हर धर्मों सा चंद एूंत को

अथम बार १९४६

मूल्य डेइ इषपा

राजहत कैच दिल्यी।

सुत्रधार गवोणक्य

अद्गगुप्त राक्षस 'मलयफेतु शार्डूरय भसागुरायण 'चदनवास

धर

पात्र-परिचय

पुरुष प्रधान नट राजनीत्ति का प्रसिद्ध प्रकाड पडित, को विष्णुगुप्त तथा कौटिल्य नाम में मी पुकारा जाता था। पाठलिपुत्र का राजा, नाटक का नायक नद का प्रधान-मन्रो ! पर्वंतक का पुत्र, प्रतिनायक चाणक्य का शिष्य चाणक्य का गुप्तचर राक्षस का कृत्रिम मिश्र

राक्षस का अतरग मित्र दइाफटदास

विराधगुप्त करभक

फॉचुरी * कंचुकी & जीवसिदधि

4

संपेरे के वेश में राक्षस का गुप्तचर पथिक के वेद में राक्षस का गुप्तचर बैह्वीनारि नामक घद्गग॒ुप्त का द्वारपाल जाजलि नामक मलयफेतु का दवारपाल |

बौद्ध-संन्यासी के वेण में चाणक्य का ज्योतिथिद गुप्तचर

पिदेदरक छिडार्षक

डुदब शक जातुरक शुतिडार्षक 77

अतिहारी 7 च्डौ

(जो 57

राक्लघ का सबक प्रथम चाडाल बेपणथारी दटालोहक ताब का चाकतम का दूत राजा कै घधासप्रत कौ सूचना बैसेवाला मलपक़ेसु का सेवक सिड्धार्चक का मित्र देजवेयक राम का दिलौप

चाडाल बेपणारी चाणक्य क्य ब॒ुप्तचर |

ज्रियाँ कशोजात्तरा ताव कौ चतज्भुप्त का हाएपालिका | विजया गसाम के सलयड्रैसु की हारपालिया। खुश्गार की रतजी अदतचाश कौ पतजी

अन्य पृस्प ह्ारपल अंदतशप्त का पृत्र बेतालिकर (पहता दृपपा ) खादि।

सुद्गाराक्षस मादक

नना+ 3-4 ->क>-+-०-

( रगण्याला में मगलाचरण होता है )

पन्‍्या फोन तुम्हारे सिर पर ? एदू-कला, फ्या नाम यही ? परित्ित भी व्यों भूल गई तुम ? है यह इसका नाम सही कहती लगना फो शज्ञी फो,फ्हु दे विजया, नहिं घिव्यास ? घुरसरि फे यों गोपन-इच्छूफ शिय फा धाठय हुरे सब भास ॥श॥ा

पर-त्वच्छदर पात से भावी अयनी-श्रयनति को एरते, सबकाल-लोफ-ध्यापी भुज-युग फो क्षट सिफोड श्रसिनव करते, झनल उगलतो उग्र डालें दृष्टि, जझे ससार फहीं, यों जम रक्षफ छक्षिव का दुघ-यूत नृत्य हरे दुष-साप यही धरा

( नादी के प्रंत्त में सूप्र घार फा प्रवेश )

सृत्रधार--वस, वहुत बढ़ाइए मुझे परिषद्‌ ने भाज्ञा दी कि-- आज सामंत चटेब्वर के पौत्र सौर महाराज पृथु के पुत्र कवि

॥१॥

िप्राद्धतत्त के बताने हुए मुग्ारास भारक वा स्रधिगप कौओंपा डीक है थो सभा काश्य कै युल-दोपों से मल्ली माँति परिषित है उसके प्राषे प्रतितय करते हुए मैरे प्री मत में मह्ात्‌ संतौष प्रत्यश्श होता है।

क्पौडि--

बड़ती स्लेती भूर्ख कौ बोई प्रति सुत्वातत। बार्प-धूग्ष में है भह्टों कारण कबक-क्षाव )।३॥

तो प्ब पे बर था प्रपतौ सहचरो को धुलार बृह-भत है ताथ बाता-बडाना धाएम करता हूँ। (बूनकर प्रौर देख रजपइ इमारा गए है हो घीतर अलूं ( पनितगपूर्कक हौयर लाकर प्रौर देखकर ) ध्रष्टा। तो बहन पजा बात है, भाल हमारे दर यें गहोतसब-ठा दौश पत्ता ई।! चर वाले सध झपते-पअ्रपने काम यें लृश बस्त हो रहे है | देखो--

अल हो रहो बह पीत्तती पह चंरतादिक है प्रहा! है पूंघती बहु बालिकाएँ विधिब दुतुओं को वहां | ऊपर ढडा करके विराती मद लुझल को लद बहा | हुंदए बारंगार करती प्रति स्तरोश्र नत्त हो।३3॥

हो बहचरौ को बुलाकर पूछता हूँ। ( जंपष्य कौ और दृष्टि डालकर )

| बुचधालिती | है बत्त-निलयै ! लोक-पात्रा-साक्कि चर्ादि तौर्तों वर्ष कौ क्षंपारिके | प्राजाबिके [ प्र बनत करो तीपि-विश्ञौकृपियों हुम हो कहाँ! ले हूं बुशाता कार्य से, झा्ें शर्डिति प्रापरो गहँ। ४॥

( ३)

( नटी का प्रवेण )

मटौ--प्रामपुत्र | यह रही में, भाशा देकर प्रार्य मुझे पनुगृहीत फरें

पृषपार--पारयें ! प्राशा देने पी खत सो रहने दो, गह्ो, प्राण किसलिए श्रापने पूजनीय द्राह्मणों को निमंत्रण देकर कुटुच के सोगों पर फपा की दूँ ? प्रधवया घर पर याई याोछित अतिथि आए हू, जिससे कि ये घिद्ििप्ट परवान बन रहे है. ?

सदौ--आाग ' प्राज मेन पूजनीय ब्राह्मणों दा निमन्र दिया है

सूत्रधार--महों किस निमित्त से ?

नदी--सुना हैँ, घद्र-प्रटण होने वाला हैं

सृप्रधार--यह किसने पहा ?

नठा- ऐसा नागरिक लोग पढ़ रहे हू

सुत्रधार--प्रार्ये | मन ज्याति शास्त्र फे चौसठो झगो का भली- साँति प्रध्ययत किया हूं, तो पूजनीय ग्राह्मणों फे लिए. भोजन बनाना भारभ करो , चद्र-ग्रहण के घिप में तो किसी_ तुम्हें घोग्या दिया हैँ देखो---

लघु-मंठल क्षव चद्र फा, घिदय राहु स-फेतु, - प्रसभिभव घल से घाहत्ता, (इस प्रकार भाधी वात फह चुकने पर नेपथ्य में) जा ! यह कोन मेरे रहते हुए चल से चंद्र का भ्मिभव फरना चाहता है ?

६४.) सुजबार-- रशा में दृष हैतु ॥६॥ जदौ--प्रार्य | यह फिर कौत हैं, थो पृस्दी पर रहकर चढा्म को जह के घ्राक्मणल से बचाता चाइता है सुबधार--प्रार्वे | यह टौक है जैंते सी रहीं पहचाता प्रच्छा जे फिर शामधान द्वोइर स्वर को पहत्राहूँगा। ( श्रमु-संडल' इत्वादि फिर पढ़ता है ) (मेपप्ण में) प्रा: | बह कौर पैरे रहते हुए बल से बड़ का परियव करता चाप है सृद्रथार-- (सुनकर) प्क्छ/ श्मर बया | कुडिल-बुप्ड कौोरिक्य बदौ--( प्रात्ी बल सुतकर अय का प्रभितव कएती है ) तृषबारए-- कूटिल-बुद्धि कौटिस्प बहौ बहू कोषानल नें जिसने धरदश गंद-बंध लाम किया क्षण सें। सु चंगधाइज यह प्रप्श बड़ों इसने माला, संर्स-अइ पर घछत्,॒करैणा हल्ला आता भह्षा हो प्राधो इस चलें! (दोहों का प्रस्वाव)

पहला अंक स्थान---चाणक्य की फुटी

(खुली शिखा को हाथ से फटकारते हुए चाणक्य का प्रवेण )

चाणक्य --कहो, यह कौन मेरे रहते हुए चद्रगुप्त का वल से ग्रभिमव करना चाहता है ?

