तमिल और उत्तर की प्रमुख भाषा हिन्दी के भक्ति-साहित्य को विकट लाने की दृष्टि से यह प्रयास उचित ही माना जाएगा। स्तुत प्रथ अनेक दृष्टियों से मौलिक है। वेष्णव भवित-भावना के क्रमिक विकास की विविध अवस्थाओं का परिचय देकर तमिल-अ्रदेश के योगदान पर सेखक ने जो मान्यताएं व्यवत की है, वे मौलिक हैं पूरे ग्रथ में ज्ोधपरक दृष्टि कोण को रखा गया है। मध्ययुगीद वँप्णव भक्ति-आंदोलन के दो प्रभुख प्रेरणा- छीतो के रुप मे 'प्रचन्धम! तथा “भागवत' के तत्वों का परिचय देकर दोनों ग्रंथो में उपलब्ध विचार-साम्य को प्रदर्शित करने का जो कार्य इस प्रवस्ध में हुआ है, बह एकदम मौलिक प्रयत्न ही है। वास्तव में तमिल या हिन्दी में वृष्णव भक्ति- आंदोलन के सतुलित और पूर्ण चित्र को देने का प्रयास अब तक नहीं हुआ है! अतः इस दिशा में लेखक का यह अध्ययन मौलिक प्रयास है। हिन्दी-प्रदेश के भच्त-आंदोलन के तीन विकास-सोपानों का परिचय देकर उनकी आधारभूमि की रा हप चबीन उपलब्ध सामग्री के आधार पर की गई है, वह भी मोलिक दृष्टि- गिण है

प्रस्तुत अध्ययन तमिल तथा हिन्दी वैष्णव भक्िति-साहित्यों में लेखक

हद

विशेष रुचि का परिणाम है। वैष्णव भावना नै लेयक को बहुत ही प्रभावित॑ किया है और उसके बैयवितक जीवन-आदर्शों को भी प्रभावित किया है। यही इस अध्ययन के प्रणयन में लेसक की आस्था का रहस्य है। वेप्णव भावना के विषय में नरसी मेहता के 'चैप्णव जण तो तेणें कहिए, जे पीर पराई जाणें रे! शब्दों मे व्यवत व्यापक उदार दृष्टिकोण तथा सेवा-माव को ही लेखक ने जीवन का आदर्श माना है।

रीडर, हिन्दी विभाग, --मलिक भोहम्मद केरल विश्वविद्यालय एर्नाकुलप्‌.कोचौन

खअनुक्रमणिका

प्रथम अध्याय विपय का सीमा-निर्धारण श्३-२२ आन्दोलन शब्द की ययायता; अध्ययन की दिशा द्वितीय अध्याय वैष्णव भक्ति का उद्भव और विकास (भक्ति-भावना से भविति- आन्दोलन तक) २३-८१

वैदिक भक्ति-परम्परा मे वैष्णव भक्ति का विकास; बेद में विष्णु; बेद में भक्ति; उपनिषदों में वंष्णव भक्ति; महाकाव्य-काल मे वैप्णव भक्ति; गीता में भक्ति का स्वरूप; पौराणिक और पांचरात्रिक युग में वैष्णव भक्ति; पाचरात्र साहित्य ओर वैष्णव भक्ति; तमिल की भक्ति- परम्परा में वैष्णव भक्ति; संघकाल की प्रकृति पूजा; तमिलों के विभिन्‍न देवी-देवता; तमिल-प्रदेश में तिर्माल धर्म (वैष्णव धममं) की प्राचीनता; संघ-साहित्य के प्रति आलवारों का ऋण; संघ-साहित्य मे वैष्णव भक्ति; नट्टिणे; पदिट्दुपत्तु; परिपाडल; कलितोकी; मन्दिरों मे 'तिरुमाल' की उपासना; गोपालक्ृष्ण ओर राघा के विकास भे तमिल की देव; राधा का विकास

तृतीय अध्याय तमिल-प्रदेश, का वेष्णव भक्ति-आन्दोलन (छठी से नवी शताब्दी तक) फरत११६ भक्ति-आन्दोलन को पूर्वपीठिका; भक्ति-आर्दोलन का उदय; भक्ति- आस्दोलन के कुछ प्रेरक तत्त्व; बेष्णव भक्ति-आरदोलन को आलवारों की विशिष्ट देन; वैष्णव भक्त कवि आलवार और उनकी रचनाएँ; आलवारों

का क्रम और संख्या; “नालायिर दिव्य भ्रवन्धम्‌!'; पोयगे आलवार (सरोयोगी ); भूतत्तालवार; पैयालवार (महायोगी या अन्त योगी);

१०

विग्मति झई आधार [भवितयार); सस्मालवार (छदकोय); सोहुस् बज आसप्रर (मर गडि); ठुमिय रासलवार (बुलगैयर); पेरियाववार (पिप्यु मि्त); भांडास (गोथ), तोदरदीयोडी आहार (भरा प्रिरेण ); हप््णाण आतयार (गुनियाहल); ऑह्णिग आशजार (पर कास); भतित-आरशातन मो तम्रिस-श्रेश मे धवभगव्स दिया को योग दान; शेयमातकधि और उसी रघसाएं, शैवधमम और राख्याच व, शेप भयवझापि अध्यर, प्ंय रात रायधर , शेष राग कवि गुरदरघ्ति, सेब गा कवि माणिग्क्याचपर

शतुर्य अध्याय

मध्ययुगीन बैप्णय भगित-आन्दोसस गा प्रमुख सोस .

'प्रबन्धग! १५७-२३१

भवित का रायोपिरि महत्व, साम-महिमा, रत, शरणागॉाया प्रपत्ति; गुरन्महिमा; राह्ग, बैराग्य--(ग) परमेन्टियों पर विजय; (ए) गारी के मोट्फरूप की तिन्‍दा, (ग) अर्थ-निस्दा, (प)४घरीरवी नश्वरता या बोध; 'प्रबन्धम्‌ के विशिष्ट शध्य--(१) भ्रीहृष्ण पी विविध लीताएं;। भगयललीलाओं भें आतलवारों मो तन्‍्मयना, (३) श्रीगृष्ण की अलौबिक रूप-गाघुरी, (३) श्रीएृष्ण का परमेश्यरतय, (४) श्रीकृष्ण के प्रति योषियों की प्रेम-भावना; आण्डाल का स्वत रिद्य मापुर्य भाव--( १) वेणु-माधुरी और उसका प्रभाव; (२) राशसीता (आसवारों की 'कुर-बैकूतू)); (३) राधा (आतलवारो की स्पिन) और गृष्ण की केलि-त्रीड़ाएं; (४) भ्रमरगीत (आलवारों का अमर-सदेश ) , राम-भवित- काव्य-धारा का प्रे रणा-स्लोत : 'प्रवन्धम्‌॑; आलवार रामायण; विविध देतो पर 'प्रबन्धम्‌' का व्यापक प्रभाव; तमिल-प्रदेश के धामिक और सामानिक जीवन पर “प्रवस्धम्‌! का प्रभाव; विविध कलाओ पर 'प्रवस्धम्‌' का प्रभाव , परवर्ती तमिल साहित्य पर आलवारों का प्रभाव, 'प्रबन्थम्‌' पर लिपित विविध भाष्य, तमिलेतर दक्षिणी भाषाओ के वंष्णव भवित-साहित्य पर 'प्रबन्धम्‌! का प्रभाव--तेलुगु; मलयालम; कन्नड।

