॥॒ सिद्ध-सामंत युग, ७०० है०--१४०० ई० ]

डॉ० रामरतेन भेठनागर॑ एम० ए०, डी० फ़िल हिंदी विभाग, विश्वविद्यालय, सागर

धरका्शक इंडियन पेस लिमिटेड, प्रयाग

अकारशके इंडियन श्रेस, लिमिटेड, प्रयाग

प्रथम संस्करण : १६४२

परद्रक--महा देव साय आज़ाद प्रेस, प्रयाग

प्राचीन हिंदीकादंय

वि ह&7१ नेय-स ची उपक्रम

[१ | पेश

१--भूमिका--२ भाषा और साहित्य--३ राजनैतिक स्थिति: कन्नौज--रास्ट्रकूट--पाल-- सेन : सामंती ऐश्वरय--४ धार्मिक अवस्था “बौद्ध धर्म--ब्राह्षण धर्म--दाशंनिक संप्रदाय : शाॉंकराह् त, रामा- नुज का विशिष्टाह्वत, निंबार्काचार्य का दैताईत, मध्वाचार्य का देतवाद -+पौराशिक धम--रामानंद ( १२६६-१४१८ )-पूर्वों प्रदेश में कृष्णु-काव्य का जन्म ४--सांस्कृतिक अवस्था ६--साहित्यथिक अ्रवस्था : ( के ) संस्कृत काव्य ( ) अपश्रंश काव्य [ जैन साहित्य ] [ पु० [| | हिन्दी का आदिकाज्य

( ) सिद्धों की कविताः सरहपा और अन्य सिद्ध कवि ( स्तर ) नाथों' की कविता--जोगेसुरी वाणी : नाथसंप्रदाय--नाथपंथ का हृठयोंग--गोरबाणी ( ) शृंगार रस की कविता : सामंती काव्य ( ) बीर रस की कविता : सामंती काव्य--डिंगल--रासो--दल- पति विजय का खुमान रासो--वीसलदेव रासो ( नरपति नहह )-...

प्रथ्वीराज रासो (ड ) कथाकाव्य (च ) नीति को कविता (छ ) कृष्णुकाव्य (ज ) सूफ़ी कवि ( रे ) हिन्दवी भाषा को कविता [ पृ० १६५ [३ ]आदियुग के कवियों की भाषा १--प्राकृत! और प्राकझृतामासी बयना ( देशी भाषा )--निष्कर्ष

ग्पभ्रश ३--दिसिल

| पृ० श१२२ [ | आदियुग के कवियों की साहित्यिक संपदा | १० ३३५४ [ | उपसंहार ; पृ० ३२४३

परिशिष्ट १--प्रमुख कवि और उनका काव्य )) २--समसा[मयिक्र राजनीति ».... ३--राजनीति और साहित्य )) ४--सहायक ग्रंथ, पत्रादि

नामानुक्रमणिका | पृ० ३७४

उपक्रम

हिन्दी का आदियुग ( ७००-१४०० ) अनेक दृष्टियों से हमारे लिये महत्वपूर्ण है। इस महत्व को समझे बिना हम परवर्ती साहित्य- धाराओं के महत्त्व को पूर्णतः हृदयंगम नहीं कर सकते वस्तुतः जिन नये धार्मिक आन्दोलनों ने हिन्दीकाव्य पर प्रभाव डाला उनका श्रीगणेश इसी युग में हुआ और नई मध्ययुगीन हिन्दी संस्कृति का शिलाधार भी इसी युग में पड़ा

स्वेनच्वांग की मारत-यात्रा से यह स्पष्ट है कि हष के समय में उत्तर भारत में, विशेषतयः मध्य देश और बंगाल में बौद्ध-संस्कार पूर्णतः जाग्रत थे | पश्चिमी हिन्दी प्रदेश में शैत्र संस्कारों का भी उदय हो रहा था और मध्य देश में विष्णु के प्रति भक्ति-मावना भो विकसितप्राय थी | १००० ई० के लगभग हम विहार ओर बंगाल को छोड़ कर शेष हिन्दी प्रदेश में बोद धरम को फलता-फूलता नहीं पाते | इसका कारण यह है कि ७०० ई० से १००० ई० तक पश्चिमी और मध्य हिन्दी प्रदेश में राजपूत शक्तियों का उदय हुआ ओर ये शक्तियाँ शैव और वैशष्व भावों में दीक्षित हो गईं। ५०० ई० के लगभग हूणों-अ्राभीरों- गुजसें के जो दलबादल देश के पश्चिमी मार्ग से आये वे हिन्दू धर्मा-

बी मी,

चार्यों के द्वारा नव्य हिन्दू धर्म में दीक्षित हुए इसके अतिरिक्त जिन स्थानीय अनाय जातियों को शासन की सुविधा ओर वर्णांश्रम की मान्यताएँ प्राप्त हुई वे मी शैवों और वेष्णवों के दल में सम्मिलित हुईं वास्तव में राजपूतीकरण की प्रथा ने हिन्दू समाज के लिए एक सशक्त क्ुत्र की व्यवस्था कर दी। यह नया ज्षत्रिय वर्ग प्राचीन चंद्रवंशी और सूयथवंशी ज्ञत्रियों से संबंधित कर दिया गया और नये क्षत्रिय वर्गों के लिए अनेक प्रकार की कल्पना कर ली गई | पहली शती ईसवी के लगभग शकों के प्रवेश से बौद्ध धम पृष्ट हुआ था | अब हिन्दू घर्म विशेष रूप से सक्रिय हुआ और उसके चिंतन और उसकी व्यवस्था में बल आया | बोद्ध साधना, चिंता और संस्कृति बंगाल के पाल वंश का आश्रय पाकर अंतिम बार प्रदीत हो उठी | परन्तु ११६७ ई० में बख्तियार खिलजी के आक्रमण के साथ इस वेश का पतन हो गया, नालंदा और तक्षशिला के विद्यापीठ नष्ट हो उठीं, बौद्ध साधक और विद्वान नेपाल, भूटान, तिब्बत, कामरूप ओर उड़ीसा जा बसे | और इस प्रकार हिन्दू भावनाओं के सावभौम प्रसार को बल मिला |

इस प्रकार आदियुग में हमें बौद्ध साधना, बौद्ध ध्मं और बोद्ध चिंता हिन्दू साधना, धम और चिंता में लयमान होते दिखलाई देते हैं। शंकराचार्य ७८०-८२० ) में ही यह प्रक्रिया शक्ति पाती दिखलाई देती है। रामानुन (ज. १०२७ ई० ) में हम इस प्रक्रिया को वैष्णव धर्म के रूप में जड़ीभूत होता पाते हैं | आदियुग के पहले हमें बीद्ध साधना और विचारधारा के दो रूप मिलते हैं। एक हीनयान और उसके परवर्ती विकास मंत्रयान, वजयान और सहजयान में विकसित हुआ

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था यह वर्य बुद्ध की ऐतिहासिकता में अविश्वास रखता था | वह उन्हें निर्गण, आत्मस्थ चरम सचा के रूप में मानवता था और उसकी अंतः- साधना में औपनेषदिक अनहृदनाढ, कुंडलिनी और प्राणायाम का महत्व था बाद में इस विचारधारा ने शिव और राम के अवलंबन से नाथपंथ और संतमत को विकसित किया | वज्रयानी पिद्धों, गोरबनाथ ओर रामानंद-कबीर आदि में हम इसी वर्ग का साहित्य पाते हैं। इस साहित्य में बौद्ध पूरिभाषिक शब्द नये संदर्भ में ग्रहण किये गये हैं और साहित्यरूपों और शैलियों के लिए भी यह बौद्ध साहित्य का ऋणी है बौद्धों की भाँति आचारमय जीवन का इसमें महत्त्व है और ब्राह्मण वर्ग, वाह्माडंबर, जातिपाँति और वर्शाश्रमधर्म का तीव्र विरोध | इस प्रकोर परवर्तो युग की सामाजिक जागरूकता बोद्धों की ही देन है। यह भावना ऐसे वर्गो' में विशेष रूप से पनपी जो किसी धर्मविशेष के अंचल में नहीं बँध पाये थे और जो बाई में “न हिन्दू मुसलमान” योगीदलः में अंतर्भक्त हुए | हीनवर्ण हिन्दुओं के वर्णाश्रम विरोधी संस्कारों ने भी इस विचारधारा को निगुंशमत में पल्‍्लवित और पुष्पित किया