चख कर मतगज-रकत को जो लाल रोग में है रंगी, सध्या-अरुण मानो शशो की हो कला हो जगमगी ! जूमभा-समय मुख खोलने से जो चमकती है महा,

हैं कौन, ऐसी सह वष्ट्रा चाहता रहना यहाँ॥८७ भौर--

नंद-चंद-हित.. काल-सापणी,

ऋोध-बह्लि-चल-घूम्र-वल्लरी, बष्य फौन जग-मण्य श्राज भी,

चाहता मस्त शिखा बंघो ? ॥९॥ झौर सुनो--

नव-यद्या-वन चह्ति जो गहो ' ऋष फो मम ग्रदोप्त लॉँघ के,

(६९)

कौन शुर्ज परिणाम-लंध हो साएइच्कूदक पर्ंब-रौति है. 0१ ॥॥ बार्खूर॒व ! शाफुरव ! ( दिप्य का प्रगेक्ष )

प्िष्य --युरुजी ! घधामा कोबिए चआाजक्य--कक्‍तस ! यै बैठता बाहता हूं।

पिल्म--मुस्णी | इस दाल़ात में बेजासन गिछा हवपा है वो शृरुजी गहाँ बिराज सकते हे।

चानक्‍प--जत्स | कार्य-श्पप्रता हौ पूरे स्याकुज फर रहो कि क्षिप्पौ के प्रति युद-जन जी स्वामामिक कर्ता ( पत्रिभम पूर्णक बैठकर, ल्‍्वदत ) लागरिक लोगो को इस बात का पे फ्ता लगा कि-- सब-मुल के विनाख्य ते कूड़ होकर राखस पिता के अब ते क्‍्राष-अबूला हुए श्रौर सारे सद-रास्ध की प्राप्ति की धाप्ना पै प्रौरताहित हुए पर्बतक के पुत्र मलगकेयु के साथ मिलकर और रक़क़े प्राश्विद सह्वात बगगर्यज कौ सद्वाषया छे डर, च॥गुप्त पर अड़ा आहता ई। (सोचकर) प्रथवा जब मेंब ध्ारे प्रध्तार के रैखतै-इक्षते रद कुल के ताश की प्रतिज्ञा करके पुस्तर प्रतिज्ञा खरिशा को भार कर छिए। प्रो प्रद ते इस बात के प्रषय हो काने पर हरी करा इत थे दबा श्दूंगा बह #ँपे ? जि मैरौ--

(रपु-ब॒ुधरति रिप्ता-मुल-चड़ो को प्रौड़-चूत से रथकूर इ्पान सक्तिजु्ों पर नौति-पदम से बिछ्धरा सोइ-शत्म प्रथिराव छक्ता बुखि6-पुरबात्तौ डे अ-जज विरद्ित तंर-बह्न-ह॑तात बुछता बाह्य विद्वान लम से ऋ्ब-दहि बत-बहि-समाव ॥११॥

( ७) मऔर--

६'कु-दाव्द-पुत दुखित हुए फर निम्न मुख नुप-भीति से, लखते मुझे जो अग्र-श्लासन से पतित हत रीति से, कु ल-सहित सिहासन-पतित थे नव फो देखें तथा, गिरि-छूग से झट खींच फरि फो हरि गिराता हूँ बया १२७

वही में श्रव, प्रतिज्ञा के पूर्ण हो जाने पर भी, चंद्रगुप्त के कारण नीति का प्रयोग कर रहा हूँ देखो, मेने--

हृबय-यासना-सम क्रवनी से नंद धश का नाश फिया, सर में नलिनी-सदृश मौर्य फो स्थिर-लक्ष्मी-प्रावास किया, क्रोध, प्रेम के फल जो दोनों निग्रह शोर प्रनुग्रह-रूप, बाँटा उनको प्ररि-मित्रो में हठ-युत हो निज-निज प्रनुर्पष ॥१३॥

झ्रथवां, विना राक्षस को वश में किए मंत्र नदन्‍-वद्ष का क्या विनाश कर दिया प्रथवा चद्रगुप्त की राजश्नक्ष्मी को क्या भ्रटल बना विया? (सोचकर) भह्दा ! राक्षस नद-फुल का श्रर्त्यत दृढ़ भक्त है! वह निश्चय दही नंद-वंशीय किसी भी व्यक्ति के जीते जी, चद्रगुप्त का मंत्री ,बनाया जा सकता यदि वह उसमे राज्य दिलाने के लिए यत्न फरे, तो वह घंद्रगुप्त फा मत्री बनाया जा सकता है। ठीक यद्दी सोचकर हमने बेचारे नंद वैंद्वीय सर्वार्थसिद्धि को, तपोवन चले जानेपर भी, मार डाला | फिर भी राक्षस मलयकेतु को अपने साथ मिल्लाकर हमारे विनाश के लिए चोएरतर प्रयत्न करता ही रहता हैं; (झाकाश की ओर इस प्रकार टकटकी बाँधकर मानों राक्षस दीख पड रहा हो) वाह | अ्मात्य राक्षस ! मंत्रियों

( ) में बृहस्पति के मात ! बाह ! तुम्त बन्प हो | पर्योंकि--

जग ईंप कौ सेदा करता धबनीहत बड़ रप्तार, ग्रापष में थ्रो खाथ तजते इच्एूक प्न-विस्तार। प्रणु कै लरत पर जौ कर छो बाद प्रथम कषपकार, स्थार्च -जऔैम सब जाए छठाते, वे धुर्लप्त संघाए है४॥

सौलिए तो इम एछुम्हे प्रपपौ प्रोर मिलाने के लिए इतना अपत्त कर रहे है कि किस प्रकार कृपा करड़े अड्रपृष्ठ के कश्रौ-पद को एजौषएर कर श्कौरी क्वोफि--

सौद लूर्क्ष परि लेबक शोबे लक्‍त पहाँ कुछ लाभ हडीं अतुर बराकमपाली लौ क्यों लक्तति-होत ऐै लाभ कहीं! शुद्धि-पराकल-जत्तिरए|हित लो लुछ-दुख में करते कस्माल थे हो सपने लैबक शुष मे प्रस्य शभी है तारि समात १६॥

इसलिए में भौ इस विद में छो बह रहा हूँ। पे पैाशक्ति कघ्को

बह्ष में करते का प्रपत्श कर रहा हूँ) क॑पे देखो, मैने-- दशबुप्त प्रौर पर्बतक इस दोतों में कोई शी मर लाग ढप्प्रे चाचक्म का बुर होगा' यह लौचकर रास से विवछम्पा के ह्वारा हमाए प्रत्पत कपफारी विज देचारा पर्वतेशबर परवा डाला ई--मह शोकापजाद शंहार मे रर्बभ प्रचलित कर दिपा[ छसार को विश्वास बिलाने कै छुए बहा बात प्रकड करते के लिए साषुरायत्र ने तुम्हारै पिता को चायकव ते यार ब्रशाल्ा' इए प्रकार पर्बतक के पुथ मलयकेशु को एकांत में भबमीत करके डइऐ बढाँ पे सजा दिम्ा ई। राशस टी बुद्धि का सह्दाएा छेकर हो पह्रि

( )