पंचम अध्याय

आलवारोत्तर काल में तमिल-प्रदेश का वेप्णव भव्ति-आन्दोतन

(१०वी शताब्दी से १४वी शताब्दी के अंत तक) २३२-२८२

वेष्णव भक्‍ताचायों की परम्परा--नाथमुनि; श्री रामानुजाचाय॑; रामानुज के परवर्तों आचार्य; आलोच्य युग के वैष्णव भवित-आसन्दोलन को वैष्णव-मठो और मन्दिरों का योगदान; वैष्णव-मठों की परम्परा “-मैलकोट मठ; यदुग्रिरि मठ; परकाल मठ; श्री वानमामले मठ

34

अहोबिला मठ; उडपि के मठ; वैष्णव भवित-आन्दीलन को वैप्यय मन्दिरों का योगदान; वैष्णव भकिति-आन्दोतन को दक्षिण के भवित सम्प्रदायों का योगदान; साम्प्रदायिक संगठन का आविर्भाव--श्री सम्प्रदाय और विशिष्टाद तमत; गध्वाचायं और उनका संप्रदाय; निम्यार्काचार्य और उनका संप्रदाय; विष्णुस्वामी ओर उनका संप्रदाय; आलोच्य युग में निमित तमिल का सम्प्रदाय-मुक्त वैष्णव भक्तिकाब्य

पप्ठ अध्याय मध्ययुगीन वैष्णव भक्ति-आन्दोलन का दूसरा प्रमुण स्रोत 'श्रीम दू- भागवत' और 'प्रवन्धम्‌' से उसकी तुलना २८६-३३२

भागवत का रचना-काल; भागवत के रघयिता और रचना स्थल; 'प्रवच्धम्‌! और 'भागवत'; '्रीमद्भागवत' का प्रतिपाच तत््व-शान और भक्ति-दर्शन ('प्रदन्धम्‌” से तुलबा सहित)--(१) भवित का सर्वोपरि महत्त्य। (२) नाम महिमा; (३) स्तुति; (४) शरणागति या प्रपत्ति; (५) गुरुमहिमा; (६) सत्संग; (७) बेराग्य; (५८) मवधा भवित; श्रीकृष्ण की विविध लोलाएं; श्रीकृष्ण को अलौकिक रूप माघुरी; श्री- कृष्ण का परत्रह्म परमेश्वरत्व और 'राम-कृष्ण अभेदभाव; श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों की प्रेम-भावना; गोपी, रास, मुरली आदि के प्रतीकार्य; भ्रमर- भीत; विभिन्‍न संप्रदायों में 'थ्रीमद्भागवत' की मान्यता; विविध भारतीय भाषाओ के वैष्णव भक्ति-काव्य पर 'श्रीमदुभागवत' का प्रभाव; वँंप्णव मकिति-आन्दो लन को 'मागवत' का विशिष्ट योगदान

सप्तम अध्याय हिन्दी-प्रदेश के बप्णव भक्ति-आन्दोलन की पृष्ठभूमि ३३३-३८६ राजनीतिक परिस्थितियां; सामाजिक परिस्यितिया; धामिक परिस्थितियां; भवित-आन्दोलन की नीव; हिन्दी-प्रदेश के वेप्णव भवित- आन्दोलन से थ्री संप्रदाय का सम्बन्ध--रामानंद की विचारधारा; मध्य- ग्रुगीन वैप्णव भक्ति-आन्दोतन मे रामानंद का योगदान; भकिति-आदोलन का दूसरा सोपान; सूफी सतो के द्वारा सांस्कृतिक समन्वय को प्प्ठभूमि; हिन्दी-प्रदेश के बैप्णव भवित-आन्दोलन का तीसरा सोपान; नये बेष्णव सप्रदायों का संगठन; कृष्ण-भकित्त संप्रदायों मे माधुयोपासना का स्रोत; रामावत संप्रदाय में रफिकता की पुष्ठमूमि

अष्टम अध्याय हिन्दी साहित्य को वैष्णव भक्ति-आन्दोलन की देन... ३६०-४२०

राम-भक्ति-काव्य-धारा; मर्यादोपासना शाखा--ग्रोस्वामी विष्णुदाम;

११

ईशरदास; गोरगामी तुलसीदाग; दृदगशम; रगिक्रोप्रासगा शॉरसा-- अग्रदाग; मामादाग; बालरष्ण याप्असी'; एच्सान; रामप्रियभरण 'प्रेमकली ; कृष्ण-भवितन्‍्कास्यन्धारा; बन्‍्सम संप्रदाय के प्रमुख कि- (१) महाकयि सूरदाग; (२) परस्मानरणशरा; (३) सरदशग; (४) रसणान; राधायल्सभ सम्प्रदाय के प्रमुग मतरि--(१) दि! एरियंश; (२) दामोदरदारा (मेवक जी); (३) हरिराम श्यारा; (४) धुयदग; गौडीय सम्प्रदाय के प्रमुग गयि--(१) गदाथर भट्ट; (२) गृूरदास मदनमोहन; (३) रामराय; गिम्बार्फ सम्प्रदाय के प्रमुख कयि--(१) श्री भट्ट (२) हरिष्पास जी; (३) परधुरामदेय; (४)रूपरसिक जी; हरिदासी सम्प्रदाय या रासी सम्प्रदाय के प्रमुग कवि--( १) स्वामी हरिदारा; (२) विदृठल विपुरादेय; (३) श्री विपिनबिहारिनीदासजी; सम्प्रदाय-मुक्त कवि-- (१) मीराबाई; (२) रहीम; (३) नरोत्तमदास