बौद्दों का महायानधर्म ही सामान्य जनमत था। उसमें मक्तिवाद, मूर्तिवाद, अवतारवाद, पौराशिक विश्वासों और मंत्रयोग का विशेष महत्व था भगवान बुद्ध की मूर्तियों, विहारों ओर चेत्यों में इसी वंग की वर्म-भावना विजड़ित है। यही सामान्य बौद्ध धर्म वैष्णब मतवाद भें रूपांतरित हो गया शिवशक्ति को लेकर यह भक्तिवाद पहले से ही न्वल रहा था, बाद में विष्णु और उनके रामक्ृष्ण अवतारों के माध्यम से उसका विकास हुआ परिवर्तेन की यह प्रक्रियां इतनी चुप-चुप हुई

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कि सामान्य जनता से ये बौद्ध संस्कार लुप्त ही हो गए। मोर्यों" के अंत ( २४० पू० ई० ) से गुप्तों के समय ( ३०० ई०---४४० ई० ) तक यह रूपांतर चलता रहा | वस्तुतः गीता, भागवत और पुराण इस प्रक्रिया के तीन प्रधान अंग थे रामायण और महाभारत ने वैष्णव संस्कारों के इस रूपांतर को लोकप्रिय बनाया

इस तरह आधदियुग के पहले ५०० वर्षों ( ७००-१२०० ) में समस्त भारतीय जनता नये रूप से संगठित हुई और बौद्ध साधना ओर विचारधारा निर्गेण और सगुण मतवादों के रूप में सामने आई हीनयान और महायान का विरोध ही परवर्ती युग में सगण-निर्गंस विरोध में परिलक्षित हुआ

हिन्दू और बोद्ध विचारधाराओं और साधनाओं के बीच में सेतुबंध का काम नाथ “जोगियों? ने किया। जैसा श्री क्षेतिमोहन सेन और डां० हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का मंतव्य है, मुसलमानों के आने से पहले हिन्दू धर्म का कोई संगठित रूप हमारे सामने नहीं था और एक बहुत बड़ा जनसमुदाय ऐसा था जो परम्परागत योंग और शाक्त साधनाओ्ं को लेकर चल रहा था और हिन्दू एवं बौद्ध मतों में से किसी में भी दीक्षित नहीं हुआ था। इस ग्रवहमान समाज ने मुसलमान आक्रमण के समय अपने को हिन्टुओं, बौद्धों ओर मुसलमानों के बीच में रख कर

“न-हिन्दू न-मुसलमान' बन कर अपनी रक्षा करनी चाही, परन्तु अंत में उन्हें अपने को हिन्दुओं में ही रखना पड़ा | मुसलमानों का बोढ्ों के प्रति विशेष आक्रोश था। बुत? का श्रथ बुद्ध' की मूर्तियों से ही है बुतपरस्ती! का तातव॑ चेत्यों और विहारों से ही था। कदाचित्‌

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इंश्वरवादी मुसलमानों ने नास्तिक बौद्धों को लेकर हो कुफ की कल्पना को बाद में उनका परिचय हिन्दुओं के मन्दिरों और हिन्दू मूर्तियों से हुआ और उन्होंने उन्हें भी 'कुफ्! में सम्मिलित कर लिया इस प्रकार मुप्तलमानों के हिन्दी प्रदेश में प्रवेश ( ११६३-११०६ ) के साथ इस देश के सारे धर्मों और सोस्क्ृतिक संगठनों को हिन्दू-मुसलमानों में से किसी एक दल में जड़ीभूत हो जाना पड़ा। फल-स्वरूप एक बहुत बड़ी संख्या में एक विराट प्रवहमान जन-समुदाय इस्लाम में दीक्षित हुआ बौद्ध और हिन्दू हीन वर्ण भी बहुत बड़ी संख्या में मुसलमान बन' गये ओर इस प्रकार इस्लाम की धार्मिक असहिष्णुता के कारण सारा भारतीय जनसमाज हिन्दुओं और मुसलमानों के दो दलों में बंठ गया शेबों के कितने ही संप्रदाय बहुत दिनों तक अहिंदू रहे, परन्तु बाद को शैव- वैष्णवों में सामंजस्य और संतुलन स्थापित हुआ और वे “विरादू' हिन्दू समाज के दो प्रमुख अंग बन गये | इस प्रकार १२०० ई० से १८०० ३० तक हम समाज में धर्म ओर रुस्कृति के अनुसार विभिन्न प्रवहमान प्रवृत्तियों के जड़ीभूत होने की प्रकिया को स्पष्ट रूप से देखते हैं

इस अप्रत्याशित आक्रमण के कारण हिंदू धर्म को विशेष रूप से जागरूक बनना पड़ा फलस्वरूप उसमें जहाँ प्रतिक्रियास्वरूप पौराणिक धर्म का पुनरुत्थान हुआ और जातिवर्ण की रुढ़ियाँ दृढ़ हुई एवं स्मृतिग्नंथों के द्वारा समाज का नियमन हुआ, वहाँ दूसरी ओर संपूर्ण समाज को एक विशाल ताने-बाने में बाँधने का भी प्रयत्न हुआ ओर वैष्णवधर्म के साथ एक तरह की उदारता भी आई 'हरि को भजे सो हरि का होई'--वाली भावना का मूल स्रोत घामिक उदा-

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रता. ही है | पौराणिकों ने धर्म की <ंखला को कड़ा बनाया और समाज को और भी अधिक अनुशासित किया, भक्तों और आचारयों मे धर्म ओर दर्शन को सर्वग्राही बनाकर सभी प्रकार के विश्वासों को एक विराट सूत्र में गुंफित किया। रामानुज और रामानंद इसी उदारचेत्ता विचारधारा के प्रतीक हैं | परन्तु इस उदास्चेत्ता वैष्खव- समाज का एक संस्कृति का भी अंग था। उसने भारतीय संस्कृति को नए दंग से संगठित किया और गुस्तों-राजपूतों के संस्कारों को आदर्श माना उसकी दृष्टि मारत के इस स्वणुयुग ( ४०० इईं०---१००० ई० ) पर गड़ी रही | वस्तुतः हिंदू धर्म और संस्कृति में जो स्व- श्रेष्ठ है वह इन्हीं ६०० वर्षा की देन है नवीन पुनस्त्थान मे यह देन बड़ी सहायक सिद्ध हुई | परवर्ती युग ( १४००--१६०० ई० ) में हम साहित्य, कला और जीवन की सारी चेतना इसी सांस्कृतिक दाय से ओतप्रोत पाते हैं। इस चेतना में जहों प्रतिक्रिया और प्रति- रोध की भावना है, वहाँ भारत के सांस्कृतिक पुनंजागरण के चिह्न भी हें। |

एक समन्वयवादी दल वेदांत-योग के आधार पर निगुण-निराकार 'की उपासना लेकर चला | मूर्तिपूजा को वह निम्न श्रेणी की वस्सु मानता था। साधना की उच्चावस्था में साथना के लिए मूर्ति की अपेक्षा नहीं थी | इस प्रकार वह इस्लामी विचारधारा से बहुत निकट थथा। बाद में रामानंद-कबीर के माध्यम से इसने संत ( निर्गणी ) विचा[रूघारा को संगठित किया और इस प्रकार प्रगतिशील सामा- जिक और धार्मिक शक्ति के झूप में क्षेत्र में आया | इस समन्ब॒य का