मलयकेतु युद्ध के लिए, तलर होता है, तो उसका अवश्य द्वी निन नीति- चातुरीद्वारा निम्नह किया जा सकता दे क्ति उसके मार देने से पबंतक के वध के कारण अपने माये पर लगे फलक के टीके को एम नहीं घो सकते। एक और भी वात है, मेने स्व-पक्त और पर-पक्त दोनों पक्तु के प्रेमियों श्रौर दें पी जनों को जानने फी इच्छा से विविध देशों की भाषा, वेश तथा आचार-्यवद्वार में निपुण भिन्न भिन्न रूप घारी अनेक गुप्तचरों फो नियुक्त कर दिया है, आर वे कुसुमपुर-निवासी नद के मनी आर मित्रों की गति-विधि एवं उनके का्य-व्यापारों को बढ़ी यूद्टम दृष्टि से देखने मालते रहते हैं। मेने, चंद्रगुत के अमभ्युदुय के सगी भद्रभट आदि विशिष्ट व्यक्तियों को, वह वह कारण उत्पन्न करके--जिससे कि मलयकेतु उनसे प्रसन्न द्वो जाय, उन-उन पदों पर अ्धिष्ठटित कर दिया है। और शन॒द्वारा नियुक्त विप देने वाले पुरुषों के कार्य फो विफल करने के लिए मेने राजा के समीपवर्ती ऐसे विश्वम्त पुरुष नियुक्त किये हैं, जो सदा सावधान एवं जागरूक रहने वाले हैं तथा जिनकी स्वामि भक्ति की परख हो चुकी है। इसके अतिरिक्त विप्णुशर्मा नाम फा एक ब्राक्षण है, जो भेरा सदपाठी और मित्र है | वह शुक्र की टड नीति और प्योत्ति शात्र फे चौसटों अगों या प्रकाड पद्टित है नद-चघ की प्रतिशा करने के अनतर ही मैंने उसे बौद्ध सयासी के वेश में कुसुमपुर भेजकर उसकी नद के मत्रियों के साथ मित्रता करा दी है। उसके द्वारा एमारे बड़े-बड़े काम सिद्ध दंगे | तो इस प्रकार मेरी ओर से कोई कमी नहीं होगी। सद्गगुत्त ही स्वय मेरे ऊपर सपूर्ण राज्य या कार्य भार डालकर उठासीन

(९१ )

राइदा है] ऋषणा था राज्य राजकीय इत्वोसंत्रपी अ्ध्तभारण पुन्खों हे राष्तित दाद है वही श॒त्न पँचाता है। क्योफि--

समुद्र ऋूप कर हू मोगर्त, स्वाभाविक घछ्तत्रान |

पादे बे सी मज सुप्रति, प्राय दस्स महान॥श्क्षा

( गम-पद हाथ में हिगर भुतचर का पेश )

एपसचबर--

अम्य सुरों से कार्य का पमर के करो प्रसाम

अम्प-मक्तलन का यही, इरता जीब पक्षाम ॥१था

और

मिव॒य बम की सक्ति स॒ पाता नर निम प्राण।

मारे क्लो जम झोक को देता जीबम आन आहत

दा इत पर में लाकर बम्पर दिछकर याठा हैँ

शिप्प--( देखकर ) मर | मीठर ऋाना |

गुप्तचर--ऐ आए ] गए पर कितऋ है !

शिष्य- मारे गुर झा्ग छाबकर क्र बिनके नामोऋरण पते पुस्त्र इटा है।

शुप्शच्चर--( हैंसकर ) यश अपने ही गुरूमाई कर घर है इसलिए म॒के मौठर झआाने दो | मैं दुसारे गुर को बर्म का उपदेश दूँगा

शिष्प--( क्ोेषयूबंक ) छ्लि मूर्ख | क्या कम श्मारे गुरजो पै मी अधिक धमें गिए दो !

शुप्तचर--रै आाह्वदा | क्ाष म॒ करो ! बह सिश्चित है कि-- सत्र

( ११ )

सत्र कुछ नहीं जानते , तो कुछ ठग्दारे गुद जानते हैं, कुछ हम-सरीखे मी जानते

श्षिप्प--( क्रोघपूर्वक ) मूर्ख! गुरुजी को सर्वशता को छिपाना चाहते हो गुप्तचर--ऐस ब्राह्मण यदि तुम्दारे गुद सब कुछ जानते हूँ, तो बताएँ तो सही कि--- चद्र किसे प्रिय नहीं है? शिप्य--मू्ल | यह जानने से गुदुजो का कौनसा प्रयोजन सिद्ध होगा गुप्तचर--ऐ, व्रात्मण | ठुम्दारे गुरुजी ही जान लेंगे, जो कुछ इसके लानने से होगा तुम सीघे-सादे हो, केवल इतना ही जानते हो कि-- कमल चढ्र को नहीं चाइते | देखो, * ]सुदर भी कमलों का होता... शीत रूप-अतिकूल ४४४ पूर्ण-विंव भी रम्य चद्र के जो अहो | अनुकूल ॥१घ॥ चाणक्य-- सुनकर ल्वगत ) अदहो। “मे चद्रगुप्त के विरोधी युरुषों को जानता हैँ ? यह इसने फड्टा दे शिग्य--मृर्ख | क्या यह वे सिर पेर की वात उड़ा रहे हो? शुप्तचर--ओ दी ब्राह्मण यह सुसगत होजाय'” ** शिषप्य---यदि क्‍या हो जाय १९ शुप्तचर:--यदि मुझे सुनने और जानने बाला मनुष्य मिल जाग ]

(श्र )

आश्क्ष्य-(बेककर ) मद पुरुष | नि्भित होकर मीठर चशे झाशो, सनने और जानने बाशा तुम्दें मिस चाएगा।

गुप्तचए--मैं ह्रभौ मौतर झाया मौतर था मीप पहुँचकर ) अग हो जग हो आज को

आरएक्‍्भ-( देखकर स्कपत बशों) | कार्यों के बहुत ह्रषिक दोें के करण गह पता महीं जलता कि--मिपुक्षक करे क्श् बानने के लिए नियुक्त किया भा | (प्रप्ट ) मदर पुरुष | तुस्तारा स्थय्त हो | बैठो

गुण्तचर--चो झाये कौ आशा ( भूमि पर बेड छाता है )

चाणक्प--म्छ पुरुष | दिस काम के लिए हम पए ये उत्तके क्पिय में कहो | क्या प्रथ्य 'संद्रगुम को चाहती है !

भुप्तचर--ओ शो; पश्रार्य ते फणे ही किराग-कर्ों को पूर कर. दिव्ा है; इपशिए सुएएीकनामजेप देव अं्रगुत में खरी प्रया प्रमुण् है। किंठु फ़िर भी इत नयर में ठीन युरुप दैसे हैं, जो झ्रमात्य राहुल के पूर्ष-सनेशी और उत्तका झाइए-सम्मान करते हैं और नो अमान इ्ति देव चंद्रगुस की वृद्धि को रइन नहीं करते

अखक्प--( जोज पूरक ) झदी | बद कमा अह्िए कि श्फो छीबन क्रो मी रुरन करते | सता डनका माम जानते हा !

शुप्तचर-जबिना नाम जमे क्‍यों मैं झाबे क्ये उसकी तचना बेता

चायाक्ष्ब-तो मैं तना चाहता हैं।

गुप्तचर--झने आगे | फछे झाये के रिपु इल भा पदज्ठां अफ्थक है

( १३ )

(चाएक्य--६ ध्पेपूर्वक स्वगत ) हमारे रिपुद्ल का पत्तपाती

कुपणक १( प्रकट ) क्‍या नाम हे उसका ,

गुप्तवर--उसका नाम छीवर्सिद्ध है।

घाणक्य--क्षपणक मारे रिपु-टल का पक्षुपाती है, यह आपने कँसे जाना !