नवम अध्याय

हिन्दी भक्तिसाहित्य पर श्री सम्प्रदाय का प्रभाव ४२१-४६३ दाशंनिक विधार--ईश्वर; श्री; सीता और राधा; चित्‌ तत्त्य जीव; बुद-चुभुक्षु; मुमुक्षु; जीवन मुक्त; कंवल्य; प्रपस्न-दृष्त; आते, नित्य; अचित्‌ तत्त्व; सत्व शून्य काल, मिश्र सत्व . प्रकृति और जगत्‌, माया; श्री सम्प्रदाय के भवित-सिद्धान्तों का हिन्दी भवित-काण्य पर प्रभाव; भविति के साधन--प्रेम, सदाचायं; नवधा भवित; भवित के

विविध भाव

दशम अध्याय : उपसंहार ४६४-४६८ प्रिशिष्ट * सहायक ग्रन्थ-सूची ४६६-४७६

प्रथम अध्याय विषय का सीमा-नर्धारण

आरतीय धर्म-साथना में भक्ति-मार्ग का अपना विशिष्टधामिक, साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व रहा है। यही वह मार्ग है जिसने सर्वप्रथम व्यापक रूप से समाज के संपूर्ण जंग को प्रभावित किया और एक बहुत ही लंबी अवधि त्तक उप्तका पप-प्रदर्शन करते हुए स्थायी मोड़ दिया इसे साहित्यकारों, समामसेवियों और धर्माधिकारियों का समात रूप से सहयोग प्राप्त होता रहा है। भारतीय संस्कृति को जितना अधिक इस मविति-्मार्ग ने प्रभावित किया है, उतना कोई दूसरा स्रोत कर मेहीं सका

भवित-भावना के उद्भव और विकास का इतिहास काफी लंबा है। वेष्णव भविति-सावता उद्भव की स्थिति से लेकर विकास के विभिरन सीपानों एवं अवश्याओं को पारकर वर्तमान रूप को प्राप्त कर सकी है वैदिक युग के कर्मे- भाग की अनुपयुक्‍्तता और उपनिपदू-युग के ज्ञान-मार्य की दुरूहता के ममक्ष परवर्ती युग के मक्ति-मार्य की उपयुक्तता एड सरतता ने बहुमत प्राप्त किया और भक्ति-साधना को लोकप्रिय बना दिया। वैसे वैष्णव भक्ति का उद्भव कुछ विद्वान्‌ बेंदिक युग से मानते हैं। परन्तु जिस भावमभूलक भक्ति का स्वरूप जब हमारे सामने है, उसके दर्शन वेदों मे नहीं होते वैदिक युग प्रधानतः यज्ञीय-कर्मे- काएंड का युग था उपनिषद्‌-काल में आकर ही हमें भवित-भावना का स्पप्ट रूप मिलता है। भक्ति-भावता के विकान में उपनिषदों का बुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है सभी परवर्ती डितकों थे उपनिषदों से ही अपना कदम बढ़ाया है। फिर रामायण,महाभारत तथा गीता के युग तक आकर वेष्णव भक्ति-्भावना का काफ़ी विकास हो जाता है। इस प्रकार वेद, उपनिषद्‌, महाकाब्य, गीता, प्रवस्धम्‌, भागवत्त आदि वँप्णव भवित-भावना के विकास के विभिसत सोपान हैं

धर्मे-साधना की दृष्दि से वे दिक युग से लेकर बराह्मण-प्थों के युग तक धर्म - साधना की दो पद्धतियां कर्म और शान प्रचलित हो खुकी थीं। किन्तु वैदिक युग के शान और करे मे से ब्राह्मण-पंथों ने यज्ञीय कम काण्ड को पराकाप्ठा की सीमा पर पहुँच दिया था,और स्पिति यह हो गई थी कि यज्ञ और यज्ञ के पुरोहित के प्रभाव- मण्डल में स्वयं यज्ञ के देवता का तिरोधान होता जा रहा था। अवशेष रह गया केवल नाम धर्म के क्षेत्र भे केवल पुरोहितों का बोलबाला रह गया और उनकी

ह्ड वैद्य भवित-भाग्देषत था भप्यपन

'तानाभाही' पे चुनौती देते हुए उपनिषातारों गे तत्त्वास्वेषण या 'ैस जारी रुगा | यह निवियाद है कि आगार-पक्ष घ्मं गा बढ पत्ष है जो सोच मी यरो है जिसे बहुमत या सहारा सेना पहुता है, परन्तु वैदिक पुरोहियों से सोप-जिशासा का कोई उत्त देकर केयल अपनी दक्षिमाओं मो ग्रद्माया देना आरस्भ कर दिया था परिणामस्वर्ण उपनिषत्कारों ते चितत-यक्ष गो, जिमगा मील छल्े३ में भी विद्यमाग था, संभाला। पर केयस इतने से काम नहीं घत सरता था, मयोकि साध्य के साथ साधव की भी आयश्ययता थी बेद तथा उपनिषदों के परवर्ती गुम में आयों की पमं-गाघता युग मी बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार अपर्याप्त ही मटीं, बल्कि अनुपगुता भी गिय हुई। अनुपयुवतता का प्रधान बंग रण आधिक होने के साय ही साथ रामा जिन भी था। मम इत्यादि कम सामान्य जन के लिए आधिक दृष्टि से बठिन होने में साथ ही साय सामान्यजन के लिए उसमे स्थान भी गहीं था इस परयर्ती युग मे आर्यों गा सम्पर्क अनायों से हुआ और भनायों की सस्या भी भारतीय आर्यों से कम नहीं थी इन अनारयों के आर्यकरण की रामस्या अवश्य ही जटिल रूप मे उपस्थित हुई होगी, जब अनायाँ को भी आर्य वर्ग में सम्मिलित विया जाने लगा यट स्मरणीय है कि उत्तर वैदिक युग तक आति-आते ज्ञान के क्षेत्र मे ब्राह्मण पुरोदितों के एक/घिकार को भारी आधात लगता है, दाह निक क्षत्रियों वी अवतारणा से भारतीय इति- हास की यह प्रथम घटना है, जव क्षत्रियों ने श्राह्मणो को ज्ञान देना आरम्भ किया। अब धर्मोपदेश या सत्यास्वेषण वेवल ब्राह्मणों के गुस्कुलो या शिक्षा- परिषदों तक सीमित होकर क्षत्रिय राजाओ के आश्रय मे होने वाले विद्वत्‌ सम्मेलनों तक पहुचता है। स्पष्ट है कि एक ओर तो अत्यधिक आडम्बरयुक्‍त एव व्ययसाध्य होने के कारण याज्षिक कर्म-काण्डो की उपेक्षा आरम्भ हो घुकी थी और दूसरी ओर अनायोँ के आयंकरण वी समस्या भी उपस्थित थी, जिशसे ब्राह्मण एकाधिकार खतरे मे था। इसी समय ब्राह्मणों की तरह क्षत्रियो ने भी धर्मोपदेश और सत्यान्वेषण मे भाग लेना आरम्भ कर दिया परिणाम यह हुआ कि सपूर्ण मध्यदेश का सास्क्ृतिक पर्यावरण कुछ ऐसा हो गया जिसमे उत्तर बैदिक या ब्राह्मण धर्म नही सप सकता था इसी पृष्ठभूमि में भागवत, जैन तथा वौद्ध सप्रदायों या धर्मो की नीव पडो थी। पहला भागवत्त धर्म प्राचीन ब्राह्मण धममं के एक अग के रूप में विकसित हुआ, जव कि बौद्ध और जैन धर्म दोनो अब्राह्मण या अधिक उपयुक्त शब्दों मे ब्राह्मण-विरोधी सिद्ध हुए। भागवत सप्रदाय में प्राचीन वैदिक देवताओं तथा उनकी परम्परित कथाओ को ही कुछ परिवर्तन और परिवद्धंच के साथ अपनाया गया, और उन्ही मूतियों को नये ढंग से सवारा गया आये और द्वाविड (अनाय॑ ) सस्कृतियों के सम्मिलन के परिणामस्वरूप प्राचीन आये तथा अनाय॑ द्राविड (तमिल) देवताओं मे बहुत हृद तक एकीकरण या समीकरण होने लगा था। (इस तथ्य की विस्तृत चर्चा आगे करेंगे) तब भी भागवत धर्म मे ब्राह्मणों का एकाधिपत्य बना रहा और सर्व- सामान्य के लिए घामिक क्षेत्र मे कोई अधिकार नही था। वर्णाश्षम व्यवस्था के