( )

आरम्म आदि युग में ही हो गया था। नामदेव-रामार्नंद इसके प्रतीक हैं| परन्तु उसकी सबसे बड़ी शक्ति कबीर ( १श्६८--१५१८ ) थे जिनका संबंध अगली शताब्दी से है।इस प्रकार प्रतिक्रिया और समन्वय के द्वारा नवीन मध्ययुगीन संस्कृति के नये तत्वों का निर्माण हुआ | क्‍ आदियुग की साहित्यसंपदा को देखकर यह स्पष्ट है कि उस युग की धर्म ओर चिंतन ( दर्शन ) की भाषा संस्कृत थी। इन दोनों क्षेत्रों में यह युग विशेष रूप से क्रियाशील रहा | परन्तु दोनों ज्षेत्रों में मौलिक चिंता का स्थान तकं-वितक ने ले लिया था और कदाचित्‌ इसोलिए इस युग को हम टीकायुग कहते हैं व्याकरण के्षेन्न में संज्षित सार (६ वीं शताब्दी ), शाकटायन (६ वीं शताब्दी ), जैनेद्ध ( आठवों शताब्दी ) सारस्वत ( ११ वीं शताब्दी ), मुग्धबोध (११वोां शतातह््दी ), सुपद्म ( १४वीं शताब्दी ) हेमचंद्र (१२ वीं शताब्दी ) इसी युग की रचनायें हैं। काव्य की दृष्टि से यह युग अपकर्ष का था परन्तु फिर भी अच्छी कविताओं की कमी नहीं थी, यद्यपि इन कविताओं में सहज कबिस्फूर्ति अब नहीं रह गई थी। इस युग का अधिकांश संस्कृत-काव्य ऊहाप्रधान है, वाक्यविन्यास में कत्रिमता और दरबारीपन है माघ, श्रीहृर्ण और वाण इस साहित्य का प्रतिनिधित्व करते हैं रीतिकाल ( १६००--१८०० ) के हिंदीकाव्य ने इसी साहित्य को आधार मान लिया था। दोनों एक ही सामंती समाज और चमत्कार-प्रधान मेधा की उपज हैं.। साहित्य- शासत्र के छोेत्र में इस युग में विशेष चितन छुआ जिस युग में काव्य-

( ) स्फूर्ति अधिक नहीं होती उस युग में साहित्य-विवेचना विशेष बल्ल प्राप्त कर लेती है। एक तरह से यह युग भाष्यकारों और टीकाकारों का युग था। इन भाष्यों ओर टीकाओं और उपटीकाओं में जिस पांडित्य ओर वहु-श्रुततत का विकास मिलता है, वह आज भी हमें चमत्कृत कर देने में समथ है। धमंशास््रों की टीकाश्रों के क्षेत्र में कुल्लूक भट्ट, मेंधातिथि, गोविंदराज, अपराक, कक, नारायण, वरद्राज, असहाय, रंगनाथ और सायण आदि आचार्य प्रमुख हैं। उपनिषद्‌, गीता और ब्रह्मसूत्र इस युग के दाशनिक चिंतन के मेरुदंड थे | शंकराचार्य ने इनका भाष्य उपस्थित किया ओर इस तरह “हदत्रयी पर भाष्य की एक परम्परा चल पड़ी | रामानुज, मध्व और निंबाक ने इन ग्रंथों पर भाष्य लिखकर शंकर के अद्वेतवाद के विरुद्ध विशिस्टाद्वैत, द्ेता- ह्वेव और देत की प्रतिष्ठा की | वास्तव में भाष्ययकार और टीकाकार ग्रपनी मौलिकता को स्वतंत्र रूप से रखने के लिए तैयार नहीं थे मूल के द्वारा अपने विशेष सिद्धान्त का समथन करने के लिए ही ये भाष्य लिखे गये। इन थाष्यों की भी टीकाएँ हुई, फिर उन टीकाओं की टोकाएँ और इस प्रकार कभी-कभी टीकाश्रों-डपटीकाओं को चोथी, पाँचवी, छठी पुश्त भी तैयार हुई | यह स्पष्ट है कि ये भाष्य- कार और टीकाकार असाधारण प्रतिभा वाले पंडित थे। उनकी सूच्रमातिसूक्षम विवेचना-शक्ति अपू्ब थी। उनका अध्यवसाय अपौर था | केवल शान्ति और समृद्धि के युग में ही ऐसी अपूब मेघा का विकास संभव है मुसलमानों के कारण यह परंपरा बहुत कुछ छिन्न- भिन्न हो गई | जिस युग में बुद्धेबिलास, पांडित्व और प्रतिमा को

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राजसभाओं और सामान्य नागरिक जीवन में अपूर्व आदर प्राप्त था, वह बीत रहा था। सामंती व्यवस्था में राजा साहित्य और कला का भी संरक्षक था। अनेक राजा केवल विद्वानों को आश्रय ही नहीं देते थे, वे स्वयं भी सरस्वती के उपासक ये | महाराज भोज ( ८४० ई०-- ८६६ ई० ) अंतिम हिंदू संरक्षक थे | आज भी भोज की गुणग्राहकता आर दानादि के संबंध में कहानियाँ प्रसिद्ध हैं | उन्होंने स्वयं ज्योतिष, तंत्र और स्मृति पर ग्रंथ लिखे। मुसलमानी शासन इस मौलिकता को आश्रय नहीं दे सका | फलतः मौलिक ग्रंथों की बाढ़ रुक गई परंतु इस्लाम धर्म ने समाज में जो उथल-पुथल पैद[ कर दी थी, उसने स्मृतिग्रंथों और व्यवस्था-सूत्रों के प्रणयन को बल दिया अतः युग की विशेष आवश्यकता के कारण बड़े-बड़े निबंध लिखे गये जिनमें प्राचीन सुमृतिग्रंथों की शास्त्रीय व्यवस्थाओं का निर्देश था ओर हिंदू धम और समाज की नई नियोजना थी ये व्यवस्था-्रंथ संपूर्ण भारतवर्ष में लिखे गए यद्यपि काशी, पूना, नब्रद्दीप और मिथिला इस संबंध में अग्रणी थे | कन्नोज के लक्ष्मीधर, कर्णोटक के मध्वाचाय, बंगाल के शूलपाणि और जीमूतवाहन, मिथिला के चंदेश्वर और वाचस्पति मिश्र, उड़ीसा के विद्याधर और नरतिंह, बुन्देलखंड के मिन्र मिश्र, कुमाय्‌ के अनंत भट्ट, तिलंगाने के देवान्न भट्ट, काशी के कमलाकर भट्ट और नवद्वीप के रघुनंदन आदि पंडितों के निबंध- ग्रेथों में हिंदू आचार शासत्र के संबंध में अद्भुत पांडित्य का दर्शन होता है। विद्यापति ( १३७५--१४५० ) जैसे भावुक ओर विद्स्घः कवि ने भी युग की इस प्रद्धत्ति में योम दिया | संस्कृत की उनकी।

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सभी रचनाँ इसी कोटि की हैं। इससे यह स्पष्ट है कि समाज को आचार-शंखला में बाॉँघकर विदेशी धर्म और आचार से सुरक्षा की व्यवस्था की गई | इन पंडितों और आचायों के कारण हो हिंदू समाज और हिंदू धम इस बबंरता और उद्दंडता की बाढ़ को चद्दान 'की तरह रोक सका |

ऊपर के विवेचन से यह स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य में उस युग 'की कारयियी और भाविक प्रतिभा का अत्यंत अल्पांश ही सुरक्षित 'हैं श्र केबल हिंदी रचनाओं के बल पर हम उसकी मेघा की परख नहीं कर सकते