गुप्तचर--क्योंकि उसने अमात्य राक्षुस द्वारा नियुक्त विष-कन्या का देव परवेतेश्वर पर प्रयोग किया

घएणुक््य--( स्वगत ) यह तो हमारा गुप्तचर न्ीवसिद्धि है। ( प्रकट ) भद्ग पुरुष | श्रच्छा, दूसरा कौन है /

गुप्तचर--आ्रार्य दुसरा अ्रमात्य राक्षस का प्रिय मित्र शकटदास नाम का पायस्थ है।

चाणक्य--( हँसकर खगत ) 'कायस्थ! यह तुच्छु वस्तु है| फिर भी तुच्छ भी शत्रु की अ्वद्देलना नहीं कग्नी चचाहिये। ठसके लिये मैंने सिद्धाथक फी उसका मित्र बनाकर रख छोड़ा है| ( प्रकट ) भद्र पुरुष | तीसरे को भी सुनना चाहता हूँ।

गुप्तचर--तीसरा भी, अमात्य राक्षस का मानों दूसरा हृदय, कुसुमपुरुनिवासी वट जीहरी सेट चंदनदास है, जिसके घर में अपने कुठु को घरोहर के रूप में छोड़कर अमात्य राक्षस नगर से चला गया है

चाणक्य--( ख़गत ) अवश्य बड़ा भारी मित्र है। क्योंकि राक्षस ऐसे पुरुषों के पाल कभी भी निज परियार को घरोदर के रुप में

( ह४ )

महों एल सकता डिम्दें बए झारमसुह्द रे ममता शो (मार ) मर जुरुष ! बर नुमने केसे छामा कि--च”नट्ात के थर में पहल मै निज अरिष्वए को बरोइर हे रुप में रत छाड़ा है

शुतपर--झआर पर हंगुलिसरा आप को व्यरी शत बचा देपी।

( अंगुक्सिद्रा देख है )

चाएग्प-( गदर ड्रौ श्रार दे टोे हब में तैषर और पंणब का जाम दबढ़र एप प्‌रद खा ) झगी | गठन ही एमारे दाषरसे हो मरा ! (757 ) मदर | अ्रंगुतिसुदा हु कम प्रिन्री, हैं किशार पूरे शुनमा पएठा हैं

शुतपर--रुते भ्राव | झा ते शुक् मायरिक बजों के बारे सथामरों है शातन है दे निपुद्ध किषा पा रिए दूकोों के घरों के मप्र आये मे दितमे उरहे लड़ मी झाईंबा मे हैं। शश बमबह हा पृमण हा है एक दिग शोएरी मेट्र चुदनदशत्त घर में कणा गद्य ! बएँ पैसे कस बट दिाका गएना झारंप दिर्त

अतगरप+रआा ता?

सुतबा-रत धत्त रजस बस के बधणय दइशौचश़ों काल सन प्र बा वा एक मुहर अुएल ब्लड एच बारे के एंत मे बताए जिष गे छहय हब एसी कारे थे धीच पाप | कार पविभत गज, हज गषपर विद दृष्य' रस अब सिर मे शराब! वतप्र दो छा ने काश बा मारी करापएल पक 777१ | 7 एप की मे हर है हर

( १५ ),

लग मुख निकालकर और बाहर निकलते हुए उस बच्चे को घुड़ककर, उसे अपनी फोमल बाहुओं से पकड़ लिया और बालक को पकड़ने की हवढ़-तबड़ में अगरुलि के मठके जाने से उसके द्वाय से पुरुष की अग्रुली के नाप से बनी हुई यह अगुलि-मुद्रा देइली-द्वार पर गिर पढ़ी | उस स्त्री को इस बात का पता ही नहीं लगा, श्रौर वद्द अ्रगुलि-मुद्रा मेरे पर के पास आकर प्रणाम नम्ना नव वधू के समान निश्चल हो गई। मैंने भी, क्योंकि अमात्य राक्षुस का नाम इस पर खुदा हुआ है, इसलिये आये के चरणों में पहुँचा दी है। तो यद्द मुद्रा इस प्रकार प्रात हुई है

चाणुकक्‍्य--भद्र पुरुष मेने सुन लिया जाओ, तुम्हें शीघ्र ही एस परिश्रम के अनुरूप फल मिलेगा |

गुसचर--जो आये की आशा

( प्रस्थान ) चाणक्य--शाह्ल रब | शाड़ गव ! ( शिष्य का प्रवेश )

शिय--ुरजी | आजा कीजिये

चाणुक्य--वत्स दवात-कलम और कागन ले आशो।

शिष्य--जो गुरुजी की आशा |! ( बादर लाकर और फिर भीतर आकर ) गुरुजी थे रहे टवात-कलम और कागज |

* चाणक्य--( हाथ मे लेकर, खगत ) इसमें क्‍या लिम्ें अवश्य ही इस लेस-द्वारा राक्षस को जीतना है | ( प्रतिद्यारी का प्रवेश )

(९९३)

प्रधिहवरी-७प दो बद शे झार को।

चाणफक्‍प--( इपपूरंक र्ूयत ) इस बग-्यनि क्रो स्वीकार बरता हैं। ( प्रकट ) शोक्षांचरा ! तुम क्‍यों ग्राई दा!

प्रतिह्वारी-झारज | कमल मुकुझ के रुमाम प्रं्शाशि सै महक को अर्शश्त करके देव बशगुप्त मे आज को गए तलंगेश दिपा है कि--है बहि पार ग्राज्ा करें, दो देव पस्टेशवर कये भाड-किषया किया चाहता हूँ! हर पैं उनके परने हुए मपश गुशकद्यम ब्राप्सों को तमपिेत कर रहा ह्।

चआुक्म-( इपपूजक श्वमत ) बाए [ चंद्रगुत | थाई | मेरे हो मन के रष मंत्रक्मा करके हुमने गए शरेश दिश्र है! ( प्रदा ) शाशीत्तण | मेरी ऋार से कत्रगुश से कश देना फ्रि--- बाई बेय ! बाह | ठुमर छोक-व्पवद्ार बे मली स्टीति बारते हों- तो अपने मन के बच कर डाहो।! परंतु पर्भतेररर के पएने हुए. बहुमशन झशकार गुरगन आशशों को ही स्मा्पेत करने बाये ! इसलिये ऐसे हाछ्रं को मै स्वर्ग गुण -परौदा के बाइ मैजूसा |

प्रतिद्वारी--जो धााय॑ ध्यै ग्राशा

( प्रख्तान )

आदवग--तताह रप | शाह रण | गिरकवतु ऋाशि तौनों साइगों हे मंरी श्रोर ले कर दो कि-झ्राष शोग अगुरु के वात थाँग और भफ्ण दाम केकर सुझठे मिस

शिच्प-- नो गुशदी भरे श्राश |

( प्रखान )

एप)

बायक्‍्प-- झ्मत ) श्र ! पैने लोत लिग्य महगदेत ! ( शेर ह्वाप में लिपे हुए ठिडधार्पक का भवेश )

सिद्धायंक--डग हो लय शो झार्य कै आ५ | पह बह शकर डाल कर अपने दाथ का शिक्य हुआ सेल है

अशक्ब--( शेकर देखकर ) झशे ! से स॒ुशर श्रछर हैं) (ह%र) मद्र पुरुष | इल पर गद मोइर रूगा दो

सिदार्थक--डो झागे कै श्याक्षा | ( मांइर श्गाकर ) झ्ार् | इत ५तर पर मोर रग गो है| झआादे प्रफ्हा करें और क्या किया व्यण |

अा्क्य--मह पुरुष ! मैं एम्दें किटौ रफ्ते करने मोन्च कर्ष में नियुक्त किश्प 'चाइता हूँ

सिद्धाबेक--( दपूर्बक ) श्रार्य | अम॒ुपद्दौस हूँ। दो झाये आशा करें--आग का 'पन-छ काम इस ऐक्क को वरना होस्य !