विषय का सीमा-विर्धारण हर

जैन और बौद्ध पमं बाह्मण के विरोध में जन-साधारष के बहुमत को लेकर चन्नते ये और फ़िर जय थे भी आचरण के क्षेत्र में पत्ित होने लगे तो एक नई स्थिति उत्पन्न हुई। इसी युग में धामिक क्षेत्र में भागवत घम को जन-साधारण के लिए उपयुक्त तथा धर्म के साधन-पक्ष को सर्वसुतम आक्पक बनाने के साथ ही अपक क्षेत्र में सुघार लाने की भांग हैई। इसी युग की आवश्यकता की पृत्ति के लिए ही दक्षिण (बर्थात्‌ पेमिल-अदेश) के आलका> २0 का पु आन्दोलन-हूपी रूण-- - ' ]

ने और नायनमा है हफन्‍माग का स्वसुल्म बनाने क्लै साथ ही शास्त्रों भाकत को भावमूलक रूप प्रदान क्रिया भक्ति-भावना के

इतिहास में यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना थी।

भांदोलन! शब्द की यथाचंता

'आबवारों के दरा भवित-मार्ग ष्णव भक्ति-आंदोलनः का नाम दिया है, और वही से वंष्णव भवित-आंदोलन

जी भब्द मूवमेट' का अ्य॑ है डुछ व्यक्तियों या व्यविति-समूहो द्वारा किसी विशेष पहुँरेय की उपलब्धि के लिए किया जाने वाला श्रयत्व। इसके अन्यान्य होता है | की

भी यह व्यजित है कि किसी विश्वेप प्रकार की गति-विधिया शयाभीचता है ही इस शब्द के सम्बन्ध है। आन्दोलन! शब्द भी लगभग यही अर्थ देवा है। या रिफ्रामेशन! शब्द के साथ त्राति! (रेवोल्यूशन) शब्द का भी प्रयोग » णो धामिक ग्रतिविधियों ओर सकेत करने- वाला है। कैद. गो के महात्माओ मे जिस नई धामिक चेतना को अचारित किया, उसे तिहास में वीद्धिक वरांति' को संगा दी गई है। आववार भक्तों ने बंष्ण। नवीन तत्त्वों का समावेश करके भवित-मार्य को जे नेवीन मोड़ दिय आन्दोलन! शब्द से अभिहित करना ही अधिक 4 'ुनस्त्यान' या * झब्दो से भी 'आ गीलन' शब्द का अर्थ निकलता परन्तु मांदोतन! शब्द दे ही कही अधिक समीचीन है, क्योंकि घाम्रिक बी अपने को युव की आवश्यकता के पूर्व श्रवलित पर्म-पद्धति में ९६४ परिवर्तत एवं मि

ऐवं परिवर््धन तक ही सीमित रखता है, जद कि धामिक कतति हा व्यवस्था डे प्रत्ति विद्रोह को भावना लेकर आमूल परिवततन के लिए खड़ी 78 ! प्राचीनता और नवीनता में सामंजस्य स्थापित करके चलनेवाली बति-

को आन्दोलनः और दोनों मे किसी प्रकार का प्रत्यक्ष सार्मजसत्य

१६ वैष्णव भवित-आन्दोलन का अध्ययन

सुधार की भावता अधिक रहती है, वहां क्रांति! मे आमूल परिवर्तन की भावना ऊपर उठती है, जिसका अनुगमन सुधार स्वतः ही करता जाता है।

'आन्दोलन' शब्द की सारथंकता आलवारो से सचालित “भवित-आन्दोलना में भक्ति-भावना के विकास के इतिहास की दृष्टि से ठीक ही घटित होती है। आलवार भक्तों ने परम्परागत शास्त्रसम्मत भक्ति-भावना में सुधार किया, कि उसका आमूल परिवतंन किया। वैदिक भक्ति-घारा तथा द्वाविड़ भक्ति-धारा का उन्होने समत्वय किया वेद, उपनिपद्‌, गीता से विचारो को ग्रहण कर, उनमे युगानुकूल दूसरे तत्त्वों का भी समावेश करके भक्ति-धर्म को लोक-धर्म का व्यापक रूप प्रदान किया आलवारों से पूर्व वेष्णव भक्ति कुछ धामिक ठेकेदारों की घहारदीवारी मे बन्दिनी थी। उसे उनके हाथों से छुड़ाकर आलवारो ने सबके लिए सुलभ और साध्य बना दिया सामाजिक स्तर पर दँप्णव भक्त का द्वार सभी जातियो के तिए खोलकर आलवार भवतों ने वैष्णव भक्ति को पहली बार लोक-धर्म या जन-धर्म बना दिया यही नही, यज्ञादि कर्मों मे सीमित रहनेवाली शास्त्रीय वैष्णव भक्ति को भावात्मक (भावमूलक) रूप देकर सर्वंसाधारण के लिए उसे सरल और सुलभ बनाने के साथ भवित को केवल अनुभूति का साधन घोषित किया संस्कृत ग्रंथो मे वणित तथा केवल कुछ ही लोगों की समभ मे आनेवाली वैष्णव भवित को विशाल जन-समूह तक पहुचाने के लिए आलवार भवतों ने पहली बार जन-भाषा तमिल में भक्ति-गीत रचे यह भवित-भावना के विकास के इतिहास मे एकदम महत्त्वपूर्ण घटना है