इस युग के साहित्य के लिए संस्कृत के जो ग्रंथ विशेष महत्त्वपूर्ण हैं, वे तंत्रग्रंथ और भक्तिग्रंथ हैं। तंत्रों का साहित्य सातवीं शताब्दी से ही आरंभ होता है और कुछ विद्वान उन्हें स्पष्ट रूप से विदेशी मानते हैं परंतु ऐसे भी अनेक पंडित हैं जिनका विश्वास है कि तंत्र 'आगैतिहासिक है और हिंदी के पूर्षी प्रदेशों में मतृशक्ति की पूजा पके साथ -तंत्रसाहित्यं अज्ञात काले से विकसित होता रहा है।जों हो, तेंत्रसाहित्य इस युग की प्रह्डति को सूचना देता है। वज्रयानी- 'साहित्य पर भी इसका प्रभाव है, परन्तु नाथसाहित्य पर और भी अधिक नाथ-संप्रदाय के प्रधान आचार्य मीननाथ. और गोरख 'नाथ के क्ई तंत्रग्रंथ प्राप्त हैं।अ्रष्टचक्र और कुण्डलिनी-साधना 'तंत्रबाद के ही महत्वपूर्ण अंग हैं, नाथ-संअ्रदाय में पुरातन योगसाधनां के साथ इन्हें भी स्वीकार किया गया है। यहीं से यह प्रभाव संत- साहित्य में आया उन्नीसर्वी शताब्दी तक तंजत्रनसाहित्य की परम्परा

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चलती रही है और संत-मत के साथ मध्ययुग की भक्तिधाराओं परः भी उसका प्रभाव लक्षित है। भक्तिसाहित्य भी इस युग की प्रमुख प्रवृत्ति है। भागवत, अध्यात्म रामायण, पंचरात्र, नारद भक्तिसुत्र, शांडिल्य' भक्तिसूत्र, ब्रह्मवैवत्ते पुराण, गे संहिता, लघु भागवतम्‌ ( बोपदेव 2 आदि रचनाएँ भमक्तिवाद के भावनात्मक और सैद्धांतिक पक्ष की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इनका निर्माण इसी युग में हुआ एक दूसरी प्रकार का भक्तिसाहित्य भी महत्वपूर्ण है | वह है स्तोत्र-साहित्य जैनों,. वैष्ण॒वों, बोद्धों, शैवों और शाक्तों में स्तोच्रों के रूप में उस युग का विशाल बाझूमय विकसित हुआ था हिंदी के स्तोत्रों ( तुलसी » आर विनयपदों ( सूर, तुलसी, विद्यापति ) में इस साहित्य की परंपरा का ही विकास है| इस प्रकार जहाँ तंत्रसाहित्य की परंपरा ने संत- साहित्य को पुष्ठ किया, वहाँ मक्तिवाद भागवत जसे महाप्र॑ंथों का आधार लेकर चला जयदेव के गतिगोविन्दम ( ११६१ ) ने परवर्तो युग में कृष्णभक्ति साहित्य की पद-शैली और डंग़ार-भावना का मी: नेतृत्व किया | उत्त युग की एक और महत्त्वपूर्ण साहित्यिक प्रवृत्ति सूक्ति,, नीति, वैराग्य, धर्म, श्रृंगार और लोकव्यवहारसंबंधी रचनाओं में विजड़ित है। संस्कृत के सुभाषितों में यह सामग्री बहुत बड़े अंश में सुरक्षित है। हिंदी के दोहयसाहित्य पर इसका प्रभाव कम नहीं है। परन्तु जहाँ युग की चिंता, गवैषणा, तक-बितर्क की प्रतिभा संस्कृत साहित्य के द्वारा प्रकाशित हुई है, वहाँ जनता की भावना और साधना अपभ्रंश ओर ढिंदी काव्य के द्वारा प्रस्कुटित हुई है। उसमें ब्राह्मण धर्म, जाति-पाँठि, वर्णाश्रम के प्रति आ्राक्नोश स्पष्ट रूप से दिखलाई

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पड़ता हैं। उसमें जनता का संगीत विकसित हुआ है और उसको लोकगीत-माधुरी हिंदी के परवर्ती-काव्य की सबसे बड़ी शक्ति है। गीतों के द्वारा ही लोकहृदय तक पहुँचा जा सकता है। इस युग के साधक लोकह्ृदय को ही अपना लक्ष्य बना कर चल्ले, काव्य का सहुदय” उनका लक्ष्य नहीं था | इसी से उन्होंने संगीतमय पदशेली ओर दोहा-चोौपाई का आश्रय लिया। उस युग की काव्यप्रतिमा इन्‍्हों छुन्दों में प्रकाशित हुई है | साहित्य रूपों और शैलियों की दृष्टि से इस युग का अपम्रशकाव्य ही हिंदीकाव्य की मूल प्रेरणा है। १५०० ई० के बाद विभिन्न धार्मिक आन्‍न्दोलनों और संस्कृतिक जाग- रणु के फल-स्वरूप हिंदी भाषा ने अपश्रंश की लोकभाष्रा ( तद्भव )- सस्कृति से अपने को विच्छिन्न कर लिया और तत्सम शब्दों के प्रयोग से जनभाषाओं को साहित्यिक भाषाएं बना दिया, परन्तु आलोच्ययुग में हिंदी भाषा लोकसस्कृति और तद्मव शैली को ग्रहण करके ही जनता में लोकप्रियत्‌ और शक्ति प्राप्त कर सकी थी। इसीलिए इस युग की रचनाओं में साहित्यिकता का आग्रह उतना नहीं है

इस प्रकार आदियुग का हिंदी साहित्य संस्कृत वाडुमय में सुरक्षित पडितवर्ग की चिता का पूरक है| उसमें अपद साधकों, लोक- गायकों, साधु-संन्यासियों, भाटठों, चारणों, लोकनेताओं और घर्म- प्रचारकों की अ्रकृत्रिम, कमठ, लोकविश्वत, तेजस्वी वाणी का तिक्त ओर मधुर रस उभर आया है। जनता के आचार-ध्यवहार, भुददवरे कहाजतें, विश्वास और जीवनचिता उसकी शक्ति हैं। वह शास्त्र को ओर नहीं देखता--उसकोी जोवनानुभूति श्रकृत्रिम और अपूर्व है

और, ०)

आदियुग के जनजीवन के अध्ययन के लिए उससे महत्वपूर्ण सामग्री हमें उपलब्ध ही नहों | उसके भाषा-वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्त्व में तो कोई संदेह ही नहीं हो सकता | संधियग के साहित्य की सारी इन्दात्मकता, अक्नत्रिमता और सप्राणता उसका आकर्षण है।

इस सारे युग में दक्षिणापथ (द्रविड़ देश ) विशेष रूप से सक्रिय रहा है। आंध्र देश का श्रीपर्वंत ( धान्यकटक ) बौद्ध साधकों का केन्द्र रहा है। यहीं महायान और वज्रयान का विशेष विकास हुआ | कदाचित्‌ महायान की अ्रवतार-भावना और मक्ति-भावना से प्रमावित हो यहीं वैष्णव और शैव भक्ति का प्रथम स्फुरण हुआ | बाद में यह भक्ति-भावना महाराष्ट्र और गुजरात में होती हुईं मध्य देश तक पहुँची। दक्षिण के आचार्यों को दिग्विजयन्यात्राओं ने उत्तरापथ से बौद्धधघम और बौद्ध संस्कारों का उन्मूलन किया और इन आधचायों द्वारा प्रचारित अलवारों और अड़्यांरों को वाणी ने हिंदी पदसाहित्य को प्रभावित किया | भक्तिवाद के विकास और वैष्णवदर्शनों के लिए हम दक्षिण के चिर ऋणी रहेंगे | मुसलमानों के आक्रमणों ने उत्तर भारत की मौलिक प्रतिभा को नष्ट कर दिया ओर साहित्य, कला, धर्म, दर्शन केत्षेन्न में नेतृत्व दक्तिण के हाथ चला गया मुगलों के समय तक दक्षिण का यह नेतृत्व सुरक्षित रहा |