चाणक्प--भदर पुरुष ! पश्शे हुम ब्य-शाक्या में जाकर गातकों को छोक्ष्पूषक दाहिनी झ्राँल को एब्समे व्य सतत समभत देना। उत्के बाद खत थे तकेत को धमम्झकर मय के बशाने इधर ठबर मास लाए, तब ठुम शकट्दात के बधष्य-शाक्षा से इयकर राष्रछ के शम्ट्रोप पहुँचा देना ; मित्र की प्राएरदा के धअरयण प्रस्क्त दोकर बइ तुमे परितेषषिक देगा बुछ्ु मद तक श्र कौ ही छेद्य में शना। तब जबकि शजु कोम निषय लैपई में झा जाएँ, तब हम झपना गद प्रयोडन शिंड करना।

(कान में कद है )

( (१६ )

सिद्धार्थड--जो आये को श्राशा | चाणक्य--शाह्ष रव | शाह रब | ( शिष्य का प्रवेश ) शिप्य--मु8्जी | झ्राशा कीजिए | चाणक्य--फालपाशिक श्रौर “ंडपाशिक से मेरी शोर से यद्द क्ट्दो फि--चद्रगुप्त की आगा है कि जो वह जोपसिद्धि नाम का जेनः्साथु है; टसने, राक्षस फी आ्राजा से विप-कन्या का प्रयोग करके, पर्वतेश्वर को मार

डाला, उसके इसी अपराध को प्रसिद्ध फरफे उसे अ्नादरपूर्वफ नगर से निकाल दे ?

शिष्य--जो 'प्राज्ञा

( चलने लगता है) ध्याणक्य---वत्स | ठदरो, ठह्टरो, उससे यह मी कहना कि--'जो बढ दूसरा शकय्ठास नाम का कायस्थ है; वह राक्षस की आजानुसार हमारे शरीर-विनाश के लिए नित्य यक्ष करता रइता है, उसको भी यह अपराध प्रसिद्ध करके शुली पर चढ़ा दो ओर उसके परिवार फो कारागार में पहुँचा टो |!

शिप्य--जो आज्ञा ( प्रस्थान )

चाणक्य--( चिता का अभिनय करता हुआ खगत ) क्‍या दुरात्मा राक्षस भी पकड़ा जा सकता है

१4

(९ )

सिद्धाबेक--आपे | मैने भश्ण कर शिया | + चआस्क्य-< इपंपूनंक समयव ) झह्टा | राइत को फकक़ सिया | ( प्रकर ) मद पुरुष | किसे प्रहरू कर शिग्य सिद्धांक-ैने आगे व्म संदेश प्रहश कर शिगा है; तो मैं अर्य शिद्ध करते के लिए जरर्केया आायुक्‍्प-( प्रंगुकि-धुदा के रूप पत्र देकर ) भह्र | सिद्धार्यक ! डाझो, ध्दारा कम लपल हो !

सिद्धाभेष--ओ पश्राये कौ झ्राश! ( प्रयाम करके प्रत्मान )

(शिप्प कम प्रवेश ) शिप्प--गुरुओ | गाशपाशिक और इंशप्रशिक दोजों मे गुरुणौ का बह संदेश मेदा दे कि" माद्राज अंब्गुत की झाझ् व्य एम प्रमी पाहन कर रहे हैं। आस्पफ्अ-:शढा झप्धा है! कत | हैं झ्रष सेठ बइनदात बीटरी मरे मिश्सा चातता है। रिप्णच “| गुएशी डी भ्राडा। ( शाएर जत्य है चदरदास के खब पुन प्रवेश ) रिप्य--इपर को श्चर को सैठश ! अंदसदास-( स्यत ) सिदय इस चासक्य की सुनस्र छर पुझर। दाप रहित मी सज विगत दोपी श्र अपार ॥२०

( २१ )

इसीसे मैने घनसेन प्रादि तीनों ध्यापारियों से फद दिया है कि-- 'दु्ट चाणक्य फटाचित्‌ मेरे घर की तलाशी ले ले, इसलिए खामी अ्रमात्य राक्षस के परिवार फो सावधान होकर अन्य स्थान पर पहुँचा दो, मेरा छो शेता है, वह होने दो ।'

शिप्य--श्रजी सेठनी | इधर को, इधर फो |

पदनदास--यद्द में आगया हैँ।

( दोनों घूमते हैं )

शिप्य--गुरुजी | ये सेठ चदनदास है

चदसकास--( पास श्राक्र ) जय द्वो, जय दो आर्य की |

पाणक्य--( अभिनयपूर्वक देखकर ) सेठजी स्वागत दो | यह आसन प्रहण कीजिए |

चदनदास--( प्रणाम करके ) क्‍या श्ाये नहीं जानते कि-- अनुचित सत्कार तिरस्कार से भी अ्रधिक दु'खदयी शेता है इसलिए, यहीं अपने योग्य स्थान पर में बेठे जाता हैँ।

चाणुक्य--नहीं, सेठनी आप ऐसा कह्दिये, हम जेंसों के साथ आपका यह व्यवद्दार उचित ही है | इसलिए, श्राप आसन पर ही वेठिए |

चदनदास--( स्व॒गत ) जान पड़ता है, इसे किसी मात का पता लग गया है | ( प्रकट ) जो आये की श्ाशा।

( बैठ जाता है )

चाणुक्य--सेठ चदनदासजी | क्या आप लोगों का व्यवसाय भली भाँति चल रहा है ?

( श्१३ )

बंदमरास--( खमत ) झति झ्ाइर शंकनौय होता है। (प५२) काने | थी हाँ ला की दशा से मेरा मुक्त ब्यप्र निर्विप्परप से चर णयादै।

आदक्‍्प--कया चंद्रयुस के दॉर्पा कय देख प्रश्य प्राचौन एजाशों कै गुयों का कमी परद करत है!

अंदनदास--( कानों पर शव रलकर ) शिव | शिव | शरद निशा में रुइष हुए पूर्दिमा के के समान संदगुस कौ वृद्धि से प्रधा अधिक प़्सभ्न होठी है।

चाश्क्ज--सेठद | भदि गए तईँ है ठो एजा होम भी प्रतत्न हुई प्रभा से कुछ मलाई की झाशा रखते हैं

अंदृलबास--आय॑ झ्राझय करें; झाद॑ कितस्प घन इस सेवक से आएऐ है !

अपुक्य---सेठजी | बह चंदगु का राज्य है मंइ का राज्य गहीं क्तरोक़ि ग्र्जश्ोकुप नए का दी ऋपेश्चाम मत कए तकता था लकि | चपग॒य छाप क्षोमों के हुआ पे संदश एता है

अदनवास--( इपपूर्णक 2 आर्य की की कुछ है।

चगणक््म--सेट्यी | बइ ठुल केसे उत्पन्न होता है गह तो आपको नहीं पूछना |

अंदनदास--आर्ज ! श्राश्य करें

आअस्क्प--तारी बात कह है कि राा के गिस्ड ध्क्‍दार नहीं करना आशिए !

_ २३ )

अदसदास--आरय | ,कौन भाग्य हदीन ऐसा है; जिसको आर्य विरोधी समभते हैं ?

चाणक्य--पहले तो आप दी डे

चदनदास--( दोनों कान ठढककर ) शिव | शिव | शिव भला तिनकों श्रौर ग्राग का कैसा विरोध

चाणक्य--विरोध ऐसा है कि तुमने श्रव भी राज विरोधी श्रमात्य राक्षस के परिवार फो अपने घर में रख छोड़ा है !