आलवार भक्तों का भक्ति-आन्दोलन यथार्थ मे जन-आन्दोलन था। क्योकि ये पद-रचना करके सामान्य कवियो की तरह अपने घरो में पडे नही थे, बल्कि सुते क्षेत्र मे घूम-घूमकर इन्होने जन-साधारण के बीच भक्ति का प्रचार कर एक

नवीन जन-जागरण के ऐसे वातावरण का सृजन किया, जिसमे भवित का स्वर सबसे ऊंचा था। भक्ति-आन्दोलन का नेतृत्व करनेवाले आलवार भक्तों ने स्वय अपने जीवन-आदर्शों के वल पर वैष्णव भवित के नवीन रूप को जनता-जनार्दन के सम्मुख रस्ा | कहना चाहिए कि उन्होने भक्ति का राष्ट्रीयकरण (नेशनला- इजेशन) कर दिया, जिससे उस पर केवल कुछ ही लोगो का एकाधिकार होकर, सबका समान रुप से प्रधिकार हो गया आलवारो के सचालित भव्िति- मार्ग को जन-आन्दोलन वी सज्ञा देने का एक दूसरा कारण यह भी है कि उन्होने भव्ति-मावना के उदार तत्वों के साथ संगीत का मी सहारा लेकर उसे साव॑- जनीन और सार्वभौमिक तो बना दिया साथहीउसे गा-याकर आत्म-विभोर होने की अनुभूति को चीज़ भी बना दिया; साराश यह है कि आलवारो का वैष्णव भवित-आदोलन सच्चे अयथे में व्यापक जन-आंदोलन था। ही होती है। किसी परम्परागत या रूडियत 8 व्यवस्था 28024 /0726% 86% गत या रूडियत मत या में आमूल परिवर्तन ला देने के बाद क्राति का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है और वही उसकी गतिशीलता बै-पृ

(विषय का सीमा-निर्धारिण - १७

समाप्त हो जाती है। परन्तु आन्दोलन हर नई परिस्थिति का पूरा-यूरा ध्यान रखते हुए और प्रगति में सामंजस्य स्थापित करने का अववरत प्रयततल करता रहता है। अतः वह दीघंकालीन ही नहीं, अधिकांशतः नित्य होता है। इसका स्पष्ट उदाहरण यह है कि आलवारो से प्रारम्भ होनेवाला वैंप्णव भकिति-आन्दी- लग परवर्ती युग में भी चला और दक्षिण से उत्तर तथा विभिन्‍न भागों में फ्रैल- कर अस्त तक आन्दोलन ही रहा। मध्य युग में नवीन परिस्थितियों में युगानु- कल नवीन तत्वों का समावेश कर वह वैष्णव भवित-आन्दोलन, सदा आन्दोलन ह्ठी बना रहा इस प्रकार आलवारी मे भवित-मार्ग को जो नवीन मोड़ दिया, उसे आन्दोलन! कहना हो उचित है। ब्राह्मणकालीत याजिक कर्मकाण्डो द्वारा उत्पन्न आर्थिक-सामाणिक समस्याओं का समाधान करते हुए नवोदित सामा- जिक परिस्थितियों का पूरा-्यूरा ध्यान रखते हुए, परम्परागत भवित के प्रति विद्रोह करके आलवारों ने उसे सबके लिए सुलभ आकर्षक रूप देकर वैष्णव मवित को सुदृढ़ आघार-भूमि प्रदान वी अतः इसको वौद्ध-जैन धर्मों को तरह 'क्रास्ति' कहकर सुधारवादी भक्तिपरक जन-आन्दोलन ही कहना उचित है। कुछ विद्वानों ने भवित-आन्दोलन का प्रारम्भ उपनियत्‌काल से ही माना है, परन्तु दस्तुस्थिति यह है कि आलवबाएर भक्तों के काल से ही ययाथ में पूर्ण रूप से बैप्णव भवित को आन्दोलन” का रूप प्राप्त होता है। अतः भारतीय वैष्णव भवित आंदीलन का प्रार्म्म आलवार भक्तों से ही मण्नना संगत है। आलवार भक्तों का समय ईसा की पांचवी शहाब्दी से नदीं शताब्दी के पूर्वार्द तक है। आालवाएों के द्वारा प्रेरित होनेवाला भक्ति-आन्‍न्दोलन जोर पकड़ रहा था कि आठवीं शताब्दी में श्रंकराचार्य के आविर्भाव ने पुरे: प्राचीन युगीन सभस्याओं को वैध्णवों के सामने उपस्थित क्रिया। इस बार वैष्णवों से उनके साकार ग्ह्म को छीन लेने का प्रयत्न हुआ और उस अपहरण का आधार श्रु्तियों को बताया गया झंकराचार्य के देशव्यापी प्रमाव को चुनौती देकर आलवारों से सुधार पानेवाले नवीन आकर्षक भवित-मार्म को देशव्यापी वनाने के लिए आतवारोत्तर काल में वैष्णव आचार्यों ने विशेषकर रामानुजाचार्य ने आलवार- मदित का (संस्दत के माध्यम से) शास्त्रीय विदेचन प्रारम्भ कर दिया। इस प्रयत्न में अनेक सम्प्रदायों का जन्म हुआ, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में भव्ति- मार्ग को प्रतिष्ठित कर उसे लोकप्रिय बना दिया | मध्ययुग का प्रारम्भ हम दसवी शताब्दी से मानते हैँ। उसकी अवधि सोल- हवी-सभरहदी शताब्दी तक है। आाउवारोत्तर काल ही भवित-साहित्य के इतिहास में मध्यकाल कदलाता है। मध्य युग मे दक्षिण भारत में वैष्णय भक्ति-आन्दो- लेन पराकाष्ठा पर पहुंचा था, जब कि उत्तर भाय्त प्राधीनतए की झंजीरो [में जकड़+र पतित धामिक अवस्था मे था। वहा भी सुधार की आवश्यकता हुई। जब परिस्थितिया तैरहवी और चौदहवी श्ताव्दियों में बहुत ही विकट हो गई,