सागर ( मकरोनिया ) रामरतन भटनागर ३० अप्रैल, १६५२

प्रवेश

सिद्ध-सामंत युग ( ७०० ई०--१४०० ई० ) हिंदी का सबसे पहला युग है पहला युग होने के नाते इसकी समस्याएँ भी कम नहीं हैं जब तक उन महत्त्वपूर्ण समस्याओं का हल्ल नहीं हो जाता जो इस युग से संबंध रखती हैं तब तक इस युग पर विवेचनात्मक ओर निर्णयात्मक ढंग से लिखना असंभव है। प्रत्येक देश ओर अत्येक भाषा के इतिहास में इस प्रकार की समस्याएँ हैं। जैसे-जैसे हम अपने समय से पीछे बढ़ते जाते हैं, वेसे-वेसे अंधकार गहरा होता जाता है, हमें आँधेरे में टटोलना पड़ता है और हम निश्चयपूवक कुछ नहीं कह सकते। हाँ, हम यह बात जानते हैं कि आगे के युग में जो प्रवृत्तियाँ फलित हुई हैं, उनके अंकुर पिछले के इसी युग में मिलेंगे हमें आगे के युगों की विभिन्‍न घाराओं के सूत्र पकड़ कर पीछे चलना होगा, तभी हम अनेक समस्याओं को सुलमा सकेंगे

इस हिंदी के आदि युग की भी अनेक समस्याएं हैं | वास्तव

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में यह युग सारे हिंदी साहित्य की वीथिका है। इसे भली भाँति समझे बिना हम हिंदी. साहित्य की कितनी ही ग्रबृत्तियों को अधूरा या ग़लत समभत रहे थे | उदाहरण के लिए, आज हमें सालूस हो गया है कि इस आदि युग की सिद्ध ओर नाथ विचारधाराओं का परवर्ती रूप ही हमें निगुंण धारा में मिलता है | इस बात को जानते हुए हम कबीर और अन्य संतकवियों को अभारतीय, इस्लाम के प्रचारक या थोथे खंजरी बजाने वाले 'निगु निए? कह देते थे अब हम जानते हैं कि डपनिषदों को निगु णु रहस्यवादी विचारधारा योगियों ( नाथपंथियों ) के माध्यम से छन कर संत-काव्य तक पहुँची है, परन्तु ज्समें बौद्ध सिद्ध साधकों की अनीश्वरवादी विचारधारा के भी अनेक अंगों के सम्मिश्रण हो गया है | यदि हम हिंदों साहित्य 'को अलग कर दें, तो उपनिषदों की निगु ण॒रहस्यवादी धारा उपनिषदों तक ही समाप्त हो जाती है | बुद्ध धर्म के प्रवर्तन के आस-पास जो एक वैष्णव भक्ति की सगुण धारा चली, उससे बाद को इतना विस्तृत सवग्राही रूप घारझण कर लिया कि पुराणों, उपपुराणों और अबतारों के कमेले में निगु चिंता के दशन ही नहीं होते। बोद्ध ओर जैन अनात्मवादी दशनों में इस निगु ओऔपनेषदिक विचारधारा से भी बहुत कुछ लिया गया है। बौद्ध सिद्ध साधकों ने संतों की इस विचार- धारा को अनेक परिभाषाएँ ढीं, अनेक पारिभाषिक शब्द दिये ओर आज हम संतों की कुंजी के लिए सिद्ध-साहित्य की ओर

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सुड़ने लगे हैं| इस प्रकार उपनिषदों के आत्मचिंतन से आधु- निक काल के निगु ण॒ सम्प्रदायों तक एक विचारश्ंखला बन गई है | हिंदी प्रदेश भारत का हृदय है, अतः हिंदी के आदि युग का साहित्य भारत की अनेक घार्मिक, सामाजिक एवं दार्श- निक गुत्थियाँ सुलमा देता है। एक प्रधान गुत्थी तो भाषा के संबंध में है इस युग का बहुत अधिक साहित्य अभी प्राप्त नहीं हुआ है। जो साहित्य प्राप्त हुआ है वह भी बड़े संद्ग्धि रूप में | सिद्ध- भाषा साहित्य के ८४ कवि राहुल सांस्कृत्यायन ने निकाल डाले हैं, परन्तु उनका साहित्य अभी “ोथियों! के रूप में है जो 'तनज़ुर? (तिब्बती ग्रंथ-माला) के रूप में सुरक्षित हैं इन कवियों की कविता को 'भोटी? लिपि से डतारा गया है। बंगला के विद्वान इन कवियों की भाषा को “आदि बंगला” ऋढते हैं, विहार के विद्वान पुरानी मगही और हिंदी के पुरानी हिंदी | इस प्रकार की विषम समस्या यहाँ उपस्थित हो जाती है | पश्चिम प्रदेश में जो जैन अपभ्रंश, चारण ओर हिंदवी काव्य हमें मिलता है, उसमें भी भाषासंबंधी जटिल समस्याएँ हैं | उदाहरण-स्वरूप हम आलर्हा को ले सकते हैं जिस रूप में अआह्हा' हमें आज प्राप्त है बह उन्‍नीसवीं सताब्दी की 'कन्नोजी' का रूप है। जगनिक ने इसे किस रूप में लिखा होगा, इसकी कल्पना भी कठिन है चन्द के रासो को मथ कर “आदि रासो” निकालने की चेष्टा आज भी चल रही है

ह. है. 2

जान पड़ता है, आठवीं शताब्दी में हिंदी प्रदेश कई भाषा क्षेत्रों में बँटा था सर्वेमान्य साहित्य-भाषा के रूप में अपभअंश भाषा चल रही थी ओर उसका रूप जैन अपजंश काव्य” में आज भी सुरक्षित है। उस समय की लोक-भाषा के कुछ रूप हमें जारण काव्य, सिद्ध काव्य ओर हिंदवी काव्य में मिलते हैं। इनसे आज के विभाषा-त्षेत्र साफ़ झलक जाते हैं | चारणकाव्य आज की मेवाती-मेवाड़ी (राजस्थानी) का प्रतीक है, सिद्ध काव्य सगही- भोजपुरी का प्रतीक है। नाथकाव्य मूलतः मध्ययुग की कबीर- पूव की (पूर्वी है। परंतु योगियों के व्यापक पयटनों के चिह्न उसमें मिलते हैं--अन्य विभाषाओं का मिश्रण डसमें हे। हिंदवी काव्य बाद की उपज है जो हिंदवी काव्य हमें मिलता हे, वह अमीर खुसरो ( १२३५-१३३४ ) का है, अतः बाद का है, परन्तु यह स्पष्ट है कि उसमें कुरु-पांचाल की खड़ी ओर ब्रज के रूप स्पष्ट रूप से भलकते हैं। आल्हा की भाषा “कन्नोजी प्राकृत' रही होगी--डस समय शताब्दियों से कन्नौज ही राज- सत्ता का केन्द्र बन रहा था, परंतु शोक, इस राजकेन्द्र का कोई भी प्रामाशिक अंथ अभी डपलब्ध नहीं हो सका है। कन्नौज ब्रजकेन्द्र से दूर नहीं है। हो सकता है, शोरसेनी प्राकृत का कोई रूप ( शौरसेनी अपभअरंश ) कन्नौज-केन्द्र को मान्य रहा हो ओर त्रजभाषा के बाद के व्यापक प्रयोग के पीछे कनन्‍नोंज-केन्द्र का भी हाथ हो। खुसरो ( १२३४५--१३३५ ) दिल्ली केन्द्र का कवि है, परंतु उसकी भाषा बज है इसके बाद निश्चित रूप