चदनदास--आरय ! यह भूठ है, फिसी नीच पुरुष ने आये से ऐसा कह्दा है|

चाणुक्य--सेठजी | घवराओ मत , पूर्ववती' राजाओं के अनुचर नगर-वासियो के घरों में उनके ब्रिना चाहे भी अपने परिवार को घरोहर के रुप मे छोड़कर श्रन्य देश को चले जाते हैं, इसलिए, उनका छिपाना ही दोष उत्पन्न काता है

चदनदास--आये यह ठीक है, पहिले मेरे घर अ्रमात्य राक्षस का परिवार था।

धचाणक्य--पहिले “मूठ है! ओर अब “था? ये दोनों वाक्य परस्पर विरोधी दे

घदनदास--इतना ही मुझ से वाक्छुल दो गया |

चाणक्य--सेठनी | चद्रशुप्त के राज्य में छुल कपट को अवकाश नहीं, इसलिये आप राक्षुस के परिवार को सौंप दें, बनिससे श्राप पर से छुल खेलने का कलक मिट जाय |

( श४ )

अंदनदासं-आार्य ! मैं कर तो रत हूँ कि- उस छूमभ मेरे गर दे अ्रमाम्म रात का परिषार थय।

आअफकथय--तो झ्ष का यवा

अद्मदास--फ्ता बह कटों फ्श्य।

आउंक्य--( मुस्कपकर ) सेठश [ रषश हुर्न्ई फ्ता नहीं कि संप छो ठिर फ़ है और बूटौ फ्टाड़ फर ! और भुनो, बिल प्रअरर राशकव मे नंद को ( इतना कई कर झह्श्य का क्‍्ममिनप कप्ल है ) !

अंदरद्ास--( स्कयव )

मम में घन-पोर-गर्मना, बिता दूर बिनाराकाक्त देः

शिम-पंत दिम्प भ्ोपपी सिर पे सर्प बिराजमाम है।॥रशा

आअयपक्प- “ऐेसे है भ्रमास्प राजत चंद्रणुस को तह कर रेगा* बह रुमभ्रे | देखो--

शुरबीर नव निपुय सुमत्री बक्रनास झादिक अचरू-

मिस लुप-कऋष्मी को सके कर नवों के रहते अ्षिचरतत,

भष मिरचक्ष शोने पर इसने भर ति-समाम छग-अस्दाएक

चद्-सटश सूप चंग्रगुप्त से चाद करता कौन प्रपक्‌ ४२३॥ क्रौर मौ--

( चक्कर दिरद के रक्त के शस्थार फ्रि पऋष्म है )

अबमबास-( स्कमठ ) तडशठा मिशते ऐे भ्राझरछ्तावा (सके चष्दी है।

( नेपप्स में फरेलाइल दोता है )

( २५ )

घाणक्य--शा्् रब | पता तो लो, यह क्‍या बात है शिप्य--जो गुरुजी फी आजा

( बाहर जाकर शिप्य का पुन प्रवेश )

शिप्य--शुझजी | मद्दाराज चद्रणुप्त की आशा से यह राज-विरोधी जीवसिद्धि नाम फा जैन-साधु अपमानप्र्वक् नगर से बाहर निकाला जारहा है। 7"

चाणुक्य--जेन-साधु अध्ृह श्रथवा भोगे राण द्रोह पा फल | देखो सेठ चदनदासा राजविरोधियों को यह्द राजा ऐसा कठोर दड देता है | इसलिये मित्र के दितकर वचन यो मानो, राक्षस फा परिवार अर्पण कर दो और चिरकाल तक राजा फो कृपा के भाजन बनो

चधदनदास--मेरे घर में श्रमात्य राक्षस का कुठठम्ब नहीं है | ( नेपध्य में फिर फोलाइल द्वाता है )

धाणुक्य--शाजह्ल रच | पता तो ला, यद्द फिर क्‍या बात है शिप्य--जो गुरुजी की की आशा ( बाहर जाकर शिप्य का पुन प्रवेश )

शिषप्य--शुख्जी | राजा की आजा से इस राज-द्रोही शकटथटास कायस्थ फो शूल्ी पर चढ़ाने के लिए ले जा रहे हैं

चाणुक्य--अपने कर्म का फल भोगे देखो, सेठनी | यह राजा राज विरोधियों को ऐसा कठोर दड देता है | यह आपके राक्षस के कुटठुम्ध को छिपाने फो भी सहन करेगा, इसलिये पर-कुटुम्ब को सौंप कर अपने कुठम्ब और प्रायों की रचा करो।

(२६ )

अबनरास-भार ! क्श्य मुझे मग दिखते शे ! घर में दामे पर भीम झम्मात्प राघ्त के परिकार को नहीं दूँगा शेने फ़ ठो ऋना ही क्‍या?

चाशस्प--संइनदाठ | गह ठु्याय निमग है !

अंशमदापस--थी हाँ गह मेरा दृह निभग है

चारपक्क्--( स्वगठ ) बाइ | चदनदाठ | बाह [7

अधेख्ताम पधपि सुखभ, पर-अपैणदइठ पोर

छ्रोत करे पह रिकिविना कक्षि में कमे कठोर प्रशा

( प्रकर ) घप॑ंइतरास ! कण ठु्दाय गए मिश्ग है [

बदमतास--थी हॉ।

अपखक्‍्म-( क्ोषपूनक ) गुयात्मा द॒ह बच्षिष्‌ू ! ऐो राज-कप ब्य पश् मोग |

अंश्नवास--(€ दोना माँ हैं एच्यर कर ) मैं दगार हूँ आप अपने अधिकार के ख़त॒नूस ढेसा चाहें कर

आप्पक्प--( क्रेषपूर्वक ) शाह रण ! मेरी क्रोर से '्पक्षपारिक झौर इछपाशिक से कई दो कि--इत दुइ बश्िक्‌ को शीम 'प्रेंली पर झटका दें / अबधा रे दो | इगंसक्ष और विजयराल से करो कि-इसरै पर की सत्र असली चौयें लेकर इसे पुल ्रौठयेत बॉघकर रक्‍्ले शत्र तक कि पैं अग्रगुप्त से क५ूँ गहो श्तको प्राणईड की झारा देगा।

शिष्य--ओ धुरुढो झाड्य | सेठओ ! इशर को, इधर को

अदइनदास-( डठकर ) प्राय | यह मैं झा रहा हैँ। ( खगत )

( २७ )

साभाग्य से, मित्र के कारण मेरे प्राण जाते है, वि अपने अपराध के कारण ( घूमकर शथिष्य के साथ प्रस्थान ) चाणक्य--(हरपेपूवंक ) महो ' अब हमने राक्षस का पा लिया ! क्योकि-- यह ज्यों उसको विपद में, तजता अश्रप्रिय प्राण निएचय इसकी विपद में, करे वह निज ऋण 0२५७ ( नेपथ्य में कोलाहल होता है ) चाणक्य--शाज रव | ( शिष्य का प्रवेश ) शिष्य--गुरुजी आज्ञा कीजिए चाणय्य--देखो, यह क्‍या हैं ? शिप्पय--- (वाहर जाकर, सोचकर श्रौर आदचर्यान्वित हो फिर आकर ) गुरुजी ! शकटदास को फाँसी पर लट्काया ही चाहते थे कि सिद्धाथक उसे यब्य-भूमि से लेकर भाग गया। भ्लाणफ्य-- (स्वगत) बाह ! सिद्धार्थक ! ब्ाह' तुमने कार्य भारभ कर दिया ! (प्रकट) क्या जबरदस्ती लेकर माग गया ? (क्रोघपूवक) वत्स ! भागुरायण से कहो कि--शीघ्र हो उस जाकर खूब साधे | (वाह जाकर द्विष्य का पुन प्रवेद्य) छिप्य-- (6 खपूर्वेक) गुरुजी ! श्रह्य ! बडा बुरा हुआ - मागुरायण भी भाग गया। वाणक्य-- (स्वगत) जाओ, श्रपना काम पूरा करो। (क्रोप-सा प्रकट करके, प्रकट ) वत्स ' दुखी मत होओ, भेरी ओर से भद्रमट,

( श८ )