श्ष वैष्णव भक्ति-आन्दोलन का अध्ययन

तब उन्होने एक व्यापक जन-आंदोलन को जन्म दिया मध्ययुगीन उत्तर भारत (हिन्दी-अदेश) की परिस्थितियों में विशेषकर हिन्दू-धर्म की स्थिति में जो बीमारियां थी, उनको ठोक करने को सारी औषधियां, दक्षिण के वैष्णव भवित-आन्दोलन मे थी। यही प्रमुख कारण है कि दक्षिण के वैष्णव भवित- आन्दोलन का स्वाभाविक रूप से उत्तर मे स्वागत हुआ। उत्तर मे दक्षिण के इस सर्व सुलभ, सार्वजनीन, सार्वभौोमिक उदार वेष्णव भक्ति-आन्दोलन को जन- आन्दोलन का व्यापक रूप देने के लिए जन-भाषा हिन्दी के माध्यम से भकिति- मार्ग का प्रचार करते की आवश्यकता थी। यह काय॑ स्वामी रामानन्द ने किया | इस प्रकार रामाननद ने उत्तर में (हिन्दी-प्रदेश मे) वैष्णव भक्ति का द्वार सबके लिए सोल दिया और दक्षिण के वैष्णव मजिति-आन्दोलन के सभी आकर्षक तत्त्वों का समावेश अपने युग की आवश्यकता के अनुसार किया। तब भक्ति-आन्दोलन "बिजली की चमक! के समान समस्त उत्तर भारत मे फैल गया। इसको देसकर विदेशी विद्वात्‌ आश्चयं चक्ति हो जाते हैँ और इस आन्दोलन की पर्व पीडिका का सही विवरण प्राप्त करने के कारण गलत अनुमान कर बैठे हैं॥ स्वामी रामा- नन्द ही उत्तर और दक्षिण के वैष्णव भवित-आदोलन के सेतु हैं। इस प्रकार बप्णव भवित-आदौलन देशव्यापी वन गया। उत्तर में मुसलमान शासन तथा भारत में इस्लाम का आगमन बेवल सयोग की वात थी। परवर्ती युग मे भक्ति- आंदोलन को व्यापक रूप देने में तथा उसे लोव प्रिय बनाने में उसका थोड़ा-बहुत हाय रहा। परन्तु इतना निश्चित है कि उत्तर मे (हिन्दी-प्रदेश मे) मुसलमान शांगों बी बट्टर घामिक नीड़ि या इस्लाम के प्रचार के अभाव में भी दक्षिण का वैष्णव भवित-आंदोलन स्वामाविक रूप से मध्ययुग मे उत्तर मे पहुचता हां, उत्तर वी राजनीतिक परिस्थितियों ने वेप्णण मवित-आदोलन के लिए अभी- ब्थित अनुफूस वातावरण का सज॑ अवश्य किया मप्पयुगीन बेष्णव भवित-आदोलन देशब्यापी रहा, यही कारण है कि सभी भारतीय मापाओ या मध्ययुगीन साहित्य भक्ति-भावना से ओत-प्रोत है। मध्ययुग में स्यापप मवित-आदोसन के द्वारा उत्पन्न भकितिमय वातावरण के मारण की समस्त भारतीय भाषाओं मे विपुल मात्रा में मकिति-साहित्य वा निर्माण हुआ मारतीद भाषाओं के मध्ययुगोन साटित्य में यह मावात्मक एकता बहुत्त ही स्पष्ट रूप में _परितक्षित होती है। यह भकिति-आदोलन की महती देन है दग प्रवार स्पा भारत को एकता ने: शुत्र में बाधनर अनैबता में एकतावाली मभादपीर सरहति ने मूलभुत तथ्य को मध्ययुग में वैष्यय मविव-आंदोलन मे मुदुइ रिप्रा।

प्रप्पपन को दिशा 87 दि मेव ड्श््म हा डे दक्तिद अर्खा्‌ गमि “परदेश मे ईसा वी पायदी शताब्दी मे नर्दी शताब्दी हक गरया शेप में सोगदिय गाने वाया भवित-आस्दोउन बँष्दव मभवत आल- दार और शंद सना नापनमारो को देन है। परवर्ती युग मे कई कारणों से तमिल-