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से त्रजभाषा के पद बैजू बावरे के ही मिलते हैं जो तानसेन ( १४४० ई० के लगभग ) से एक पीढ़ी पहले के कवि-गायक है त्रज की सबसे श्रोढ़ पहली कविता सूरदास जन्म १४७८) की है ओर सूर के बाद तो ब्रजभाषा हिंदी प्रदेश की साहित्यिक भाषा ही बन गई परंतु केवल सूर के पदलालित्य से ही यह. संभव हुआ, यह कहना ठीक नहीं होगा। कनन्‍्नोज-केन्द्र की शोरसेनी अपभ्र की उत्तराधिकारिणी होने के कारण ही यह संभव हो सका होगा। इस प्रकार हम इस युग में हिंदी क्षेत्र का विभाषा-क्षेत्रों में इस प्रकार बाँट सकते हैं :

१--शौरसेनी अपभ्रंश ओर फिर ब्रजभाषा का ज्षेत्र

२--कुरु-पांचाली ( खड़ी-हिंदबी का ) क्षेत्र

३--डिंगल (राजस्थानी ) का क्षेत्र

४--ूर्वी' ( अद्धंसागधी ) का ज्षेत्र

४--प्राचीन मगही ( मागधी अपभ्रंश ) का ज्षेत्र

शोरसेनी अपभ्रंश और कुरु-पांचाली के रूप हम केवल

ल्पना से ही पूर्णतय: स्थिर कर सकते हैं | 'पर्वी? का साहित्य नाथों? की कविता में स्पष्ट है, परंतु उसमें अन्य विभाषाओं का सिश्रण है। केवल डिंगल और श्राचीन मगही ही बहुत कुछ प्राचीन रूप में हम तक आती हैं | हप के समय ( ६४० ई० ) से कान्यकुब्ज' ही मध्यप्रदेश का केन्द्र था, अतः इसी की भाषा नि:सन्देह व्यापक रूप से प्रयोग में आती होगी। दिल्ली का हच्त्व तो मुसलमानों के आने (११६१ ई० ) के साथ बढ़ा और

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धीरे-धीरे इस केन्द्र में तुर्की, फ़ारसी, अरबी, खड़ी, पुरानी पंजाबी और ब्रज के संगम से “पुरानी उदूं? बनी इसे ही खुसरो ने 'हिंदवी! कहा है। मुसलमानों के प्रसार के साथ यही भाषा व्यापक हो गई और ब्रजभाषा केवल साहित्य तक सीमित रहने लगी | दिल्ली केन्द्र में कुरु-पांचाल के लेखकों (खत्रियों, कायस्थों, जाट-गूजरों आदि) से मुसज्षमानों को अधिक सहायता मिली--बे दिलल्‍्ली-केन्द्र के पास थे। इन्हीं की बोली केन्द्र की बोली हो गई कब अपभअंश समाप्त होती है, कब पुरानी हिंदी शुरू होती है, यह बताना कठिन है। परन्तु आठवीं शताब्दी के लगभग अपभ्रंश से पुरानी हिंदी बनने की प्रक्रिया चल पड़ी होगी १००० ई० तक पहुँचते-पहुँचते हिंदी ने विकसित रूप प्राप्त कर लिया होगा | १००० ई० के बाद का काव्य तो निश्चय ही हिंदी का काव्य है, परंतु इससे पहले के काव्य को हिंदी स्वीकार करने में सतक रहना पड़ेगा भाषा ही नहीं, साहित्य के संबंध में भी अनेक समस्याएँ हैं।इस सारे युग ७००-१४०० ) में संस्कृत हिंदुओं के सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भाषा रही है। साहित्य. यह अवश्य है कि हपदेव ओर वाण के बाद ( रा० अ० ६०७ ई० ) संस्कृत में साहित्य रचना का क्रम समाप्त हो गया, परन्तु कई उत्कृष्ट काव्यग्रंथ बाद को लिखे गये, इसमें कोई भी संदेह नहीं ओर उन्‍होंने

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समसामयिक और परवर्ती हिंदीकाव्य को प्रभावित भी किया वास्तव में इस युग में संस्कृत रचनाएँ इन तीन प्रमुख श्रेणियों की हुई :

पुराण

साहित्य-शाख

दशेनमंथ और दाशंनिक, भक्तिभावपूर्ण पद्य और स्तोत्र | वास्तव में इस युग में संस्कृत में जो रचना हुई, उसी ने अगले युग के साहित्यिक आन्दोलनों की नींच रखी सच तो यह है, इस समय के संस्कृत साहित्य और इस साहित्य ओर भाषा के माध्यम से प्रचारित आन्दोलनों के बिना हिंदी का अगली पीढ़ियों का काव्य संभव ही नहीं हो सकता था। वास्तविक बात तो यह है कि इन ४०० वर्षों का संस्कृत साहित्य बड़ा विपुल और सांस्कृतिक एवं दाशेनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। संस्कृत भाषा का गौरवमय स्वर्णकाल गुप्तथुग (३००-४०० ) था। १८० पू० ई० में वृहद्रथ की म्रत्यु के साथ सांस्कृतिक केन्द्र मगध में ब्राह्मणराज्य शुरू हुए | ( शुल्ः १८० पू० ३०-१२ १० प्‌० ई०; कब ११० है ३०---७१ पू० ) इस समय मजलुस्मृति प्रश्नति अंथ बने और वासुदेवधम की प्रतिष्ठा की गई | महाभारत, रामायण, हरिवंश और गीता का आज का रूप इन्हीं सो वर्षो ( १८० पू० ई०-७१ पू० ई०) में निर्णीत हुआ परन्तु ७१ पू० ई० के आस-पास राजसत्ता दक्षिण के आंधों के हाथ में चली गई जो बोद्ध थे

( ) आओऔर २१८ ६० तक बनी रही | परन्तु ब्राह्मण हारे नहीं थे। अवन्ति और शौरसेनी प्रदेश ( मथुरा ) उनके केन्द्र बन गये थे और यहाँ से उन्‍होंने वासुदेव धम का प्रचार किया ब्राह्शवंश के नाश के बाद शीघ्र ही पश्चिमी प्रदेश विदेशियों (शकों ) के हाथ में चल्ला गया | जान पड़ता है, ४६ पू० ई० के लगभग अवन्तिराज विक्रमादित्य ने शक्कों को परास्त कर मालवा-संवत्‌ को जन्म दिया ओर ब्राह्मणों ने बढ़े गब के साथ इस संबत्‌ को अपना लिया परन्तु उस से एक शताब्दी बाद ( ७८ ई० ) शकों ने कनिष्क को जन्म दिया जो इस संबत्‌ में पुरुषपुर में सिंहासनारूढ़ हुआ और इसी तिथि से शक संवबत्‌ का जन्म हुआ। इस नई शक्ति ने शीघ्र ही फिर पश्चिमी भारत पर शासन कर लिया | कनिष्क बोद्ध था, परन्तु ब्राह्मणों के प्रभाव से शक शीघ्र ही बासुदेवधर्मी बन गये कनिष्क के पोत्र का नाम ही वासुदेव था | शकराज “देवपृत्र' कहलाता था | श्कों के हाथ से राजशक्ति ( ३१६ ई० ) गुप्रों के वंश में पहुँची जो पूर्णतः ब्राह्मणों के प्रभाव में थे और परम मायवत' कहलाते थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि १८० पू० ई० से ४०० ई० तक ब्राह्मण आचार शास्त्र, ब्रह्म॒ण धर्मशाश्न और आ्ाह्मण धर्म का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ुकर भारतव्यापी हो गया आँध्रों के पतन के बाद ( चौथी शताब्दी ईसवी में ) बौद्धों का प्रभाव बड़ी तीव्रता से शिथित्र होने लागा और बौद्ध घ्म गुह्म ओर वाह्याचार की ओर क्ुका | इस तरह हमारे इस