पृस्द कत्त हिष्रात बहबुप्त राजसेत रोहितास सौर गिजयबर्मा पे कोप् जाकर कड्ो कि--पु रात्मा हागुराबप को पकडे। पिप्प--औौ बुरबी कौ पका (बाहए लाकर किध्य का पु" प्रतेच्य) दिल्प-- (ु छपूर्षक) गुदणी ! अहो | बडे गुल को बात ! शारी प्रजा में है हलचल सच पई ! थे बव्रजट प्रादि भी पहछे ही भरधेरै-धंबेरे भाष बए | चाचक््य--(श्वगत) तब कय माँ सशशमय हो ! ( ब्रकट ) डत्स | बुद्धी मत होभों दैखो-- थो चाषे कुछ सौच पूर्व लग से थे तो चये पूर्ण हो, लाणे की प्रथ छत लें हृगप भें दे को पढाँ है प्रणी हैताएँ दस-हीव एक खिलते थोकार्ज कौ साथिका, बरोस्मूलन में लका बल खहो | भैथा स्थाने सु्े ।।३६॥। [उठकर प्राकाथ कौ प्रौर इस जकरर टक्टकौ धाजकर सातों लद्म अस्सु शजुक्ष रौप पशतौ हो ) में दृरात्मा बड़ मठ भाि थो शमी पकशता हूँ (सदगत) दुएए रासल ! पव कड़ाँ जाएदा ? मद ये बीए ही. अक्छद प्रकेले अरने बल्ले बढ़ा हुएा है जिलका शाभ बढ़े हुए बल #|॥ से करते बज -तत्ञ बरधोप बहात, डूपल-हैएु तिल लति से करके, रूचमुत्र कपते प्रा शपीत दब्प-लतपज-तुस्ण कक्ेंगा तुसको |प्रथ थे कार्य-्ोच ॥२७॥ (प्रस्थान)

दसरा अंक ट' खक्त स्थान--राजपथ

( संपेरे का प्रवेश ) सेपेरा--

]नत्र-्युदित लो जानते, सम्यक्ू मडल-नान,

प्रहिनुप-सेवक्क थे, जिन्हें भमन्न-तुरक्ा-घ्यान

( भ्रातात्म को ओर देखकर ) श्रार्य | क्या कहते होम कोन हो ?* में जोमबिप नाम का सेपेय हूं (फिर आकाश हो और देख कर) क्या कहते हो--में नो साध के खाप खेलना चाहता हैं २” कच्छा बह तो दताइए श्राप स्थान बढ ऊरते हैं ? ( फिर बाकास की श्रोर देख कर ) दया यह कहते हो--नें राखकुल-सेबक हूँ *' तो आप दो साँप के साथ खे द्धते द्वी हैं ( फिर आकाश री ओर देखकर ) क्या कहते हो-..- किसे सत्र दया औपचि से मर्न्धित सदारी, प्रदुश्न-रहित सद-मत्त हाथी का महावत और अधिवसन पस्शत ध्रमिनान सर चुर हुणा नाज-भैदक ये दीनों प्रवध्य हो नप्द ही जाते हे क्यों ! यह देखते ही देखते झाँचों से ओकल हो गया ! ( किर झ्राकाश वी ओज देखकर ) शाप | तुम फिर बया कहसे डो---शन पिठारियों में क्‍या हे २? आय ' इनमें सप हर, झिनके द्वारा से अपनो आनीदिज्या चलाता हूं ! ( फिर आकराध्त की ओर

(६३)

दैएकर ) क्या बहने हे--दिलता भादह्गा हूँ? हरपा करें, हपा कर धाम ! क्योकि मइ स्थान टी सदी दे यदि धात्र प्रथिद्र उल्पुत् है तो प्राइए ४8 स्‍्वाव पर हिलाऊँता। ( किर प्रावाप्त थी प्रोर देखरर ) कया कहते हो--'यह भरमात्य राफ्ता का घर है गहाँ मे रे जा बजा | प्रच्झा ता जाएं धाजें। जौविक़ा के प्रात ने भे तो यहाँ ला सकता हूँ। क्यो | यहू भी चला रया | ( चारों छोर देखकर स्वयत ) धोहो ! बरे प्राश्वप की बात है | जब में चायरप गौ बुद्धि से परिर्शशिए_ चडपुरत को देखता हूं तब मुझे राप्८ का प्रक्‍त्व निष्फ्रस ही प्रतीत होता है, प्रोर लब मै राप्तत की शुद्धि से परिरक्षित मत्तमफरेयु को धोर दृष्ि बौड़ाता हुं 64 मेरे क्र में ऐसा भाव दोता मरे कि चंद्रगुप्त का रागश्स प्रथ पदा | इंखो

क्ौधिन-मति-रक्‍्जू ते लक्जरी है जिसको प्राइति अंचल

प्राज प्रावता लौर्-अध्त को लक्ष्मी को मे प्रहो | अचल

किए जी छस राशत कं हारा विचजित-ती मे ब्रा रहा,

जउपाय-कूब करो से उम्रकौ दिधगौ-डी से मात्र रहा।

शो इस प्रकार इत दातौ धुतीतिशालशौ सजियों कै बिरोप से गद कृत की राज लध्मी समअ मे पड़ी हे क्योकि

सुड्ध बचाते ब्य-बशों के स्रध्य गड़ौ इवितौ जैते

जह्मिवित ले रप्तब-मुत हो भम-कपित होलौ, पेरो

रजिब-प्‌ कस के शध्य पश्ित पह शक्मी शंपझक-ब्रत्त हुई,

इधर रथ हूँ प्राती बातौ पाठौ छति दुख भ्रस्त हुईं ३॥।

( ३१ )

तो श्रव मे अमात्य राक्षस से मिलूँ। ( घमकर खदश हां जाता है ) (अपने घर में आसन पर वबेठे हुए चिता में डूबे हुए राक्षस का सेवक के साथ प्रवेश) राक्षम--( ऊपर की ओर देखकर आँखों में श्रॉसू भरकर ) ग्रोह | बढे दुख फी वात है ! -- (नीति-पराक्रम-गुण जिसन शात किए रिपु वृष्णि-ससान, नद-चश वह नष्ट किया जब विधि ने फदणा-हीन महान, जितातठुर हो निशि-दित्त जगते भेरी वह यह चजित्र-कला ! भोत-थिता फल-होन हुई हा ! में क्‍या इसमें फरू भला हा अथवा--- हो परनसेवा-रत जो करता जअतिशय नीति-प्रयोग, हेतु भवित-हीन हें श्रथवा चाहूँ इब्रिय-भोग, प्राण-भीएतता नहों प्रतिष्ठा फी इच्छा है हेतु, अरि-विनाश से तृष्ट स्वर्ग में हो बस नूप कुल-फेतु ॥५॥॥

( आाकाश की ओर देखता हुआ श्राँखों में आंसू भरकर ) भगवती लक्ष्मी | तू वडी प्रगुणज्ञा है। क्योंकि---

आनद-हेतु तज हा ! नूप नद को भी, क्यों है बनी चुषल फो अब प्रेमिका तू ? होता विनष्ट मद हस्ति विनाश में ज्यों,

तू भी लीन उनसें चपले ! हुई फ्यो ? शद्दा

( श्र) पर बरी कुल-हौता !