विषय का सीमा-निर्धारण | १६

प्रदेश का वैष्णय भक्ति-आन्दोलन ही वैष्णव आचार्यों के माध्यम से तमिल- प्रदेश की सीमा को पारकर नाता भागों में प्रसारित हो सका और हिल्दीआदेग रे संशबवप रूप में प्रचार पा सका उसकी तुलना में तमिल-अदेश के शैव को शैव-भक्ति-आरदोलन हुछ कारणों से तमिल-पदेश में ही सीमित रह गया [चूंकि हल्दी का अधिकाश भवित-साहित्य वैष्णव भवित-्साहित्य है और वह वैष्णव अवित-आन्दोतन की देन है, अतः हमने अध्ययन को आकर्षक और अधिक उप« मोगी धनाने के हेतु बैप्णव भक्ति-आरदोलन तक ही सीमित रा है। इस योजना के कारण प्रस्तुत अध्ययन में तमिल तथा हिन्दी के वेष्णव-भवित-साहित्यों का पूरायूरा उपयोग किया जा सका है एक प्रकार से दक्षिण से उत्पल्त होकर पर- बर्ती युग में उत्तर में प्रसारित होने वाले वंप्पव भक्ति-आन्दोलन के इतिहास का अधिकांश भाग तमिल तथा हिन्दी वैंप्णव-भक्ति-साहित्यों के भीतर ही दृष्ठि- गोचर है। यही कारण है कि वैप्णब-भवित-आन्दोलन के क्रमिक विकास को दर्शाने की दृष्टि से इस ग्रंथ में बेप्णव भवित-आन्दोतन का अध्ययन तमिल और हिन्दी-साहित्यों के आधार पर किया गया है! भक्ति-आरदो लन के महत्व ने साहित्य, धर्म, दर्भन और इतिहास के पण्डितों का ध्यान अपनी ओर साकृपष्ट किया जौर १६वीं शताब्दी से ही इस दिया में महत्त्वपूर्ण कार्य छिए जाने लगे इन कार्यों में विश्षेष उल्लेसनीय वे हैं जो भक्ति- भान्दोलन या भागवत सम्प्रदाय पर प्रकाश डालते हैं भयवा स्थान विशेष में पल्लवित वैष्णव धर्म की रूपरेसा प्रस्तुत करते हैं। प्रथम कोटि के ग्रन्थों में विशेष महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय दो ग्रंथ हैं--ड० भण्डारकर की पुस्तक 'वैप्णयदइपम, दाँवइम एण्ड अदर माइनर सेक्ट्स” तथा दधा० हेमचन्द्र राय चौधरी की पुस्तक मेटिरियल फार स्टडी आफ अर्ली हिस्ट्री आफ वैष्णव सेक्ट' डा० भण्डारकर तथा डा० हेमचद्ध राय चौधरी ने साहित्य एवं पुरातात्तविक सामग्री की छान- बीन कर यह निष्कर्प निकाला कि भक्ति-आन्दोलन पूर्णतया भारतीय मतीपियों की देत है | डए० शण्डरकर के अनुसार पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में वैष्णव धर्म एकेशवरवाद के पिद्धान्तों को आधार बनाकर धर्म-सुधार-आन्दोलन के रूप में एकास्तिक धर्म के नाम से खड़ा हुआ। उस समय “गीता' की रचना हुई और शीघ्र ही इसने एक सम्प्रदाय का रूप धारण किया' जिसे पांचराव्र या भागवत धर्म कहा जाते लगा सात्त्वत वंश बालों ने इसे बढ़ावा दिया पहली शती ई० ढक इस सम्प्रदाय में बालगोएल का अभाव रहा उसके पश्चात्‌ आभीरों ने वाल गोपाल को कथाओं का श्मावेश किया और आठवीं दाताब्दी तक यह सम्प्रदाय इसी रूप में चलता रहा। तब शंकरादारय का आविर्भाव हुआ, जिससे भक्ति- आन्दोलन में मतिरोध भा जाने की आशंका हुई, किन्तु ११वी शर्ती मे रामानुजा- चार्य ने उसे संभाला और उसे नया रूप प्रदान किया | उत्तर मे सिम्बार्काडार्य ने उनका अमुकरण किया और बात गोपाल की उपसना को प्राधान्य दिया चैरह- थी शत्ती में मध्वाचाये मे भवित-आन्दोलन वो जागे बढ़ाया उत्तर भारत में रामातन्द ने उसके विकास को गतिशील किया योर भागवत पर्म में रामोपासना , «*

२० देध्यव भवित-भाररोवन को अध्ययग

का प्रघार रिया। १५थी इती से कबीर ने मरि-म्र घूर्ण योग दिया और १६वीं शत्ती में यत्वभा बाय ने पारना को आगे घदाया जब भागवत परम सम्बन्धी ्रित्रों प्रो समीवरण बर भवित-आररीसन का शंपलावद इतिदास प्रस्तुत किया गया तय अनेद भारतीय दया विदेशों विद्वानों ने इस विषय पर ऐसिटासिक आपार पर लिशना प्रारम्भ कर दिया और डा० अण्डारकर के मतो झा राण्डन-मण्डन हुआ। डा० चौधरी में एस विषय पर ओर प्रवाश डाला है। उन्होंने मवित-आन्दोलन के प्राचीन प्रतिटास पेः अप्ययत वी सामग्री की पूरी छानवीग पःरफे उन समस्याओं या निरायररण कर दिया जो डा० भण्डारकर के महत्त्वपूर्ण प्रन्य को रघना के बाद रह गई थीं। डा० सौधरी के मतानुसार चौथी शती ई० पू० तक मथुरा में ही मागवाी पी रास्या अधिक थी और दूसरी शी ई० पू० भे भागवत घर्म भारत के पश्चिमोत्तर सीमान्त पर्देश मे पहुंचा अब अनेक विदेशी भी उसे स्वीकार करने लखगे। प्रथम शती ई० पूृ० तक चह महाराष्ट्र मे भी पहुंचा, जहा से वह तमिल-प्रदेश मे गया और फिर वहा से नई गति एवं नया कलेवर लेकर सारे हिन्दू जगत्‌ भें फैल गया। गुप्तो के उदय के पश्चात्त तो भागवत धर्ष का प्राघान्य स्पापित हो गया सेकिन उस युग मे रामा- बत सम्प्रदाय का कोई अभिलेस नही मिलता। शुप्तों के पतन फे बाद भागवत धर्म उत्तर में धीमा पड़ गया। नवी शताब्दी मे भागवतों का पुनः प्राघान्य स्था- पित हो गया। डा० भण्डारकर ओर डा० चोधरी के इन दो महत्त्वपूर्ण प्रयो के अतिरिवत बुछ अन्य विद्वानों ने भी ऐसे कुछ ग्रथो का प्रणयन किया जो स्थान विशेष में पल्लवित वैष्णव धर्म पर अथवा किसी वैष्णव आचार्य पर प्रवाश डालते हैं। इस कोटि मे आने बाले दुछ ग्रथो मे दक्षिण के कुछ विद्वानों ने केवल दक्षिण के बैप्णव भवित-आदोलन पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से प्रकाश डालने का प्रयत्न किया। परल्तु समग्र रूपसे भक्ति-आदोलन पर प्रकाश डासने वाले ग्रंथ उप- युक्त दो विद्वानों के ही विशेष रूप से थे, दूसरे अधिकतर प्रदेश-विद्येप के भक्ति- आदोल्षन पर प्रकाश डालने वाले थे। हिन्दी मे भी इस विपय पर बुछ कार्य हुआ। मक्ति-आदोलन पर प्रकाश डालने चाले वेवल दो ही ग्रथ प्रमुछठ हैं: यलदेव उपाध्याय का “भागवत धघममं ' और प० परशुराम चतुर्वेदी का 'वंप्णव- धर्म! फिर ढा० मुंशीराम दार्मा का भक्ति का विकास' भी प्रकाश से आया। हिन्दी-साहित्य के इतिहास ग्रथो में भी भवित-आदोलन के विपय में यत्रन्तत्र विवरण दिए गए हैं। इनमे आचार रामचन्द्र शुवल की पुस्तक 'हिन्दी साहित्य का इतिहास', डा० हजारोप्रसाद द्विवेदी की 'हिन्दी साहित्य की भूमिका! तथा 'मध्यकालीन ध्म-साधना', प० परशुराम चतुर्वेदी की पुस्तक 'भविति- साहित्य में मधुरोपासना', डा० रामबुमार वर्मा की पुस्तक “हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' आदि उल्लेखनीय है। विविध संप्रदायो पर भी विद्वान्‌ लैसको मे हिन्दी मे कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य किए है। फिर भी इन विद्वानों के ग्रंथों