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युग (७००-१४०० ) में घर्म और साहित्य को दो थघाराएँ चली आती हैं। बोद्धधम ओर साहित्य की धारा नष्टप्राय है ओर ज्समें हास के चिह्न स्पष्ट देख पड़ते हैं। सिद्ध- साहित्य इस धारा का प्रतीक है। हिंदू धर्मचेतना उत्तरोत्तर जन्नत ही हो रही है, ओर उसका जो साहित्य संस्कृत अंथों में सुरक्षित है, उसमें उसकी शक्ति के दशन होते हैं। दुःख की बात है, लोकभाषा में डस समय की हिंदू धर्मंचेतना के दशन नहीं मिलते हिंदी में धर्म-चेतना के पहले दर्शन इसमें रामानंद ( झत्युतिथि १४१८) के दो-एक पदों के रूप में ही उपलब्ध हैं |

इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदी के आदिकाठय ( ७००-- १४०० ) केयुग में जैन, बौद्ध ओर हिंदू धामिक विचार- धाराओं को लेकर संस्कृत में विपुल साहित्य रचा जा रहा था | धर्म ओर दर्शन इस समय की चिंता के प्रमुख विषय थे संस्कृत, आकृत और अपश्रश तीन भाषाओं में डस युग की चिंता स्पष्ट रूप से प्रगट हो चली थी संस्कृत ओर प्राकृत के विद्वान राजदरबारों से संबंधित होते थे अपभ्र का साहित्य जनता में शुरू हो रहा था। इस अपश्र'श का जहाँ एक साहित्यिक रूप था जो हमारे पास आज तक अपभ्र 'श काव्यों, महाकाव्यों, नाटकों की गद्य-वार्ता आदि में सुरक्षित है, बहाँ इसके अनेक लोकप्रचलित रूप भी थे। इन्हीं रूपों को हम “पुरानी हिंदी! या हिन्दबी? या इसी तरह का कोई नाम दे

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सकते हैं इन्हीं अपभ्र'श रूपों से वर्तेमान काव्य की साहित्यिक ओर प्रादेशिक भाषाओं की उत्पत्ति हुईं है।इस प्रकार अप- अ्रश से कुछ मिला-जुला रूप इस समय की हिंदी का मिलता है। यह मिश्रित रूप १४०० ई० तक चल्नता है। इप्तके बाद भी कुछ ग्रंथ अवश्य लिखे गये हैं परन्तु हिंदी उसके ( अपभ्रश के ) अभाव से छूट गई थी ओर स्वयं उसका विशाल काव्य साहित्यिक ब्रज, अवधी, राजस्थानी ओर खड़ी में बनने लगा था |

इस युग के संस्कृत काव्य ने परवर्ती हिंदी काव्य को विशेष प्रभावित किया | संस्कृत में अनेक प्रकार की रचनाएँ हमारे सामने आई' ।इन रचनाओं का विचारधारा की दृष्टि से हम इस प्रकार वर्गीकरण कर सकते हैं:--

टीका-साहित्य | प्वेलिखित गंथों पर अनेक टीकाएँ इस युग में लिखी गई | इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ६०० ई० के लगभग लिखी मनुस्म॒ति की टीका थी और ११०० ई० के लग- भग लिखी याज्ञवल्कय की मिताक्षर टोका। इन टीका-संथों में अनेक प्रकार की विवेचना-प्रणा लियाँ मदहण की गई और बाद के युगों में हिंदुजीवन पर इनका व्यापक प्रभाव रहा | इन टीकाओं ने वर्णव्यवस्था को इतनी दृढ़ भित्ति दे दी कि कमंगत वर्ण-मावना युग-युग के लिए जन्मगत बन गई। इस प्रकार जातीय ओर राष्ट्रीय जीवन में धीरे-घीरे विश्वर|खलता आने लगी।

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इन टीका-मंथों को यह श्रेय तों अवश्य मिलना चाहिये किः उन्होंने लोकिक जीवन को धम की भित्ति दी, परंतु ब्राह्मण वर्ग की उच्चता ओर अन्य बर्णों की क्रमागत हीनता के सिद्धान्त के: प्रचार ने राष्ट्र का अनिष्ट भी किया |

२--इसी समय कुछ महत्त्वपूर्ण पुराणों और जपपुराणी की भी रचना हुई। श्रीभद्भागवत पुराण इसी समय की रचना है | इसका रचनाकाल ७०० ई० और १२५००--१३०० ई० के बीच में हे। इसने १४०० ईं० के बाद हिंदी- साहित्य पर विशेष प्रभाव डाला वेसे बारहवीं शताब्दी में ही. इसका प्रभाव पड़ना प्रारंभ हो गया था। जयदेव का गीति- गोविन्दम्‌! इसका प्रमाण है| संभव है, बद्यवेवर्तपुराण भी इसी युग की रचना हो | जयदेव ने अपने गंथ के मंगलाचरण में इसी पुराण की एक घटना को आधार बनाया है। इस पुराण में राधा-ऋष्ण का जो रूप हमें मिलता है वह कदाचित्‌ तांत्रिक वाममार्ग की मान्यताओं से प्रभावित है। हिंदी प्रदेश के पूर्वी. भाग में इस प्रकार के साधना का केन्द्र था, अतः यहीं इस पुराण की रचना हुई होगी। हिंदी कृष्ण-काग्य पर जिन ग्रन्थों का प्रभाव है वह इसी युग की रचना सिद्ध होते हँं--भागवत, ब्रह्मवैवतंपुराण, जयदेव का गीतगोविन्द्म , गाथासप्रशती, आर्यासप्रशती

३--इन सात सौ वर्षों में सब से अधिक चितन दशेन-

का,

क्षेत्र में हुआ | अनेक दाशेनिक संप्रदाय उठ खड़े हुए पुववर्ती काल में बौद्ध दाशनिकों के अनेक महत्त्वपूर्ण संप्रदाय जनता ओर विद्वानों की श्रद्धा के पात्र बन चुके थे। इस युग में जब बौद्धघर्म का हास होने लगा, तो उसकी दाशंनिक चिंता ने नये- नये रूप भ्रहण कर लिये वादरायण के सूत्रों का आधार लेकर अनेक 'वाद' प्रचलित हो गये | दाशनिक संप्रदायों का बाहुल्‍य होने के कारण षट्दशेन-विषयक अन्थों की रचना हुई कुमारिल भट्ट ने तंत्रवातिक नाम से मीमांसा-सूक्तों का प्रसिद्ध भाष्य किया | शंकराचार्य, रामानुज और मध्व ने त्रयी पर भाष्य लिखे और क्रमशः अछ्वेत, विशिष्टाह्नेत और द्वेतमत का प्रतिपादन किया यह युग दर्शन और धर्म-संबंधी हलचलों का युग था। बहुत संभव है, इन वादों ने इस सामंती युग के हिंदी काव्य को भी प्रभावित किया हो, परन्तु इस युग का हिंदी काव्य केवल बौद्धसिद्धों और नाथों की विचारधारा को लेकर चलता है | संभव है साम्प्रदायिक मठों में इस समय का कुछ काव्य मिक्ा सके | वैसे इन तास््विक विवेचनाओं के पहले दर्शन हमें रामानंद ( १९६६-१४१८ ) के काव्य में पहली बार मिलते हैं।

४--लल्ित काव्य में जो रचनाएँ हुई' उनमें भी पिछले पोराणिक युग से कोई विशेष अन्तर नहीं है। इस समय के असिद्ध संस्कृत ग्रंथ माघ का 'शिशुपाल बध', श्री हपे का “नेषध चरित्र', सुबन्धु का वासवदत्ताः, वाण की कादम्बरी',