जड़े का पृष्चो में प्रथित कुल बाले शृष बड़ों दरा क्‍्यानौ पापे | कुश-रहित बज्रौ मौर्य लूप कोते कृछा-झू्शों वा ल्‍पों चपत रूक्‍ला जाप प्रणया, तथा तारौशहा पुरुद-बुध जाने वब क्षण में ॥का

भौर प्रो | दठ ! हो में हेरे प्राप्रय को ही सप्द किए हैठा हूँ. जिलते कि तेरी साए! इच्काएं बरी रह जायेंगी। (ऐोच कर ) जी मै प्रषते अबाड मित्र चदगदाल के घर प्रपते परिषार को घराहर रखकर शयर छोश्कर भत्ता प्राया हूँ यह मेने प्च्छा है किया है। क्योकि बडाँ रहते दासे महाराज के सैबक जितका कारें हमारे बार्य से शखित्व है गह तोबकर कि 'कुलुमपुर के घाकरमण के विषय में राक्षस जदाती् तही है प्य्ते बबोव में डौल सही करेंगे बहा मैते चढ़गृप्त के शरीर का साझ करने को झबम शिगुक्त किए हुए विप्र देने मारे चुक्‍ं! को संयठित करने के जिए घौर शत्रु कौ चालो को घब्यर् करते के लिए, शहुत-सा बन इंकर छकटदाल को क्षोड दिया है। घौर इतिकषण सपूर्षो का क्षमाचार जागने के लिए शोर झसके शयठम को जय करने के जिए

औषधिश्ि ध्राशि विजयी को तिमुक्त कर दिया है। इसलिए इश्च जिषन में प्रद्विक क्‍या हूँ २--

बुष्र जिहेँ हे इप्य कत-छुल ने राशा तालण

हुपि प्लाषछ के सभृत्त खरे, कर झिशका पोज विज अति घर हे बर्गूं ढतौरा छौधन भेश्क

बुष्त रुप ले ईबन हो पहि ढजझा रक्तक दा

बे३इ ») ' * ( केछुफी को प्रवेश')! *

कचकी---

कुचल नद, , चाणक्य-नीति ने;

' ॥किया ' मौये को पुरुअधिराजः धर्म-परायण किया सुमे त्यों,

;, इच्छा मसल, जरा नें आज, बढते देख मौय- को राक्षस | चाहे जय करना जेसे, ठीक चह्दी मम सग लोभ की

बात, करे पर जय केसे १॥ ६॥

( देखकर ) ये अरमात्य राक्षस हैं। ( घृमकर और पास जाकर ) मत्री जी कल्याण हो आपका |

4

राज्षसं--आपगय जाजलि मैं अ्रभिवादन करता हैँ प्रियवद्क ! आये के लिए, आसन ले थ्याओ | ( प्रियंबटक का प्रवेश )

प्रियव॒दव--यद रहा आसन, आये विराजें |

कुकी--( अभिनयपृर्यक नैठकर ) मन्रीजी | कुमार मलयकेतु ने अमात्य को यित किया है कि--आये ने चिरकाल से निज शरीर के उचित » भार को छोड़ दिया है, इससे मेरे हृटय फो बढ़ा कष्ट होता है। ययपि स्वामी के गुणां को सइसा दी नहीं भुलाया जा सकता, फिर भी आये मेस कहना मान लें, तो अच्छा है ( इतना कह आश्णा

(३

वो दिखाकर ) मंत्रीदो (]:कुमार ने वे झ्ावूपर अपने शरौर तै उतर कर मेजे हैं झाद हस्हें गारण कर तकते हैं पट राजस--झाव | ध्यवक्षि | मेरी अर से शुमार से कहद्दो किए आपके गुखा क॑ प्रेम क॑ कारण मैं स्पमौ के गुणों को भुझ यगा है| किरु-८ नर-देब लबतक मध्ट कर रिपू-चक्र मैं तुमक्ये कहीं करठा समभर्पिठ सृप मबन में स्वण्े सिंदासम पहद्दी तब तक अह्यो | परिमब भक्निन थे ग्रग मम कदइता बह्ढी बल्ष इस सकते धार कुछ भी मूपयादिक है नहीं॥

कच्‌क्की--मंत्रीजी | ग्रापरे सेट्त्व में दुझार के लिए यह सुर्शम है! तो दूमार की प्रथम दिनती को स्वौफघर द्रैजिए !

राकह्स--झआाये ! कुमार बौ झ्ाजा के हुल्ज मुभे श्राफड्मे मौ अषह्य माननय है शसक्लिए पैं कुमार की झाशा कर प्रक्तन कखता हूँ!

छचअकी--( झ्रमिनसपूर्ष%क कासूफ्णां को पएनावर ) क्‍स्‍्णार हो आफ्प्र | मैं दाता है राशस- पाते | मैं प्रसाम कर्ता हूँ

( कक्षुकौ का प्रल्वान

राक्षस- प्रियय्शस ! देएट, मुमसे मिक्तले के क्षिए कौन हार पर क्ष्ड़ाई

प्रियच्चर्‌ऋ-- जो झाव की आाशझ्य | ( पूमक्‍र संपेरे को देखकर ) आम ! एम फोन दा ! के

( १५ )

' सेपेरा -भद्र पुरुष ] में जीर्णविप नाम का सपेरा है। में अमात्य राक्षस के सामने साँपों का सेल टिग्याना चाहता हूँ। प्रियवद्क --ठहरो, जब्तक मैं '्यमात्य जी को सचित कर दू ( प्रियवदक राक्षस के समीप जाता है )

प्रियददक--आरये | यद्ट सपेर मत्रीजी के सामने सापों का खेल दिखाना चाहता है।

राक्षस--( बाई आँख का पड़कना प्रकट करके स्वगत ) क्यों] पहले ही सर्प दर्शन | ( प्रकट ) प्रियवटक | सर्प दर्शन फे लिए. दम उम्ुक नहीं हैं | इसलिए इसे कुछ देकर बिदा फरो।

प्रियवददक--जो शाय की आशा | ( घूमकर सैंपेरे के समीप जाकर ) भद्र पुरुष | मनी जी सॉर्पा का खेल नहीं देसना चाहते ,वे पिना देग्वे ही तु्हे यह उपद्ार देते हैं

सेंपेरा--भद्र पुरुष मेरी ओर से श्रमात्य जी से कह दो कि--र'म केबल संपेरा नहीं हूँ। में कपि भी हूँ तो यदि अमात्य साँपों का सेल देखकर उपद्दार नहीं देते, तो यह्द पत्र तो पढ़ने की कृपा करें? |

(पन्न देता है )

प्रियवद्क--( पत्र लेकर राक्षस के पास जाकर ) मत्री जी | यह सेपेरा सुचित करता दे कि-मिं केवल सेपेग नहीं हूँ में कवि भी हूँ। तो यदि अमात्य साँपों का खेल देग्सक्र उपह्दार नहीं देते, तो यह पत्र तो पढ़ने फी कृपा करें

रफ्ज्ञस--( पत्र लेकर पढ़ता है )--

( १६ )

पीकर सघुकर हुसुम-रस, कौराज्ष से निम आगे इसे उगलता छो थहाँ, करता बह पर-कर्य। ११॥ 8राक्षस-( स्वगत ) अद्दा | 'पैं बुतुमपुर व्म वृत्तात जानने

बाला झ्राफक्म गुसतनर हैँ! बद इस कविता कप अर्य दे। झा! मन के व्यय॑-ब्गाजुल और बहुत से गुमचर होने क॑ बारण ैं भूल सा बो। अप मुके स्मरण भ्राग है। मए व्फा है कि यह ठेपेरा बसा दुचा दिशभगुस मुसमपुर से झागा हे। ( प्रफर ) प्रिषददक | इतको जला लो; मद अच्छा कगि है. में इत्कये ककिप तनता आदता हूँ !4

प्रिसच(क--आ | द्ार्ग की आशा

( रुपेरे के समौप लाता है ) प्रियवव॒६--क्छे झ्राइए, झाप | झपेरा- ( श्रमिसबपूथक सर्मप चाकर और बेप़कर सरूगत) ' अदा थे मर्जाश्य क्रिबमान हैं। छप्मी बद्यपि है भुको चत्गुप्त दी कोर! मिस्तल बेता हे. नहीं इरुकप यरम कठोर ॥१

( प्रषम ) बप हो अब हवा मह्रीझौ। कौ।

राक्षॉएोई-६ देरपर ) झाहां | बियष - 4 भी भें शी 'मरण मर २रक | फ्रविबदक | अरब खपा