पदीतग के वियास में महरव- और भैन्‍न्‍्य मदाप्रमु ने इृष्णो-

विषय का सीमा-निर्धा रण २१

में भारतीय वैष्णव भविति-आंदोलन का पूर्ण चित्र संतुलित रूप में जा नहीं सका। भव्ति-साहित्य पर लियने वाले सभी हिल्दी विद्वानों दे वैष्णव भक्ति-आदीवन के उन्तायक आलवार भक्तों का सक्षिप्त परिचय (गलत या सही रूप मे) अवश्य दिया है। परन्तु इन प्रंथों में वैष्णद भक्ति-आंदोलन के पूर्ण चित्र को संतुलित रूप में देखने में तमिल-प्रदेदा के आलवारों के 0 में और बहुत कुछ कहने की आवश्यकता रह गई थी) चूकि इन विद्वानों की पहुंच तमिल-अदेश के आलवारों के तमिल 'प्रवन्धम्‌? तक नहीं थी और वमिल-अदेश (दक्षिण) के विद्वानों की पहुंच हिन्दी भविति-साहित्य तक विश्येप नहीं थी, अतः इन दोनों लेत्रों के विद्वानों के ग्रंथों में वैष्णव भविति-आंदोलन का संतुलित पूर्ण चित्र उपस्थित किया नहीं जा सका। प्रस्तुत अंथ के लेखनकाल मे हिन्दी मे एक ग्रन्थ भक्ति आन्दोलन पर भ्रदाशित हुआ। यह ग्रंथ डा० रतिभानुसिह नाहर' का है इस ग्रंथ में भवित-आंदोसन पर और भी प्रकाश डाला गया है] इस प्रभंसनीय ग्रंथ में भक्षति-आदोलन का समग्र चित्र देने का प्रयल हुआ है, पर आपार अधिकतर ऐतिहासिक है और संतुलित दृष्टि से वैष्णव भक्ति-आंदोलन के विषय में दक्षिण के आलवार भक्तों से सम्बन्धित सामप्री कम दी जा सकी है। अतः साहित्यिक तथा ऐतिद्प्तिक दोनों दृष्टिकोणों को समान महत्त्व देकर, विशेषकर साहित्यिक आधार पर वैंप्णव भक्ति-आंदोलन के इतिहास को संतुलित रूप मे, नवीन सामग्री का समावेश करके शोधपश्क दृष्टि से प्रस्तुत करने की आवश्यकता रह गई है प्रस्तुत अध्ययन इस आवश्यकता की पूर्ति का एक प्रयास मान है। प्रस्तुत लेखक का सौभाग्य है कि उसकी मातृभाषा तमिल है और उसे तमिल, दिन्‍्दी और अग्रेज्ी पर समान अधिकार है। अतः इन तीनों में उपलब्ध सामग्री की तट्स्थ रूप से छाव-वीन कर वैष्णव भवित-आन्दोलन का अध्ययन तमिल और हिन्दी-साहित्य के आधार पर प्रस्तुत करने का प्रयत प्रस्तुत ग्रंथ के रूप में हुआ है। प्रस्तुत अध्ययन के सार-हूप में जो तथ्य निकलता है, उसको एक रुपक में इस प्रकार वर्णित क्या जा स्रकता है: भारतीय वैष्णव भव्ति-आंदोधन एक विशाल वृक्ष है और आलवार भद्त उस वृक्ष की जड़ें हैं जड़ें प्रत्यक्ष रूप से दीख नहीँ पदुती है, जो जुमील के कदर चती गई हैं. परव्दु दुश् गो जीडिल एउले के लिए णड़ें ही आह्यर देती हैं। इस प्रकार वक्ष रूपी वृप्णव मवित-आंदोलन का दोषण आलवार '्बन्धम' से होता रहा है। वृक्ष की दर तक फैली हुई विविध शायाएं विभिन्‍न भवित-संप्रदाय हैं इन संप्रदायों को पोषित करने के लिए जड़ों से संगठित आहार मध्य भाग (स्थाणु) के दास ही पहुंचता है यही मध्य भाग है भरी स्षप्रदाय और भागवत जिस प्रकार शाखाएं भ्रमशः ऊंचाई की ओर बढ़ती हैं और चारों ओर फैलती जादी हैं, उसी प्रकार वैष्णव भवित-आंदोलन दक्षिण भारत से प्रमणः उत्तर वी कोर प्रसारित हुआ ओर चारों ओर प्रचारित हुआ। फ़िर इन घासाओं में लगे फलों के रूप मे असंख्य बैप्णय भक्त कवि हैं, जो विडिश * संप्रशयों मे हुए हैं। उत्त भजित-आन्दोलत रूपी वृक्त की शीतल छाया में कण

श्र मैव्याय भवित-भरदोसन था अध्ययते

गुग मध्याह्ठ के प्रयर ताप से बचकर आत्म घान्ति पाते हुए फलो मा रगारयाइन करने याते हैं मघ्ययुग्ीन तपा परवर्ती भरत जय इस यु में रूपक में जहोड़ा जो महत्त्व है, वही भारतीय भवित-आंदोलन में आतवार भवतों भा है। अधिए यया कहे इस रूपकः से भारतीय यैष्णव भपित-आंदोसन पा एक राषूर्ण चित्र थो दृष्टिगोचर होता है, उसीफा निरूपण ही आगे के अध्यायों मे सरिस्तार करने का प्रयत्न हुआ है।

द्वितीय अध्याय वैष्णव भक्ति का उदूभमव और विकास (मक्ति-भावना से भक्ति-आ्रान्दोलन तक )

वैष्णव-भक्ति का जो वतंमान स्वरूप है, वह बहुत कुछ दक्षिण के वेष्णव- भक्ति-आंदोलन की देन है। वैष्णव भक्ति के क्रमिक विकास में तमिल-प्रदेश की अपनी धामिक परंपरा का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। वँप्णव-भवित-आंदी- लन्‌ के पूर्व दृष्णव-भर्ति कर को स्वरूप दिखाई देता है, वह भी एक प्रकार से वैदिक ग्रुग से चली आने वाली बेद, उपनिषद्‌ आदि से प्रभावित भवित-परंपरा के साथ तमिल-अ्रदेश की द्राविड्-संस्कृति में परिषोषित भवित-परंपरा के मिल जाने के परिणामस्वरूप ही है ! ऐसा प्रतीत होता है