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राजशेखर के विणीसंहार! और “कप्रमंजरी! और मवभूति के नाटक हैं। इसी समय आर्या-सप्ततती ओर अमझरुक-शवक की रचनाएं हुई' जिनका बिहारी पर अभाव पड़ा ओर छनके द्वारा रीतिकाव्य पर | सच तो यह है कि रीतिकालीन कवियों पर संस्कृत की इस काल की रचनाओं की बड़ी छाप रही है | काव्यशासत्र में भरत का नाव्यशाख्र,' घनझ्ञय का 'दशरूपक,? मम्मट कृत काव्यप्रकाश” इसी समय लिखें गये। इस श्रकार काव्यांग की विशेष पुष्टि हुई और उसके कई संप्रदाय क्रमश: रस, अलंकार ओर ध्वनि को सर्वोपरि मानकर चले | १४०० ई० से इस प्रकार के साहित्य की रचना हिंदी में भी. होने लगी ओर इन रचयिताओं ने संस्कृत आचायों को पथम्रदर्शक बनाया

अपभ्रंश और प्राकृत साहित्य मुख्यतः हिंदी अदेश के पूर्वी ओर पश्चिमी सीमांतों पर ओर उसके बाहर बना। हिंदी का सिद्ध-धाहित्य, जैन-साहित्य ओर प्रारंभिक चारण साहित्य अपभ्रंश में हैया उससे प्रभावित हे। अधिकांश हिंदी-विद्वानों का मत है कि इस समय तक अपम्लंश भाषा में रचना प्रधान रूप से चल रही थी ओर हिंदी के आधुनिक प्रादेशिक रूप (ब्रज, अवधी, कन्नोज, सरहिंदी या खड़ी ) विकसित ही नहीं हो पाये थे। परन्तु १५०० ई० के लगभग हमें त्रज ( सूरदास ) और अवधी (जायसी ) में जो श्रौण रचनाएँ मिलती हैं, उनका यह रूप एक-दो शताू्दियों में

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विकसित नहीं हो सकता | ६०० ई० से १४०० ई० (४०० वष ) तक भाषा में परिवर्तेन को प्रक्रिया चलती रही होगी | परंतु अनेक अपश्नंशों में साम्य भी बहुत है और इससे कदाचित्‌ यह कहा जा सकता है कि उत्तर भारत के अपभश्रंश के ये अनेक रूप किसी मूल स्रोत की ओर इंगित करते हैं इस प्रश्न को पहली बार डा० मोहनसिंह ने उठाया है-'“7"9८ +१0700-पवीप एरटएआ4टपरॉ३०8 दााढ्छ6व 707 $79प्रा- 867, 2ब8०१॥, शि/52%ा &प्र00#72॥379 70 3(०870358#07 28000 (6 (प्र. 96४००, | फँटाए ८268 ४28९० 6ए जार परढाए झंधा[ 87... 7+7765प४ गंछ्ाबाणए टपोप्रएनए०्म व्ल्यपेल्ते 076० थी गग्० 004४ 7278 96 60प्ग'ए, 89 708 ८0707 ( ०6) सिफदेजां 87082, 40 ७2३5 3 096-970देप्रटा0 767९ 8]9प- (पाएंबा शिवरएनी 04956 7 ट्थ्याप्र'ए 2, 42, 870 760767 0000४ 770509 0 रिक्षुएपाॉ-(प्रए]&॥7 90- 06008 77वें [08 €27687 [09956 #८5८॥7068 7770५ ६9८ 770 त60 9838 7477, 40 है6त/ ३७०७५ 0ए८7 ६96 ५४0[6 ०७४-४०त9, 9००0. 6+7 ऊफैहाहइ०, एल्यदा। रत बगवतवे 7रशध। पए 0 ४6 #िएाएथा0 3769, 48९7, (736 ए्काए0प8.. एल्याबटप्रौबाड. तैएल5फएढत फिमलक बातें 90609 ७४३8 छापादा 09 पाठ इबा06 छा 900 70 जाणवणां बणवे 79 ४766 एटा) 8९ए८०0 6९ ४८४४४४०ए ०४7४.

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( एणवप ाक्ाबापाट, 9. 7. )' जैनसाहित्य, चारण साहित्य, नाथसाहित्य की भाषा और पुरानी हिंदवी में बहुत कुछ समा- नता है, अत: यह अनुमान सत्य भी हो सकता है।जो हो, माषा और साहित्य दोनों की दृष्टि से यह काल महत्त्वपूर्ण है। अगले युगों के हिंदी साहित्य के इतिहास पर इस यग के संस्क्तु, प्राकृत ओर अपभ्रश काव्य का बड़ा प्रभाव पड़ता है। इसी दृष्टि से भी इस विशाल साहित्य का अध्ययन आवश्यक है। सच तो यह है .कि धर्म और दशन के क्षेत्रों में सिद्ध-सामंतत युग में जितना सोचा गया, तक द्वारा स्थापित किया गया,

१--उत्तर भारत की भाषाँ गुतकाल के लगभग शौरसेनी न्‍ पैशाची और महाराष्ट्री अ्रपश्रंशों से निकली हैं। प्रारंभिक अवस्था में इनमें परस्पर बड़ा साम्य था। देश के प्रमुख भागों में इसी में साहित्यिक रचनाएँ होने के कारण एक सामान्य भाषा ( पुरानी हिंदवी ) का जन्म हुआ सातवीं शताब्दी में राजपूत-गुजर पुनर्जागरण से इस भाषा को विशेष लोकप्रियता प्राप्त हों गई और अनेक राजपूत- गुजर ध्वनियाँ इसमें मिश्रि हो गई'। इस नये रूप में उसके आरंभ के नमूनों ओर आधुनिक राजस्थानी में विशेष अंतर नहीं है। सारे उत्तरी भारत, बंगाल के कुछ भाग, मध्य भारत, कोंकण तक के सारे प्रदेश में इसका प्रचार था। घीरे-घीरे मिनन्‍्न-भिन्‍्न भाषाएँ विकसित हो गई और कुछ दिनो' कविगण प्रादेशिक भाषाओ' और हिंदवी दोनो में रचना करते थे

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लिखा गया, वह सब अभी हमें प्राप्य नहीं है। जो ग्राप्य है उससे पता चलता है कि इस युग के बाद बुद्धिपरक श्रवृत्तियों का हास हो गया और धर्म और दर्शन दोनों क्षेत्रों में अनुभूति की प्रधानता हो गई इसी से इस युग के बाद हिंदी के रहस्यवादी काव्य और भावनाम्रधान भक्ति का समय आता है |

जो हो, साहित्य के अध्ययन से यह बात स्पष्ट है कि हमारे इस सामंती युग ( ७०० ई०--१४०० ई० ) में बुद्धिविलास सर्वोच्च शिखर तक पहुँच गया था इसी से इस युग की रचनाओं में हृदय-तत्त्व की श्रधानता नहीं है। ११६२ ई० में जब दिल्ली पर मुसलमानों का शासन हो गया तो उस समय की मनोदृत्ति तकवाद से हटकर हृदयवाद को आश्रय बनाने लगी। घम में नये प्रकार से प्रवर्तत हुआ जहाँ सिद्धों का अनीश्वरवादी रहस्यवाद चल रहा था, वहां गोरखपंथियों का ईश्वरबादी योगमार्ग आया। बुद्ध के स्थान पर रासम-कृष्ण गये। क्‍यों बुद्धिबाद से हट कर हृदयवाद की ओर हिंदी-प्रदेश की जनता बढ़ रही थी, यह कहना कठिन है, परंतु इसका विदेशी सत्ता की विजय से थोड़ा संबंध अवश्य है। सारा देश वादों? की मरुभूमि से निकल कर रागात्मक भावुकता के विलास-कानन में विश्राम लेने लगा |

साहित्य” शब्द का एक परिमित अथ है। सदियों से रसा- त्मक रचना को साहित्य कहां जाता है परंतु सामंतयुग की कुछ

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रचनाएँ जैसे सिद्धों और नाथां का साहित्य और